Friday, 18 September 2015

मूलांक 2: व्यक्तित्व और परिचय

परिचय-यदि किसी स्त्री पुरूष का किसी भी अंग्रेजी महीने की 2-11-20-29 तारीख को जन्म हुआ है, तो इनका जन्म तारीख मूलांक 2 होता है । जब किसी को अपनी जन्म तारीख ज्ञात ना हो, तो यदि नाम अक्षरों का मूल्यांकन करने के उपरान्त मूलांक 2 आता है, तो उनका मूलांक भी दो होता है। इस अंक का स्वामी चन्द्रमा है तथा मूलांक दो पर चन्द्रमा का विशेष प्रभाव रहता है।
अंक दो का आधे पाते चन्द्रमा है जो अति शीघ्र-गति ग्रह है। चन्द्रमा सदैव घटता बढ़ता रहता है । एक से दो होना प्रसार का संकेत भी देता है । एक +एक = दो 1 जब एक अकेले अंक ने किसी अन्य की ऊष्मा का आनन्द लेने को कामना कीं तो एक में एक और आ जाने से दो हो गए तथा इस दो से अगला प्रसार प्रारम्भ हुआ । मूलांक एक ( 1 ) सदैव सीधा खडा ही दिखाई देखा है तथा इसमें झुकने को शक्ति अथवा प्रवृति कम ही दिखाई देती है, परन्तु अंक दो (2) में मुड़ने अथवा झुकने की प्राकृतिक प्रवृति पाई जाती है, इसी कारण मूलांक दो वाले स्त्री पुरूष कोमल, विनम्र तथा मृदुभाषी होते हैं। ज्योतिर्विदों ने अंक एक को राजा तथा अंक दो को रानी माना है। इसी लिए मूलांक दो वालों में सेवा-भाव एवं शीतलता, कोमलता, शारीरिक शक्ति की अपेक्षा मानसिक शक्ति अत्याधिक होती है।
स्वभाव एवं न्यचिंत्तत्व-अंक दो का अधिपति चन्द्रमा है जो कलपना, भावुकता तथा दयालुता का प्रतीक माना गया है । अत: इन व्याधियों में यह गुण विशेष मात्रा में होते है । मूलांक दो वाले व्याक्तियों की कलपना शक्ति अति-उत्तम होती है परन्तु इनका शरीर इतना मजबूत नहीं होता तथा शारीरिक शक्ति कम ही होती है, परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि वे उत्तम दिमागी शक्ति के स्वामी होते है। ये कला-प्रेमी एवं स्नेहशील होते है। इसी लिए ही मूलांक दो वाली माताएं अपने बच्चों को बहुत प्यार करती हैं तथा मूलांक दो वाली स्त्रियाँ अपने पति को पुर्ण स्नेह व सम्मान देती है । चन्द्रमा तरंग ही मूलांक दो प्रभावित करती है। अत: इन व्यक्तियों का किसी लम्बे समय तक चलने वाले कार्य करने को मन नहीं करता और वे बीच मेँ ही धैर्य खो बैठते हैं । चन्द्रमा तरंग के कारण इन व्यक्तियों में दृढ़ विचार भक्ति नहीं होती है। यह कार्य करूँ या न करूँ, यह कार्य होगा भी या नहीं, बस इसी दुविधा अथवा सोच-विचार में ये समय बरबाद करते रहते हैं । इनमें आत्म-विशवास को कमी होती है, परन्तु इनकी बुद्धि विवेक उत्तम होते है । कल्पना में ही ये अनेक ऊँची उडाने भरते रहते है। दिमागी कार्यों में से यश, शोभा भी अर्जित करते हैं और अन्य व्यक्तियों से बहुत आगे निकल जाते है । ये बुद्धि विवेक के बल दर अधिक सफलता प्राप्त करते है। ये निर्देशन देने में तो चतुर होते है परन्तु यदि स्वयं कार्य करना पर जाए तो टाल देते है।
मूलांक दो वालों में वैचारिक दृढ़ता की कमी होती है । कोई भी विचार अधिक समय तक इसके दिमाग में नहीँ रह सकता । विचार स्थिर न होने के कारण,ये अपने आप विचार बदलते रहते है एवं उस कारण वश असफलता का मुहं भी इन्हें देखना पलता है। ये किसी भी काम पर पक्के टिके नहीँ रहते, तथा काट-छाट व परिवर्तन करते रहते हैं । ये साथ में लीं गई योजना को छोड़ कर किसी और ही ओर सोचने लगते है । अत: ये किसी योजना को कार्यरूप नहीं दे पाते । यदि यह कहा जाए तो उचित ही होगा कि किसी काम को कार्यरूप देना इनके वश की बात नही है । अत: मानसिक भक्ति के होते हुए भीपराजय और असफलता मिलती है 1 शनै:-शनै: दिमाग में कुष्ठा तथा झुंझलाहट बढ़ जाती है और ये निराश हो जाते है ।
पवित्र आदशों पर चलने का यत्न करते हैं परन्तु इस ओर इन्हें सफलता कुछ कम ही मिलती है । बीच में ही इसका मन बदल जाता है । और अन्य प्रभाव में आ जाते है । ये मनचले भी होते हैं । ये चंचल तथा स्नेही होते हैं परन्तु एकरुपता की कमी होती है । ये व्यक्ति गोले अथवा भले मानस होते है । भोले इतने होते है कि यह जानते हुए भी कि सामने वाला व्यावित इन्हें बेवकूफ़ बना रहा है अथवा इनके भोलेपन का लाभ उठा रहा है, तब भी ये शांत रहते है।
इनकी कल्पना भक्ति इतनी उत्तम होती है कि ये छोटी सी बात को भी पूरी हद तक उजागर कर देते है । बुद्धि विवेक को तो कमी नही होती परन्तु ये स्वयं स्वतन्त्र रूप से कम ही कार्यों मे सफल होते है। दूसरों के अधीन कार्य करना, सहयोगी अथवा सहायक रह कर काम करना इन्हें अच्छा लगता है तथा वह सफलता भी पाते है ।
जैसे पहले बताया गया है कि ये भोले होते हैं । ये सरल प्रकृति के स्वामी होते है । पुल-कपट करना इन्हें नहीं जाता तथा ये धोखा भी सहज है खा जाते हैं । कोई भी व्यक्ति इन्हें चिकनी- चुपडी बातें करके ठग सकता है । ये सब कुछ जानते भी ये बार-बार ठगे अथवा धोखा खाकर भी कुछ नहीँ बोलते।किसी को कुछ कह सकना इनके वश की बात ही नहीं है चाहे सामने वाला कितनी हानि भी कर दे । किसी को, मूलांक दो वाले 'न' में कम ही उतर देते है।मूलांक दो वाले व्यक्ति माता के साथ अधिक सम्बन्धिक होते है। ओर पिता की तो कभी-कभी आज्ञा भी नहीं मानते । ये स्वयं भी अच्छे मा-बाप बनते है तथा अपने मां-बाप के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाईं रखने के इच्छुक होते हैं । इसमें भी सन्देह नहीँ कि मूलांक दो वाले पुरुषों में स्त्री गुलों की प्रधानता रहती है । रहन-सहन का ढंग, बनाव-श्रृंगार, स्वभाव तथा बाते करने के तरीका से पता चल जाता है कि पुरूष का मूलांक दो तो सकता है।
धन संग्रह अथवा जमा करना इनका स्वभाव होता है 'धन-प्राप्त तथा जमा करके वे बहुत प्रसन्न होते है । इन्हें धन के पीर भी कहा जा सकता है । धन अथवा पैसों के साथ तो यह चिपक सो जाते हैं । ये स्वयं दान कम ही देते है परन्तु दूसरों को दान करने अथवा देने के प्रेरित करते है तथा स्वयं भी धन प्राप्ति की कोई ऐसी योजना बना लेते है ।
चूँकि इनकी बुद्धि-विवेक उत्तम होता है, अत: दूसरों को उस क्षेत्र में अपने से निम्न ही समझते हैं। ये अच्छे साथी, निःस्वार्थी तथा मेल जोल रखने वाले होते है । इनका कार्य करने का सलीका, अनुशासन का ढंग अपना ही होता है । मूलांक दो वाले व्यक्ति सामने वाले व्यक्ति के मन की थाह तक पहुचने में अत्मधिक सक्षम होते है। किसी के
आतंरिक विचारों को ये शीघ्र भाँप जाते है ।
मूलांक दो वाली स्त्रियाँ भावुक, संवेदनशील, विचार शील, आत्म-प्रशंसक तथा चतुर होती है। ये स्पष्टवादी, कल्प्नाप्रिय, स्वच्छता एवं सौन्दर्य को पसन्द करती है । ये त्याग, सहानुभुति एवं ममता की मूर्ति होती है । उसे बनाव श्रृंगार बहुत पसन्द होता है । ये किसी का दुख दर्द नहीं देख सकती। उनमें दूसरों को परखने की अदभुत क्षमता होती है परिस्थिति और समय अनुसार ये अपने आपको बदल भी लेती है। मूलांक दो वाली स्त्रियाँ कलात्मक सौन्दर्ययुक्त वस्तुएँ बनाने अथवा परखने में विशेष निपुण्य होती है। ये छोटी सी बात को भी मन में रखती हैं तथा इसी कारण दुखी रहती है । इसको छोटी-छोटी बातें भी चुभती रहती है। इसी कारण इनमें कईं बार बदले की भावना भी उत्पन्न हो जाती है । मूलांक दो वाली रित्रयों में हठ, क्रोध तथा जिद्द कुछ अधिक ही होता है । वह अपनी बात मनवाने के लिए भावुकता का प्रदर्शन भी करती है। मूलांक दो वाली स्त्रियाँ परिश्रमी बहुत होती है तथा इन्मे हकूमत करने प्रशासन चलाने तथा नौकरी करने की भावना प्रबल होती है ।

Effects or Impacts of transit of rahu and ketu planets

The transit of the planets is seriously involved in the character and personality formation of a person. Not only this, but the good or bad happenings in a person’s life are also determined by the transit of the planets. As Rahu along with Ketu, Saturn and Jupiter is the slowest moving planet it has strong effects on all the moon signs. Rahu and Ketu move to a new sign once in 18 months in their journey counter clockwise around the zodiac and complete their one round of revolution in 18 years. Rahu is the Karmic aggregator and Ketu is dispenser. The impact of transit of Rahu/Ketu on various signs is as follows: Aries: Your confidence shall increase. You would be striving a lot to maintain better relations with spouse and partners and colleagues but your efforts might not bring in satisfying results. If you can then it is better to avoid risky situations completely. Taurus: You are going to use this time very intelligently. So this is the right time to plan and implement new strategies for business. Financially it is going to be an excellent time. You will be earning from many sources and will also be able to make huge investment. You are being blessed with an art of balancing your domestic and professional life beautifully. You will win almost all the competition that you participate. Gemini: Situations like sudden loss of money, disputes at work place and disturbed health are predicted. You might lose money just due to any wrong decision taken by you. Analyze all the situations before taking any decision. Your earning shall be low and you might not get the credits. Take care of your health. Be cautious about your diet especially as you might suffer from stomach disorder. Cancer: Problems like cough, cold, asthma and rheumatic pains will keep on disturbing you all through. A period of difficulties is arriving. You are required to take care of your health as well as your attitude towards life. You might lose confidence in you and will start dealing with life from other’s perspective. Commencing any new project will not turn into your favor. This period might end up with some vehicular accident. Leo: This time is highly favorable to gain security and stability especially on professional front. You shall be awarded with a promotion and if you are a businessperson then an expansion in your business is almost sure. You will be supported by the people in power. You are courageous and the 1st choice of everyone when it comes to responsibilities. Many responsibilities will be assigned to you at your home and office that you will carry forward successfully. The time is asking you to be alert as you might meet a person who is perfectly compatible with you regarding work. Your siblings might face some problems but your relationship with them is going to be very great. Virgo: You might lose some source of income due to which you will be disturbed. This is not favorable time to make new change so you are advised to avoid any change in your daily life routine and also do not commence any kind of new work. Be on the safer side and let your life go the way it was going. For some time you won’t be able to grow. Your doubts and insecurities regarding family and loved ones will not let you enjoy even some moments of your life. Libra: Avoid over speaking and control your anger. Avoid illicit relationship. Be careful for false documents. You may face some unnecessary legal problems. Sudden expenditure may increase. You may have to work really hard. Not a good favorable time for change in business and job. You have to look out for the smaller opportunities and make the best out of it. Your enemies might trouble you. There wouldn’t be any change in your outlook and you will remain the same as you were before. Scorpio: It is not an appreciable time for you anyhow. You will be disappointed in almost all the things that you will do. The bad part is that even people who you trust a lot can disappoint you to some extent. All these negative things will be affecting your mind badly. You will remain disturbed and your mental anxiety won’t let you live peacefully. As the time is not good, avoid investing money at the places that involves risk. Expecting anything from your family and freeing will result in further disappointments. Any close friend of yours might also betray or back stab you. Travelling might disturb you and your family’s health. Better avoid it. Sagittarius: Public relation, reputation and fame will keep you happy. You will be very impressive during this period. You are not only going to impress your family but people at your workplace and your beloved will also be highly impressed by you. Leaving behind your attitude of carelessness you will move ahead to transform yourself. You are going to rise at your professional level. And, will experience immense pleasure in your love life. You are destined to win all the battles of your life during this time. Your enemies will lose their confidence in front of you. All your relationships will remain good as always, but you might face some difficulties while dealing with your children. Capricorn: Rahu is posited in the 10th house in Capricorn. Apart from some minor health issue, this time period is here to gift you ultimate success in almost everything. You are going to impress your seniors with your work and dedication. It is time to grab as many stars as you can to keep in your pocket. You will be reaching new heights in your career and the plus point is that everything will happen on the correct time. You will be smart enough to balance your personal and professional life. This balance will keep you away from any sort of dispute at home and at work place. Your business partners will benefit you. You will be successful in exploring new sources of earnings and you are going to expand your circle. The only thing due to which you might disturb your peace of mind is your health. So take care of your health. Aquarius: This period of your life will be balanced in all spheres. Your mind will stay focused at your goals and due to this you are going to put your 100% endeavor to achieve those goals. There are some chances that you will be over ruled by your ego. In such case you will invite defame in your favor. Treat people with decency and affection. This is the only way of avoiding increase in the number of enemies. Pisces: Being ignorant towards your health might be very harmful. Health is not being shown very good in your cards. Maintain harmony and positive attitude towards life. Things will fall in place some day. You will be overburdened with work in your office that will lead to stressful routine. Keep on work diligently to taste the flavor of success. It is going to be a difficult time for you people. Surely, it is not a perfect time to be aggressive. Hold your decisions of making investments and avoid taking any kind of risks in your professional and personal life as well.

Wealth associated with horoscope

Everybody in this world longs for and strives hard to become rich and lead a comfortable life, but this is regulated by his prarabdha (result of Karma (actions) in previous births). This truth becomes self-evident from the fact that all the children of a couple do not enjoy identical wealth and success in life. The nature and extent of an individual's prarabdha is clearly discernible from the location of planets in his horoscope.
The 2nd house is called, 'Dhana Bhava' and indicates dhana (wealth), savings, speech, education, etc. The 11th house is called' Labh bhava' and indicates gains and wealth, among other significations. The Kendras are called Vishnu Sthan (house of happiness) and Trikonas are called Lakshmi Sthan (houses of wealth). The lagna is both a Kendra and Trikona. Jupiter is Karka for wealth, followed by Venus. Their location in 2nd or 11th house, in Kendra or Trikona, makes the native very rich. The conjunction or mutual aspect of Jupiter-Mars, Jupiter-Mercury and Mars-Moon therein also gives much wealth to the native, provided these are not simultaneously the lord of the 6th, 8th or 12th house.
A wealth giving dhana yoga is formed when two or more lords of Lagna, 2nd and 11th house cojoin in any of these three houses, in Kendra or Trikona or exchange houses. If dhana-karka Jupiter also joins the configuration, then the native becomes very wealthy. When dhana yoga occurs in trik(6th, 8th or 12th) house its strength to confer wealth is greatly reduced.
Some simpler and effective dhan yoga in horoscope
The combination of the lords of 2nd, 11th and lagna, in Kendra or Trikona, or 2nd or 11th house gives huge wealth.
When Lords of Kendra and Trikona combine with the lord of 2nd house and are placed in a Trikona or Kendra, or in 2nd or 11th house, the native is very rich.
The combination of the lord of a Kendra with the lord of a Trikona indicates good fortune. Similar is the result when there is exchange of houses between the lords of Kendra and Trikona.
A planet which is simultaneously lord of a Kendra and a Trikona becomes a Yogakarka for the horoscope. Its association with the lord of 2nd or 11th house gives much wealth and honour.
The association of Jupiter, Venus and mercury in the 2nd or 11th house, or with their lords, indicates much wealth, through fair and honest means.
The combination of Moon and mars, if they are not lord of 6th, 8th or 12th house, also gives much wealth.
The exchange of houses between the lords of 2nd and the 8th house gives unearned wealth through lottery, legacy, etc.
Saturn and Rahu also give wealth. Their association with the 2nd or 11th house or their lords, indicates success and wealth through secret deals. Saturn gives slow and steady growth, while Rahu produces sudden and unexpected gain.
The lords of Trik houses (6th, 8th and 12th) jointly or separately placed in these houses, unaspected by any other planet, create vipreet Rajyoga, and give much wealth and success to the native in their dasa-bhukti.
When all the benefics (Jupiter, Venus and Mercury) are in Upachaya houses(3,6,10 and 11) from Lagna, the native becomes highly rich at a young age. If these benefics are in Upachaya house from the Moon, then also the native is very wealthy. When two benefics are in Upchaya house the native has good wealth. If only one benefic is there, then the native has average wealth.

Know more about love marriage from horoscope

In a kundali 5th house indicates love and affection; 7th house the marital life and conjugal bliss etc., 12th house denotes pleasures of beds, indebtedness, extravagant expenditure, handling of finances or savings during life time.

For females 5th, 9th, 7th and 12th houses are to be checked along with karka planet Mars. If in a female’s horoscope Mars is joined or aspected by Rahu or Saturn, she becomes expert in flirtation and whether she will marry such person depends on the disposition of Venus, Rahu, and Saturn in the male horoscope.

5th house and its lord play an important part in love making when they make a relation with 7th house or its lord or with marriage indicating house or planet and are not connected with evil houses or evil lords, they generally result in love marriage.

When Mars is aspected by Saturn or Rahu in a female’s chart, she comes into contact with opposite sex and makes love with him. When 5th house or its lord has a connection, the love is only for sexual urge. When 7th house or its lord is conjoined with Saturn or is aspected by Saturn, one has a chance to be married to a person previously known to her.

Also when Mars and 7th lord are aspected by or conjoined with Saturn, same results as above. Rahu’s influence over Mars by conjunction or aspects makes number of love affairs without any marriage and gives bad name unless guarded by Jupiter. When 7th house, 7th lord or Mars has some link with 2nd house or its lord, the marriage will be within relations or when 7th lord is in 2nd house also. When 7th house lord from moon Joins the combinations, the husband will be her mothers younger brother or cousin or relative as per the planets ruling the house.

1. When Mars and Venus in females and Mar’s in male’s horoscopes are in one and same sign, they will be attracted to each other. The closer the degrees, the deeper the attraction will be. If they are in the same degrees, the attraction will be very strong.

2. If above Mars and Venus are in mutual Kendra or Trikona, the attraction will be instant and lasting.

3. But when Mars and Venus are in mutual 6th, 8th, 2nd or 12th houses, they will dislike each other.

4. When radical Mars of female is aspected by radical Saturn or Rahu of a male, the man is likely be attracted towards that women. The closer the degrees of aspect, the stronger the attraction will be.

5. Attraction will be more strong if male’s Saturn or Rahu aspects Mars of female in the fullest degree.

6. If in above case, Saturn or Rahu are afflicting to Mars one should be careful about the man as he will have desire for her and she may suffer from such a person, as he may not be reliable.

7. When transiting Saturn or Rahu, will afflict. her radical Mars, the danger is likely to come at that time.

8. In case of female’s when her radical Mars is afflicted by Saturn and Rahu (as the case may be) they are likely to be prey in the hands of such males.

9. If such aspect as above is made from a benefic house during transit, the result will be happy and intimacy will last long and if age permits, may end in marriage. But when Jupiter aspects above afflicted Mars, the evil aspects may be counter acted.

10. If Jupiter of male aspects or conjoins radical Mars of female, relations between the two will be based on mutual trust and attraction will be cemented throughout life.

11. Woman in whose birth chart her radical Mars is afflicted by male’s Saturn, she will be attracted towards a man. When situated in the same sign or nearer the aspect or conjunction is, the stronger the attraction will be.

12. When radical Mars is afflicted by Rahu of male or situated in same sign or aspecting Mars, the woman wi ll be drawn towards the man.

13. When Rahu or Saturn of female’s chart afflicts radical Venus of male, the man will be attracted towards female.

14. Venus in male’s and Mars in female’s charts are afflicted by Saturn at birth and also male’s Saturn aspects female’s Mars and female’s Saturn aspect’s male’s Venus, the contract between them is sure. Rahu in similar conditions results into similar effects.

15. Venus in 12th house in male and Mars in 12th house in female horoscope, indicates many love affairs.

16. The person in whose birth chart Saturn or Rahu has affliction over 7th house at birth chart may change from one person to another in love.

17. Also when in transit Saturn or Rahu aspect 7th house or pass through the same form Lagna or Moon sign and at the same time afflicts radical Venus of male and Mars of female, the results will also be above.

Success in love marriage:
If Mars and Venus exchange their relative positions in the horoscope of couple, love marriage will be a great success.
If Sun in one chart has same longitude as Moon or the rising sign in other horoscope, it is conducive to a good attraction. The longitudes of Sun in male and Moon in female charts are same, mutual attraction and congeniality is the result. If Sun in female and Mars in Male charts have same longitudes, a good attraction will be there.
If Moon in one chart has same longitude as the rising sign or Sun in other horoscope, it is conducive to harmony. Sun in one in good aspect indicates good harmony. Moon in one in good aspect or conjunction with Lagna or Sun in other chart exercises good influence.
Sun in one in good aspect to ascendant or Moon in the other is good sign. Moon in one in good aspects to Moon in other is a happy disposition, Sun and Venus having same longitude in each other charts show much pleasure and enjoyments. Also Moon and Venus have the same effects.
Mars and Venus having same longitudes in each other horoscopes lead to mutual attraction though it may not be endured. Jupiter Venus, Jupiter Saturn having same longitude indicates harmony. Mars and Saturn in the above position lead to quarrels.

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Thursday, 17 September 2015

हस्त रेखा और भविष्य

मानव जाति में कदाचित ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जो अपने अतीत का भलीभांति अध्ययन करने के बाद यह अनुभव न करता हो कि उसके विकसित जीवन के कितने वर्ष या कितना भाग उसके अपने और माता-पिता के अनभिज्ञता के कारण बेकार ही बीत चुके हैं। अपने बारे में पूरा-पूरा ज्ञान प्राप्त करने के बाद ही हम स्वयं को नियन्त्रित करने में सक्षम और समर्थ हो सकेंगे। साथ ही अपनी उन्नति करके मानव जाति की उन्नति कर सकेंगे। हस्त विज्ञान का स्वयं को पहचानने से सीधा सम्बन्ध है। इस विज्ञान की उत्पत्ति पर विचार करने के लिए हमें विश्व इतिहास के प्रारम्भिक काल में लौटना होगा। आदि काल के मनीषियों का स्मरण करना होगा जिन्होंने विश्व के महान साम्राज्यों सभ्यताओं, जातियों और राजवंशों को नष्ट हो जाने के बाद भी अपने इस भण्डार को सुरक्षित रखा। विश्व इतिहास के प्रारम्भिक काल का अध्ययन करने पर हमें ज्ञात होगा कि हस्त विज्ञान से सम्बन्धित सामाग्री इन्हीं मनिषियों की धरोहर थी। सभ्यता के उस आदिकाल केा मानव इतिहास में आर्य सभ्यता के नाम से पुकारा जाता है। हस्त रेखा विज्ञान के मूल विन्दुओं को जांचते-परखते समय हमें प्रतीत होने लगता है कि हाथों की रेखाओं का यह विज्ञान विश्व के पुरातन विज्ञान में से एक है। इतिहास साक्षी है कि भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रान्तों की जोशी नामक जाति न जाने किस काल से हस्त रेखा विज्ञान को व्यवहार में लाती रही है। स्थूल या सूक्ष्म गतिविधि को संचालित करने वाले स्नायु जिनसे ठीक वैसी ही सलवटें या रेखाएँ बनती हैं। उनका निर्माण प्रमुखरूप से गतिशील देशों से होता है। लेकिन सम्भवतः उनमें कुछ अन्य ऐसे तन्तु भी होते हैं जो अर्जित या अन्र्तनिहित प्रवृत्तियों के मिश्रित प्रभावों का कम्पनों द्वारा सम्प्रेषण करते हुए और उनका जीवन रेखा के प्रभावित होने वाले भाग से मुख्य रेखा या उसकी शाखा के जोड़ पर क्राश चिह्न बनाते हुए दोनों का सम्बन्ध स्थापित करते हैं। कुछ कोशिकाओं की ऐसी वृत्ति है जिनके कारण उनमें आगामी घटनाओं का प्रभाव उत्पन्न हो जाता है। शायद कम्पन्न उत्पन्न हो जाता है। कोशिकाओं में उत्पन्न कम्पन्न अपने साथ जुड़े तर्क प्रक्रियाओं में लगे कोणों में कोई गतिविधि तो उत्पन्न नहीं करवा सकता लेकिन उनमें चेतनात्मक कम्पन्न अवश्य जगा देता है और इन कम्पनों का सम्पे्रषण हाथ पर बने विभिन्न आकार-प्रकार के चिह्नों के साथ में अंकित हो जाता है। एक तर्कयुक्त जीवन के रुप में मनुष्य का हाथ विशेष रुप से विकाश की उच्च स्थिति का द्योतक है। उसकी गति से क्रोध प्रेम आदि प्रवृत्तियों का ज्ञान होता है। यह गति स्थूल अथवा सूक्ष्म होती है, इसलिए उससे हाथं पर बड़ी या छोटी सलवटें या रेखाएं बनती है।
चिकित्सा विज्ञान से कान का रक्त अर्बुद काफी समय पहले जाना जा चुका है, यह कान के ऊपरी भाग में विभिन्न आकार में बनता है, यह फिर परी भाग के फूल जाने से उसी की शक्ल में बन जाता है। जिसमें रक्त अर्बुद होता है, यह अर्बुद अक्सर पागलों के कान में ही बनता है सामान्य रुप से उन लोगों के कान में जिनका पागलपन पैतृक होता है। इस बात का विशेष अध्ययन पेरिस में किया गया। विज्ञान अकादमी के तमाम परीक्षणों के जो परिणाम निकले उनसे सिद्ध हो गया कि केवल कान की परख करके वर्षो पहले भविष्यवाणी की जा सकती है। इसलिए यह तर्क सिद्ध हो चुका है कि जब केवल कान की जांच-परख करके सही-सही भविष्यवाणी की जा सकती है, तो क्या हाथों का निरीक्षण करके अन्य भविष्यवाणी करना असम्भव है? हाथ के विषय में स्नायु मण्डल और उनके गति संचालन को देखते हुए यह माना जा चुका है कि हाथ ही पूरे मानव शरीर का सर्वाधिक विचित्र अंग है, और हाथ का मस्तिष्क के साथ सबसे ज्यादा गहरा सम्बन्ध है। किन्हीं दो हाथों पर अंकित रेखाएं और चिह्न कभी भी एक जैसे नहीं पाये जाते। इसके अलावा जुड़वा बच्चों की हस्तरेखा में भी परस्पर अन्तर पाया जाता है। यह भी पाया गया है कि हाथ की रेखाएँ किसी परिवार की किसी विशिष्ट प्रवृत्ति केा स्पष्ट कर देती है और आने वाली पीढि़यों में यह प्रवृत्ति निरन्तर बनी रहती है, लेकिन यह भी देखा गया है कि कुछ बच्चों के हाथ पर अंकित रेखाओं की स्थिति में अपने माता-पिता से कोई समानता नहीं होती। अगर गहराई से अध्ययन किया जाय, तो इस सिद्धान्त के अनुसार वे बच्चे अपने माता-पिता से पूरी तरह भिन्न होते हैं। एक प्रचलित धारणा है कि हाथ की रेखाओं पर व्यक्ति के कार्यों का गहरा प्रभाव पड़ता है। वे उनके अनुसार ही चलती रहती हैं। लेकिन सच्चाई इसके विल्कुल विपरीत है, शिशु के जन्म के समय ही उसके हाथ की चमड़ी मोटी और कुछ सख्त हो जाती है, अगर व्यक्ति के हंथेली की चमड़ी को पुल्टिस या किसी अन्य साधनों से मुलायम बना दिया जाये तो उसपर अंकित चिह्न किसी भी समय देखे जा सकते हैं। इनमें अधिकांश चिह्न
उसकी हथेली पर जीवन के अंतिम क्षण तक बने रहते हैं।
इस संदर्भ में हाथ में विद्यमान कोषाणुओं पर ध्यान देना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। मैरनर ने अपनी पुस्तक हाथ की रचना और विधान में लिखा है कि हाथ के इन कोषाणुओं का अर्थ बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह अद्भुत आणविक पदार्थ अंगुलियों की पोरों में और हाथ की रेखाओं में पाये जाते हैं, तथा कलाई तक पहुंचते पहुँचते लुप्त हो जाते हैं। यह शरीर के जीवित रहने की अवधि में कुछ विशेष कम्पन्न भी उत्पन्न करते हैं तथा जैसे जीवन समाप्त होता है यह रुक जाते हैं।
अब हम हाथों की चमड़ी, स्नायु और स्पर्श करने की अनुभूति पर ध्यान देते हैं। सर चाल्र्सवेल ने चमड़ी के सम्बन्ध में लिखा है- चमड़ी त्वरित स्पर्श
अनुभूति का महत्त्वपूर्ण अंश है। यही वह माध्यम है जिसके द्वारा बाहरी प्रभाव हमारे स्नायुओं तक पहुंचते हैं। उंगलियों के सिरे इस अनुभूति की व्यवस्थाओं का श्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं। नाखून उंगलियों को सहारा देते हैं और लचीले गद्दे के प्रभाव को बनाये रखने के लिए ही उसके सिरे बने हैं। उनका आकार चैड़ा और ढालनुमा है। यह बाहरी उपकरणों का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। इसकी लचक और भराव इसे प्रशंसनीय ढंग से स्पर्श के अनुकूल ढालते हैं। यह एक अद्भुद् सत्य है कि हम जीभ से नाड़ी नहीं देख सकते, लेकिन उंगलियों से देख सकते हैं। गहराई से निरीक्षण करने पर हमें मालूम होता है, उंगलियों के सिरों में उन्हें स्पर्श के अनुकूल ढालने के लिए उनका विशेष प्रावधान है। जहां भी अनुभूति की आवश्यकता अधिक स्पष्ट होती है, वहीं हमें त्वचा की छोटी-छोटी घुमावदार मेड़ें-सी महसूस होती हैं। इन मेड़ों की इस अनुकूलता में आन्तरिक सतह पर दबी हुई प्रणालिकाएं होती हैं जो पौपिला कहलाने वाली त्वचा की कोमल और मांसल प्रक्रियाओं को टिकाव और स्थापन प्रदान करती हैं। जिनमें स्नायुओं के अन्तिम सिरों का आवास होता है। इस प्रकार स्नायु पर्याप्त सुरक्षित होते हैं और साथ ही साथ इतने स्पष्ट भी दिखाई देते हैं कि लचीली त्वचा द्वारा उन्हें सम्पेषित प्रभावों को ग्रहण कर सकें और इस प्रकार स्पर्श अनुभूति को जन्म दे सकें |

रत्न चयन और धारण करने का विधि विधान

रत्न चयन और धारण की प्रक्रिया लंबी और जटिल अवश्य है लेकिन एक बार आप इस प्रक्रिया को जान लें और समझ लें तो अवश्य ही अपने द्वारा चयन किये गये रत्न का पूरा लाभ उठा सकते हैं।
सही रत्न का चुनाव करना एक कठिन कार्य है, क्योंकि रत्न जहां लाभ करते हैं, वहीं हानि भी पहुंचा सकते हैं।
कारक ग्रहों के अनुसार विश्लेषण करें- लग्न, चतुर्थ, पंचम, नवम्, दशम, द्वितीय ये शुभ भाव है। यदि इनसे सम्बन्धित ग्रह जन्मकुण्डली में स्वग्रही अथवा मित्र-राशि या उच्च राशिगत अपने भाव अथवा राशि से प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम् अथवा दशम् हो तो संबंधित राशि का रत्न निःसंकोच धारण कर लाभान्वित हो सकते हैं। जैसे- मेष व वृश्चिक लग्न के लिए मूंगा शुभ है। माणिक्य व मोती भी इनको शुभ फल देते हैं। जबकि वृषभ व तुला लग्न के लिए हीरा रत्न शुभ है। इनको पन्ना व नीलम भी शुभ प्रभाव देते हैं। इसी तरह से मिथुन व कन्या राशि के लिए पन्ना, नीलम व हीरा फलदायी है। कर्क लग्न के लिए मोती कारक रत्न है। सिंह लग्न के लिए माणिक्य के साथ पुखराज व मूंगा विशेष प्रभावी है। धनु व मीन लग्न के लिए पुखराज शुभ है। मकर व कुंभ के लिए नीलम और पन्ना श्रेष्ठ है।
आप अपने भाग्यशाली रत्न का चुनाव वर्तमान महादशा तथा अंतर्दशा के अनुसार कर सकते हंै। यदि दशा स्वामी बलवान, शुभ अथवा अपनी उच्चराशि में या स्वराशि में हो, तो दशा स्वामी का रत्न शुभ तिथि समय में धारण कर सकते हैं।
रत्न धारण करने से संबंधित ग्रह को शक्ति मिलती है तथा वह शुभ प्रभाव आपके शरीर पर डालता है।
इसी तरह अपने मूलांक, भाग्यांक तथा नामांक के स्वामी का रत्न धारण किया जा सकता है। अंक 1 और 4 वालों को माणिक्य तथा मूलांक 2 और 7 वालों को मोती धारण करना चाहिए।
मूलांक 9 वालों को मूंगा, मूलांक 5 के जातकों को पन्ना तथा 3 अंक वालों के लिए पुखराज शुभ माना जाता है। अंक 6 के जातको को हीरा तथा अंक 8 के जातकों के लिए नीलम रत्न धारण करना शुभ होता है।
रत्न-धारण-दिशा-ज्ञान:- रत्न शास्त्र के अनुसार सभी रत्नों को धारण करने में अन्य बातों के अलावा दिशा का ज्ञान भी होना जरूरी होता है। जैसे अगर सूर्य के लिए माणिक्य धारण कर रहे हैं, तो धारक का मुख पूर्व दिशा में, मोती धारण करते समय उत्तर-पश्चिम की ओर तथा मूंगा पहनना हो तो धारण करने वाले का मुख दक्षिण दिशा की ओर पन्ना धारण करते समय उत्तर दिशा में मुख करना चाहिए। गुरू को अनुकूल बनाने के लिए पुखराज धारण करने के लिए उत्तर-पूर्व दिशा उत्तम मानी गयी है।
इसी प्रकार हीरे के लिए उपासक का मुख दक्षिण-पूर्व दिशा में तथा नीलम धारण करते समय मुख पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिए। राहु और केतु के लिए गोमेद तथा लहसुनिया धारण करने वाले का मुख हमेशा दक्षिण-पश्चिम की ओर होना चाहिए।
कुछ विशेष उप-रत्नः- ऐसे रत्न है लाजवर्त पितौनिया, जिरकन, ओनेक्स और गारनेट। ये सस्ते और सुलभ रत्न है।
मुख्य रूप से शनि की शांति के लिए अथवा शनिग्रह के लिए नीलम के विकल्प के रूप में पहना जाने वाला लाजवर्त मकर अथवा कुम्भ लग्न राशि के लोगों के लिए लाभदायक होता है। जिस जातक की कुंडली में शनि स्वग्रही या मित्र राशि अथवा उच्चराशि में हो तो वे लाजवर्त धारण कर सकते हैं।
ईसाइयों में यानी ब्लड स्टोन पितौनिया की विशेष मान्यता है।
यूनानियों और रोमनों के अनुसार ब्लड स्टोन धारण करने से मान सम्मान के साथ दृढ़ता बढ़ती है और मर्यादा प्राप्त होती है। खिलाड़ियों को विजेता बनने के लिए इसे गले में धारण करना चाहिए। पशुपालन अथवा कृषिकार्य के लिए भी शुभ है। यह बुद्धि, हिम्मत व साहस प्रदान करता है। परन्तु स्त्रियों के लिए उपयुक्त नहीं है।
आपकी कुंडली में अगर शनि अच्छे भाव में बैठा हो तो ओनेक्स और दाना-ए-फिरंग पहनने से श्रवण सम्बन्धी समस्याएं दूर होती हैं तथा आत्म-नियंत्रण व एकाग्रता जैसे गुणों में बढ़ोत्तरी होती है।
कुंडली में यूरेनस शुभ स्थान पर हो तो जिरकान और गारनेट पहनना उचित रहेगा। जिरकान अनिद्रा के उपचार में प्रयुक्त होने के साथ ही आध्यात्मिक अन्तर्दृष्टि को बढ़ाता है जबकि गारनेट रक्त विकारों को दूर करता है। नेपच्यून शुभ होने पर एमेथिस्ट और एक्वामेरीन पहनने की सलाह दी गई है।
असफलताओं, पराजय व निराशा की स्थिति में आप अपने जन्म लग्नानुसार त्रिरत्न जड़ित लाकेट धारण कर सकते हैं।
सभी क्षेत्रों में प्रगति के लिए चांदी या सोने में प्राण-प्रतिष्ठित नव रत्नों की माला (असली) धारण व सकते हैं। इससे कष्टों का निवारण होगा तथा सुख - सौभाग्य मिलेगा।
धन-प्राप्ति हेतु बीसायंत्रयुक्त चांदी से निर्मित लाकेट में मोती तथा मूंगा विधिपूर्वक जड़वा कर गले में धारण करें।
सामाजिक क्षेत्र में मनोवांछित सफलता-प्राप्ति हेतु दायें हाथ की कनिष्ठा उंगली में 4 कैरेट वजन का षट्कोणीय पन्ना धारण करें।
कला, अभिनय एवं माडलिंग के क्षेत्र में सफलता सुनिश्चित करने के लिए दाएं हाथ की अनामिका उंगली में विधि विधान से धारण करें।
दाये हाथ की मध्यमा उंगली में सवा तीन कैरेट वजन का गोमेद रत्न 6 कैरेट का पीला पुखराज सोने की अंगूठी में जड़वाकर दाएं हाथ की तर्जनी में धारण करने से राजनीतिक क्षेत्र में सफलता मिलती है।
मुकदमें तथा वाद-विवाद आदि में विजय प्राप्त करने के लिए 8 कैरेट वजन का लाल मूंगा त्रिकोण साइज में सोने और तांबे की मिश्रित अंगूठी में जड़वाकर दाएं हाथ की अनामिका उंगली में धारण करें।
नौकरी अथवा प्रमोशन प्राप्त करने व उच्चाधिकारियों का व्यवहार अनुकूल बनाने के लिए दाएं हाथ की अनामिका उंगली में 4 कैरेट वजन का माणिक्य सोने की अंगूठी में धारण करें।
घर-गृहस्थी में जीवन सुखमय न हो तो पति को दायें हाथ की अनामिका उंगली में 10 सेंट वजन का हीरा सोने की अंगूठी में तथा पत्नी को बाएं हाथ की अनामिका उंगली में 5 कैरेट वजन का दूधिया मोती चांदी की अंगूठी में धारण करना चाहिए।
यदि इन्हें खरीदने में असमर्थ हों तो पति-पत्नी दोनों अपने दाएं हाथ की तर्जनी उंगली में 7-8 कैरेट वजन का ओपल शुक्रवार को चांदी की अंगूठी में सायंकाल विधिपूर्वक धारण करें । निःसंतान दम्पत्ति हों तो पति दाएं हाथ की तर्जनी उंगली में 5 रत्ती वजन का पीला पुखराज सोने की अंगूठी में तथा पत्नी बाएं हाथ की तर्जनी उंगली में 8 रत्ती का सुनहला रत्न चांदी की अंगूठी में धारण करें। इससे संतान-इच्छा की पूर्ति होती है।
यदि आप काफी समय से अस्वस्थ एवं रोगग्रस्त हैं तो दाएं हाथ की अनामिका उंगली में 5 कैरेट वजन का मोती तथा बाएं हाथ की अनामिका उंगली में 7 कैरेट वजन का मून स्टोन चांदी की अंगूठी में धारण करें। यदि संभव हो तो प्राण-प्रतिष्ठित स्फटिक और मूंगा मिश्रित रूद्राक्ष की माला धारण करेगें तो स्वस्थ व प्रसन्न रहेंगे।
रत्नधारण विधि-विधानः- रत्न धारण करने का भी नियम है। आमतौर पर कहा जाता है कि रत्नों को मित्र ग्रह के अनुसार ही धारण करना चाहिए, तभी उनका परिणाम शत-प्रतिशत मिलता है। रत्नों को लग्नेश, पंचमेश और नवमेश के अनुसार धारण करना चाहिए।
यह ध्यान देने वाली बात है कि रत्न हमेशा डेड होता है। उसे चार्ज किया जाता है। आप जितने विधि विधान से इसे चार्ज करेंगे, उतना ही सक्रियता से अनुकूल फल देगा। साथ ही यह भी गौर करें कि जिस वार ग्रह का रत्न है, उसे उसी वार की होरा या चैघड़िया में धारण करना चाहिए। वैसे रत्नों को धारण करने के लिए शुक्ल पक्ष को उचित माना गया है। रत्न धारण करने के 24 घण्टे पहले उसे शुद्ध दूध, दही और गंगा जल में डालकर रख देना चाहिए।
इसके बाद गंगा जल से स्नान कराकर उसे एक माला के जप से चार्ज करके पहनना चाहिए। रत्न के लिए जप करने के दौरान यह ध्यान दें कि मंत्र प्रायः नव ग्रहों के अनुकूल व निर्धारित हों, तभी वह रत्न सिद्ध होता है।

हाथ की बनावट प्रकार और गुण

1.प्रारम्भिक हाथ
प्रारम्भिक हाथ के स्वामी प्रायः या तो सीमित बुद्धि के स्वामी होते हैं या फिर कम बुद्धि होती है, ऐसे लोगों का निम्न या साधारण व्यक्तित्व होता हैं। इस प्रकार के हाथ वाले कुछ लोग अपराधी, और बुद्धिहीन होते हैं। इनकी मानसिक क्षमता न के बराबर होती है। क्योंकि जो थोड़ी बहुत बुद्धि इनमें होती भी है, उसका ये उपयोग नहीं करपाते तथा परिश्रम करने में
भी ये लोग पीछे होते हैं। ऐसे लोगों का हाथ देखने पर सरलता से ज्ञात जाता है कि तर्क और विचार नाम की वस्तु इनके पास नहीं होती। सिर्फ पीना, खाना, और वासना इनके जीवन का मुख्य उद्देश्य होता हैं। इस प्रकार की हथेली पहले वर्ण की अधिक पायी जाती हैं। अंगुलियाँ छोटी और कड़ी होती हैं। इनमें आवेग अधिक पाया जाता है तथा उसका नियन्त्रण करना इनके लिए बहुत कठिन होता है। ये लोग इस तर्क को मानते हैं कि- यावज्जिवेत् सुखं जिवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्। यही इनका आदर्श वाक्य होता है। रंग, रुप,और संगीत पर ये ज्यादा गौर फरमाते हैं स्वास्थ्य और अध्ययन को बेकार समझते हैं। किसान, मजदूर, कारीगर, श्रमिक फेरी वाला, नाविक,कसायी, आदि श्रेणी के लोगों का हाथ इसी प्रकार का होता है। ऐसे हाथों के अंगुलियों का नाखून छोटे होते हैं। अगर ऐसा हाथ अध्ययन किया जाय, तो प्रायः अंगुलियों की लम्बाई लगभग हथेलियों के बराबर होती है। अगर हथेली की अपेक्षा अंगुलियों की लम्बाई अधिक होगी, तो वौद्धिक क्षमता अधिक होगी। कभी-2 कुछ हाथ अविकसित होते हैं, जिनमें रेखाओं का अभाव होता है। अगर ऐसी स्थिति में गहन अध्ययन किया जाय तो हिंसक प्रवृत्ति उत्पन्न करने वाला हाथ कहा जा सकता है। इनमें इच्छाओं और कार्यों पर कोई नियन्त्रण नहीं होता। रुप रंग सौंदर्य आदि के प्रति भी ज्यादा रुचि नहीं होती तथा कुछ लोगों में धूर्तता भी पायी जाती है।
2. वर्गाकार हाथ
वर्गाकार हाथ की बनावट एक चतुष्कोण की तरह होता है, अंगुलियों का आकार भी वर्गाकार माना गया है। जीवन के विभिनन क्षेत्रों में इस प्रकार के हाथ पाये गये हैं। इस प्रकार के हाथ के नाखून भी वर्गाकार लेकिन कुछ छोटे होते है। इस प्रकार के हाथ के स्वामी अध्यवसायी एवं कर्मठ होते हैं। इस श्रेणी के व्यक्ति किसी का आदेश पालन करने में असफल होते हैं। ऐसे हाथ वाले दूरदर्शी होते हैं, धैर्यवान होते हैं। पुराने रीति रिवाजों में फेरबदल करना इनका स्वभाव नहीं होता, जीर्ण-शीर्ण कपड़े भी पहन लेते हैं और अच्छे दिखते हैं। स्वतः के दैनिक आचरण से समय के पाबन्द और व्यवहार के खरे होते हैं। सत्ता का सम्मान और अनुशासन के प्रति ऐसे लोग ज्यादा लगाव रखते हैं। काल्पनिक लोगों से पटती नहीं और तर्क तथा कलह में इनकी हार कभी नहीं होती। इनको नियम और सिद्धान्त प्रिय होता है तथा जीवन में हर वस्तु के लिए स्थान होता है। हर काम को रुचिपूर्ण करना इनका स्वाभाविक गुण होता है। ये विचारों की अपेक्षा सिद्धान्तप्रिय होते हैं। अल्पभाषी होने के साथ-2 इच्छा शक्ति की दृढ़ता और चारित्रिक शक्ति के कारण प्रत्येक क्षेत्र में सफल होते हैं वर्गाकार हाथों में अनेक भेद होते हैं जैसे छोटी अंगुलियों का वर्गाकार हाथ, लम्बी अंगुलियों का गठीली, अंगुलियों वाला, शंकु के आकार की अंगुलियों वाला, मिश्रित अंगुलियों वाला, चपटा हाथ, आदि।
3.दार्शनिक हाथ
दार्शनिक हाथ के स्वामी महत्वाकांक्षी होते हैं तथा मानव जाति और मानवता में दिलचस्पी रखते हैं अंगे्रजी भाषा में ऐसे हाथ को फिलास्पिकल हाथ की संज्ञा दी गयी है। इस शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के फिलाॅस (philos) शब्द से हुआ है, जिसका अर्थ है प्रेम का अनुशरण और (sophia)सोफिया शब्द का अर्थ है प्रबुद्धता दार्शनिक हाँथों की अंगुलियों में गांठें बाहर की ओर उठी होती हैं तथा नाखून कुछ लम्बे होते हैं। ऐसे लोगों को धनोपार्जन में काफी परेशानियाँ होती हैं। ऐसे लोगों में बुद्धि और ज्ञान का महत्व धन, सोने और चांदी से अधिक होता है तथा मानसिक विकाश के कार्यो में ज्यादा रुचि दिखाते हैं। अपने कार्य-कलाप, व्यापार, फैक्ट्री आदि में आवश्यता, पड़ने पर ठोस प्रमाण के लिए खूब छान-बीन करते हैं। यदि अंगुलियाँ नुकीली होंगी, तो हर कार्य चतुरायी से करने वाले होते हैं। सामाजिक और धार्मिक कार्यों में अग्रणी रहते हैं तथा सच्चायी को वरीयता देते हैं। ऐसे लोग यदि चित्रकार होते हैं तो उनकी कला में रहस्यवाद झलकता है। कवि होते हैं तो प्रेम और विरह की पीड़ा का वर्णन न होकर दार्शनिक बातों का उल्लेख पाया जाता है। ये ज्ञान को ही शक्ति और अधिकार देने वाला मानते हैं और अन्य लोगों से भिन्न रहना चाहते हैं। जीवनवीणा के हर तार और उसकी धुन से ये परिचित होते हैं उद्देश्य पूर्ति हेतु हर सम्भव प्रयास करते हैं तथा ऐसे हाथ भारत में ज्यादा देखने को मिलते हैं। यदि दार्शनिक हाथ अधिक उन्नत एवं विकसित होता है तो ऐसे लोग धर्मात्मा बन जाते हैं और रहस्यवाद की सीमा पर अतिक्रमण कर जाते हैं। कुछ दार्शनिक हाथ कोमल और कुछ नुकीली अंगुली वाले होते हैं। इस प्रकार के हाथ वाले बातचीत में निपुण, हर विषय को समझने की क्षमता, तत्काल निर्णय की भावना, मित्रता, प्रेम, अनुराग में परिवर्तन की चेष्टा, भावुक सहसा क्रोधी, उदारता, सहानुभूति तथा कभी स्वार्थी होते हैं। जब इस प्रकार का कठोर हाथ हो तो कलाप्रिय, दृढ़संकल्प, राजनीतिज्ञ, रंगमंच के ज्ञाता, होते हैं। गायिका का हाथ अगर इस प्रकार का हो तो गाने से पूर्व की तैयारी नहीं करती। स्पष्ट है कि इस प्रकार के हाथ वाले पूर्ण रुप से सोच-विचार कर कार्य नहीं कर पाते। इस प्रकार के लोगों का सबसे बड़ा गुण और शक्ति तत्कालिकता होती है तथा उनकी सफलता का आधार भी यही होता है। अगर ऐसा ही हाथ अधिक नुकीला होता है तो सबसे अधिक भाग्यहीन हाथ माना जाता है, जबकि देखने में इसकी आकृति सब प्रकार के हाथों से सुन्दर होती है। तथा परिश्रम करने में ऐसे लोग सर्वथा पीछे होते हैं तथा सपनों के संसार में विचरण करने वाले आदर्शवादी होते हैं एवं प्रत्येक वस्तुओं में सौंदर्य खोजते हैं। और पाने पर सम्मान करते हैं। समय की पाबन्दी व्यवस्था अथवा अनुशासन का कोई महत्व नहीं देते तथा बड़ी आसानी से दूसरे के प्रभाव में आ जाते हैं।इच्छा न होने पर भी परिस्थियों के अनुसार परिवर्तित होना पड़ता है। प्राकृतिक रंगों के प्रति आर्कषण होता है। यथार्थ और सत्य की खोज करने में असमर्थ होते हैं। संगीत तथा रस्मों से प्रभावित होते हैं। ऐसे सुन्दर और सुकुमार हाथों के स्वामी कभी-कभी स्वभाव से इतने भावुक होते हैं कि परिस्थितियों को देखकर सोचने लगते हैं कि उनका जीवन व्यर्थ है।
इसका परिणाम यह होता है कि मनःस्थिति में विकृति आ जाती है और जीवन के प्रति उदासीन हो जाते हैं। ऐसे लोगों को निरर्थक न समझ कर उन्हे प्रोत्साहित करना चाहिए तथा उन्हे स्वयं को उपयोगी बनाने हेतु सहायता करनी चाहिए।

4.कर्मठ हाथ
कर्मठ हाथ में ऊपरी हिस्सा (अंगुलियों का क्षेत्र) कुछ नुकीला होता है। मणिबन्ध और शुक्र (चन्द्र पर्वत के आस-पास का भाग) मांशलयुक्त एवं चैड़ा होता है। ऐसे हाथों के स्वामी ज्यादा समय तक लगातार कार्य करने में असमर्थ होते हैं। कलात्मक कामों में ऐसे लोग ज्यादा सफल पाये गये हैं इन्हें स्वतन्त्र कार्य करने में ज्यादा रुचि होती है तथा किसी भी नये कार्य को परिश्रम पूर्वक पूरा करते हैं। ऐसे हाथ के स्वामी ज्यादातर ब्रिटेन और अमेरिका में पाये जाते हैं। ऐसे हाथ में अंगूठे और तर्जनी के मध्य ज्यादा खाली स्थान होने पर दया, प्रेम तथा मानवीय गुण ज्यादा होता है। इनमें यह विशेषता भी पायी जाती है कि कभी अपना कार्य बड़ी चालाकी से दूसरों द्वारा सम्पन्न करवा लेते हैं। सुख-दुख का इन्हें ज्ञान होता है तथा देशभ्रमण करने के शौकीन भी होते हैं। इनमें कार्य के समय उत्साह नजर आता है। पराविज्ञान में इनकी न ही आस्था होती है न प्रेम तथा धर्म, योग में पीछे होते हैं। अगर अंगुलियां नरम होंगी तो थोड़ा चिड़चिड़ापन होगा। अगर यही अंगुलियाँ चपटी होगी तो नौकरी और सेवा कार्य की ओर ज्यादा झुकाव होगा। ऐसे हाथों के लोग भारत में हिमालय की पहाडि़यों तथा उत्तरी क्षेत्रों में ज्यादा पाये जाते हैं।

5.चमसाकार हाथ
जैसे नाम से ही जाहिर है कि चमसाकार अर्थात चम्मच जैसा हाथ, यानी जिस हाथ की आकृति चम्मच जैसी हो, अंगुलियों की बनावट भी आगे से चम्मच की तरह गोलाई लिये हो। इन हाथों का एक विशेष लक्षण यह है कि इनकी अंगुलियों में छिद्र होते हैं। इन हाथों में लगभग सभी रेखाएं पायी जाती हैं। इनकी रेखाओं में कोई न कोई दोष अवश्य पाया जाता है। इनमें अंगुलियां और हथेली न बड़ी, न छोटी, अर्थात मध्यम होती हैं। कोई एक अंगुली तिरछी या टेढ़ी होती है। चमसाकार हाथ वाली महिलाएं रूढि़वादी नहीं होती हैं। ये हमेशा कुछ अलग कर दिखाने की फिराक में रहती हैं। इसलिए इन्हें जीवन में सफलता देर से मिलती है। इन्हें पारिवारिक सहायता या रिश्तेदारी से मदद कम मिलती है। अगर मंगल ग्रह उन्नत हो, तो ऐसे लोग वीर होते हैं। ऐसे लोगों का गुरु ग्रह उन्नत हो, तो इन्हें सत्संग या ज्ञान आदि में रुचि होती है। ऐसे लोग बहुत लापरवाह भी होते हैं। इनके जीवन में बहुत परिवर्तन होते हैं। हाथ अगर भारी न हो तो इन्हें अपने जीवन में अत्यधिक संघर्ष के बाद सफलता मिलती है। अगर बुध की अंगुली तिरछी हो, तो ये बातूनी स्वभाव के होते हैं। चमसाकार हाथ वाले अनोखे स्वभाव के होते हैं तथा इनके जीवन में तकरीबन सभी प्रसंग घटते हैं, जैसे प्रेम, दोस्ती आदि। इनकी संतान तेज स्वभाव की होती है एवं इन्हें गुस्सा भी बहुत जल्दी आ जाता है। हाथ का रंग काला और वह पतला होने पर ऐसे लोगों को कानून और जेल संबंधी परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है। ऐसी महिलाओं की दूसरों से कम ही बनती है। ऐसी महिलाओं को खुद झगड़ा मोल लेने का शौक नहीं होता है पर ये झगड़े में जल्दी पड़ जाती हैं। इनका स्वास्थ्य भी बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता है। इन्हें अपने मां-बाप, या पति के मां-बाप, दोनों में से एक का ही सुख मिलता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि चमसाकार हाथ वाले तरक्की अवश्य करते हैं। बडे़-बडे़ वैज्ञानिकों, खोजकारों एवं अन्वेषण करने वालों का हाथ भी कई बार चमसाकार ही पाया गया है।

6.कलात्मक हाथ
कलात्मक हाथों की बनावट नर्म होती है ऐसे व्यक्ति उदार, प्रेमी और दयालु होते हैं। सुन्दर वस्तुओं, कलाकारिता, आकृति और रंग से निर्मित सामग्री को प्यार करते हैं। शान, शौकत, नृत्य, संगीत कैबरेडांस वगेरा में ज्यादा दिलचस्पी होती है। तुच्छ और हल्की चीजें इन्हें पसंद नहीं होती तथा ज्यादा बहस व तर्क वितर्क पसन्द नहीं करते। मानसिक दुर्बलता के कारण कई कार्य करने में असमर्थ होते हैं। व्यवसाय वाणिज्य में ज्यादा चालाक नहीं होते। इन्हें ज्ञान, भावना सुहृदयता होने के बाबजूद प्रवृत्ति से ही ज्यादा काम की ओर झुकाव होता है। अंगुलियों में गांठ होने से व्यक्ति तार्किक और आलोचनात्मक प्रवृत्ति का होता है। ऐसे लोग मेहनत करके अध्ययन में भी सफल होते हैं। परन्तु इसे अपना मूल आधार समझ कर ये लोग कभी-2 बड़ी भूल कर बैठते हैं। ये व्यक्ति कला क्षेत्र में सफल होते दिखे हैं और यही इनके जीवन का अभिन्न अंग है। व्यवहारिक दृष्टि से ये प्रायः सफल नहीं हो पाते, कारण की इनके स्वभाव में लापरवाही होती है।
7.आदर्श हाथ
आदर्श हाथ के स्वामी का मस्तिष्क प्रखर एवं तीक्ष्ण बुद्धि होती है यह प्रारम्भिक हाथ के लक्षणों के विपरीत होता है। यह देखने में अति सुन्दर होता है। इस हाथ की महिलाओं को दन्त कथायें सुनना ज्यादा पसन्द होता है। उनकी बुद्धि तथा कामोद्वेग ये सब आन्तरिक आत्मा से सम्बन्ध रखने वाले हैं। फिजिकल सेक्स इनसे कोशों दूर होता है। हाथ का आकार तो छोटा ही होता है परन्तु अंगुलियों का अनुपातिक सम्बन्ध होता है। ऐसे हाथ मुलायम एवं सुडौल होते हैं। रंग लाल एवं गुलाबी पाया जाता है तथा अंगुलियाँ सुन्दर एवं नख गेहुँए रंग का होता है और अंगूठा छोटा होता है। ऐसे हाथ के स्वामी स्वप्न की दुनिया में विचरण करते हुए अच्छे विचार एवं वसूलयुक्त आदर्श के पुजारी कहे जा सकते हैं। साधारणतः ये आर्थिक सम्पन्न होते हैं तो जीवन काफी सुखी होता है। सेाने के बाद उठते ही चेहरे पर हंसी होना इनकी पहचान और विशेषता है। आर्थिक दृष्टि से ये असफल होते है। यदि ये किसी तरह से धन और आवश्यकताओं के प्रति आश्वस्त हो जायें, तो वास्तव में एक आदर्श बन सकते हैं।
8.छोटा हाथ
जो हाथ अन्य हाथों की अपेक्षा छोटा हो, वह हाथ छोटा कहलाता है। छोटा हाथ होने पर मस्तिष्क रेखा स्पष्ट और हाथ भारी हो, तो ऐसे लोग बहुत ही कुशाग्र बुद्धि वाले तथा शीघ्र ही उन्नति करने वाले होते हैं। छोटे हाथ वाले अगर भारी हाथ रखते हों, तो बहुत ही चालाकी से काम लेने और बहुत ही सोच-समझ कर खर्च करने वाले होते हैं। ऐसे लोग बेकार अपना समय और पैसा बर्बाद करने वाले नहीं होते हैं। इनकी संतान भी कुछ इसी प्रकार की होती है। ऐसी महिलाएं भी बहुत सोच-समझ कर
खर्च करती हैं, कि वसूली पूरी हो जाए। अगर हाथ भारी हो, तो ऐसे पुरुष भी अपने परिवार पर खर्च करते हैं तथा वे फालतू खर्च नहीं करते। राजनीति में ऐसे लोग बहुत ही सफल होते हैं और अपने नीचे काम करने वाले कर्मचारियों से बखूबी काम लेना जानते हैं। इन्हें सफल प्रशासक भी कहा जाता है। कुल मिलाकर ऐसे हाथों वाले लोग, जिनकी अन्य रेखाएं स्पष्ट, हाथ का रंग गुलाबी, हाथ भारी हो, बहुत सफल होते हैं।
9.मिश्रित हाथ
जिस हाथ में कई प्रकार की अंगुलियाँ पाई जाती हैं उसे मिश्रित हाथ कहते हैं। ये हाथ और अंगुलियां किसी एक प्रकार के नहीं होते। अतः इसमें शुभ और अशुभ दोनों गुण विद्यमान होते हैं। ऐसे व्यक्ति एक ओर दयालु होते हैं और दूसरी ओर क्रोधी होना इनका स्वभाव होता है। बार-बार परिवर्तन इनकी विशेषता होती है। समाज में ऐसे लोगों का कोई सम्मान नहीं होता तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कठिनता होती है। ऐसे हाथों को किसी एक श्रेणी में नहीं सामिल किया जा सकता। मिश्रित हाथ के स्वामी चतुर तो होते हैं परन्तु बुद्धि का प्रयोग करते समय संयमित नहीं होते हैं। ऐसे लोग कई तरह के कार्य एक साथ ही करते हैं तथा उसे अंजाम देने के समय कदम लड़खड़ा जाता है और नुकसान कर बैठते हैं। ऐसे हाथ की अनामिका अगर बड़ी होती है, तो जुआ, सट्टा, लाटरी आदि कार्य करते हैं। ऐसे लोग कई क्षेत्रों में प्रतिभा स्थापित करते हैं। स्वतः के विचारों में विभिन्नता होती है तथा दूसरे के विचारों को सहजता से स्वीकार करते हैं। हर प्रकार के कार्य में खुश रहते हैं और जन समूह में ज्यादा तर्क-वितर्क करने से बचते हैं।, लेकिन अलग-अलग लोगों से बातें करके सबको उल्लू बना सकते हैं। इनके अंगूठे का आकार छोटा होता है, इनका चित्त स्थिर नहीं होता। प्रत्येक कार्य को अंजाम देने से पूर्व मध्य काल में स्थगित कर देना इनका स्वभाव होता है। परिणाम स्वरूप असफलता ही हाथ आती है और जीवन में निराशापन ज्यादा होता है तथा जीवन में
सफलता के लिए अधिकाधिक संघर्ष होता है।

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Monday, 14 September 2015

Astrological preview about eye-sight or eye blindness

Sun, Moon, Venus, Mars are the karakas for eye/eyesight. Ascendant represents head/general health/overall health 2nd and 12th houses indicate right and left eye. Aries, Taurus, Pisces signs are also related with eyes. 6th house/Virgo is the house of diseases in general. 8th house/Scorpio is the house of long term diseases. 12th house/Pisces is the house of loss/hospital. Venus is also considered as eye sight/eye by some as it is the lord of Taurus. Sun represents head, being the source of light and life, represents right eye for males and left eye in case of females. Weak placement of the Sun in the birth chart can cause the problems/diseases related to eyes. Moon represents face, left eye in case of males and right eye in case of females. It is responsible for general weakness. Weak position of Moon in the horoscope of native is responsible for problems like weak eyesight. Mars plays a vital role in the health of the planet and is known as the commander in-chief among the planets. It represents forehead, acuity of vision. A weak position of Mars in the birth chart results in diseases of eyes/operation. Mercury represents mind, nervous system, senses/sight. A weak representation of the Mercury in the chart is responsible for weak eyesight. Venus represents face, eyes. A weak Venus in the horoscope may cause eye diseases. Saturn is responsible for any prolonged disease. Saturn represents darkness/ weakness/physical pain. Saturn and Sun in evil aspect may cause eye diseases or darkness / blindness. Rahu is the south node of Moon supposed to be a shadowy planet and is phlegmatic in nature resulting in malignant growth. Rahu represent smoke in astrology. Rahu with Sun/Moon causes eclipse by preventing their rays/energy. Ketu is the north node of Moon, a very dry planet. A weak Ketu gives emaciated body with prominent veins. Ketu indicates Cataract/Surgery. Sun and Mars mainly become responsible for eye- troubles. For eye troubles, blindness or problems in eyes or eye-sight problems in horoscope, the strength of 2nd and 12th houses is to be analysed. When the planets, Sun, Moon, Venus and Saturn, if negatively related with 2nd and/or 12th house of a horoscope, can cause problems/diseases related with eyes. When these houses, its lords and karakas are afflicted with malefics and badhakesh or/and placed in a malefic house or placed with malefics, badhakesh in same sign specially affliction to Sun with nodes can cause eye diseases/blindness.

Astrological preview about "tuberculosis"

Tuberculosis is killer disease. Medically this is a common and infections disease caused by 'Mycobacteria'. It mainly attacks the Lungs but it can also affect central nervous system, lym phatic, circulatory and genitourinary systems, bones, joints and even the skin. T.B. can be active in any part of the body. However when the disease gets active 75% of the cases are related to pulmonary T.B. The patient feels chest pain, coughing up of blood and prolonged cough for more than three months. Other symptoms include fever, night sweats, loss of appetite/ weight and tendency to get tired easily & loss of blood in body. Burning sensation in hands and feet, difficult to walk for a person. It creates, indigestion, whiteness in eyes and nails & irritation. It gets transmitted from T.B. patients by way of cough sneeze, speaking kissing or spit. Medically it is proven that a single sneeze of active T.B. patient can release up to 40,000 (Approx.) droplets and each one of these droplets can transmit the disease to other coming in contact. Even if a T.B. patient is travelling in the public Bus/Train/ or any other public transport it can get transmitted to others. Datas of Patients with T.B. infections. Every year approximately 9-10 million new cases of T.B. are coming. Rate of Death in India : Every 3 minute two people die of T.B. i.e. approx. more than 1000 persons per day and approx. 4 lacs per year. There are given standard combinations for T.B. in Gadavali ch-3, shlok 19 & 20, Jatak Parijat Ch. 6 Shlok- 9,5, Sarvartha chintamani ch. 6 shlok -39, Jatak Tatva chapter 6, shlok 48-50, etc. 1. Placement of lagna lord and Venus in Trik houses i.e. 6th 8th or 12th. 2. Aspect of Saturn and Mars on lagna. 3. Mercury posited in Cancer sign. 4. Placement of malefic in 8th house, Saturn in 5th house and Sun in 11th house. 5. Placement of Mercury and Mars in 6th house in kruransha and getting aspect of Moon and Venus ie.e Moon and Venus placed in 12th house. 7. From Karakamsha lagna i.e. the sign or Rasi where Atma karak is placed in Navamsa or D-9 chart and placement of Mars in 4th and Rahu in 12th from there (or the sign /Rasi of Atmakarak in D-9 chart's Rasi). 8. Placement of Moon and Mars in 6th or 8th house and lagna lord aspecting such Mars & Moon. 9. Placement of weak Moon in 6th house in watery sign and malefics posited in lagna. 10. Placement of Gulika and Saturn in 6th house and these being aspected by Sun, Mars or Rahu and beself of aspect from benefics. 11. Exchange of Rasi's between Sun and Moon or such exchange may be in Navamsa chart. 12. Combination of Sun and Moon either in Cancer or Leo sign. 13. Conjunction of Moon and Saturn and such Moon getting aspect of Mars. In addition to above following combinations may also indicate T.B. 14. Placement of Jupiter Rahu either in 6th house from lagna or Moon which ever chart is powerful. 15. Placement of Saturn, Rahu or Ketu along with a malefic or marak in 8th house. 16. Placement of Sun, or Jupiter or Venus in watery sign in 8th house along with aspect or conjunction from malefic planet. 17. Venus is afflicted by Mars and Rahu and also the affliction of the 4th house, 4th lord or Moon. 18. Placement of Mars and Mercury or Mars and Saturn in 6th house and getting the aspect of Sun and Venus or Sun and Rahu. 19. Placement of combination of Saturn, Mars and Sun along with Rahu and lord of Ascendant in 6th, weak Moon in 8th house. 20. Moon in papa kartari yoga and such Moon and lagna being aspected by Saturn. 21. Placement of Rahu with debilited Mars in Cancer or in Ascendant in a watery sign and Saturn aspecting them. Example Horoscope No. -1 Date of Birth 22.7.1917, 18.30, Hyderabad Balance period Venus 19.04.08 at birth In this horoscope there is mutual exchange between 7th and 8th lord. lagna is afflicted by aspect of Mars who is afflicted by Ketu and also badak lord, 8th lord Sun is afflicting lagna lord Saturn. Moon is afflicted by Rahu. Tuber culosis of Bones Bones are ruled by Taurus, Virgo & Capricorn rasis also 2nd 10th and 6th houses rule the bones. these houses their lords all account for bone T.B. Example Horoscope No.-2 Bone T.B. in legs D.O.B. 21.1.1985 T.O.B. 7.30, P.O.B. Delhi See the Taurus, Virgo & Capricorn rasi in lagna lord of 12th and 8th in lagna with 7th lord creating bandhan lagna, 2nd lord and lagna lord Saturn significator of legs and lord of Capricorn Rasi is in enemy sign and badly afflicted by Ketu with approximately within one degree. Lord of 5th and 7th Venus and lord of Taurus sign Venus is again afflicted by Mars who is Badhakas within approx 2°. Lord of 6th house Mercury placed in 12th house is in papakartari. Jupiter 12th lord is malefic for Makar lagna and Sun is 8th lord. The native suffered from the T.B. of bone marrow /Bone and was operated in June this year. The diesase was in right leg as 12th lord Jupiter is debilitated and is in combustion. Dispositor Saturn afflicted by Ketu again. Jupiter is again debilitated in D-9 chart as well. Example Horoscope No. 3 T.B. of Ribs in right side operation done and affected bones were removed Rahu in 12th is afflicting Mercury and Venus. Lord of 2nd house and 6th is being aspected by Saturn, Ketu and Mars 10th lord Mars is being aspected by Ketu and dispositor of Mars is afflicted by Ketu and Saturn (R) Rahu is in Capricorn Rasi and lord of Taurus Rasi and virgo Rasi Venus and Mercury are afflicted by Rahu. Example Horoscope No. 4 T.B. of Lungs Saturn is afflicted by Ketu in 4th house and lord of 4th house Moon is afflicted by Rahu. Lord of Taurus sign 2nd house is debilitated in 6th house. Lord of 6th house Mercury in in 7th with debilitated Sun clearly indicating the combination for T.B. in chest.

पेप्टिक अल्सर और ज्योतिष्य विश्लेषण

पेप्टिक अल्सर आयुर्वेद के अनुसार मानव शरीर में अग्नि मूल है। जब तक शरीर में अग्नि संतुलित रहती है, तब तक स्वास्थ्य का अनुवर्तन होता रहता है। इसलिए शरीर में प्राण और स्वास्थ्य अग्निमूलक हैं। शरीर में मंदाग्नि रहने से कई उदर रोग उत्पन्न होते हैं। मानसिक दबाव और तनाव भरी जिंदगी जीने वालों के शारीरिक विकारों में ग्रहणी और पाचन संस्थान के रोग ज्यादातर दिखाई देते हैं, जिनमें अल्सर सबसे अधिक पायी जाने वाली व्याधि है। मानव शरीर में आमाशय और ग्रहणी आहार नाल के सबसे महत्वपूर्ण भाग हैं। आमाशय आहार नाल का सबसे चैड़ा भाग है, जो अन्न नालिका के अंत से ले कर छोटी आंत के प्रारंभ के मध्य स्थित रहता है। आमाशय का कार्य है आहार को ग्रहण करना, अपने पाचक रसों को उसमें मिलाना, अपनी पेशियों द्वारा भोजन का मंथन करना और उसे आगे की तरफ धकेल कर ग्रहणी में भेजना। ग्रहणी छोटी आंत का सबसे चैड़ा और प्रारंभिक भाग है, जिसका आकार ‘सी’ अक्षर के समान है। जब अमाशय की भित्ति में घाव (व्रण) बन जाता है, तो उसे ‘आमाशय व्रण’ कहा जाता है। जब आमाशय और ग्रहणी दोनों में ही एक साथ घाव बन जातें हैं, तो उसे ‘गैस्ट्रोड्यूडेनल अल्सर’ कहा जाता है और जब यह घाव या व्रण ग्रहणी की भित्ति में बनता है, तो उसे ड्यूडेनल अल्सर के नाम से जाना जाता है। यद्यपि इन तीनों प्रकार के व्रणों के रचनात्मक रूप में कई प्रकार की विविधता है, पर इन तीनों के कारण और उपचार लगभग एक जैसे ही हैं। अतः इन्हें समान्यतः एक ही नाम ‘पेप्टिक अल्सर’- से संबोधित कर दिया जाता है । पेप्टिक अल्सर के वास्तविक कारण का अभी तक सही पता नहीं चल पाया है। फिर भी रोग उत्पत्ति में मुख्य भूमिका आमाशय अम्ल की सक्रियता पर निर्भर करती है। आमाशय में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल की अधिकता के कारण, अथवा आमाशय और ग्रहणी की आंतरिक श्लेष्मिक कला की इस अम्ल के प्रति प्रतिरोध शक्ति कम पड़ जाने के कारण आमाशय रस का अम्ल इस श्लेष्मिक कला को पचाने लग जाता है, जिससे उस स्थान पर घाव (व्रण) उत्पन्न हो जाते हैं। यह तो सर्वविदित है कि तीव्र अम्ल किसी भी प्रकार के मांस को गला सकता है, स्वस्थ मानव के शरीर में आमाशय कोशिकाओं द्वारा उत्पन्न पाचक रस और अम्ल से श्लेष्मिक कला की रक्षा करता है। इस पाचक रस में ऐसे प्रजिजीव भी मौजूद रहते हैं, जो अम्ल की क्रिया से बचाते हैं। किसी कारण से इनकी न्यूनता होने से श्लेष्मिक कला की प्रतिरोध शक्ति घटने तथा रक्त संचार के पर्याप्त न रहने से उन स्थानों की श्लेष्मिक कोशिकाओं का पाचन संभव हो पाता है, जिससे वहां घाव बन जाते हैं। ‘पेप्टिक अल्सर’ की उत्पत्ति का सीधा सा कारण आमाशय रस के पेप्टिक और हाइड्रोक्लोरिक अम्ल द्वारा आमाशय की श्लेष्मिक कला का पच जाना ही होता है, क्योंकि अल्सर की उत्पत्ति के लिए अम्ल और पेप्टिक की मौजूदगी आवश्यक होती है। रोग का उपचार: पेप्टिक अल्सर के उपचार के लिए औषधियों से अधिक आवश्यक है परहेज। अपनी बुरी आदतों और चीजों को जीवन भर के लिए छोड़ना पड़ता है। धूम्रपान, शराब और अन्य प्रकार के नशीले पदार्थों को त्याग कर संतुलित आहार पर ही रहना पड़ेगा। एस्प्रिन और अन्य कई शोथ निवारक औषधियों को भी छोड़ना पड़ता है। आयुर्वेद में कई ऐसी औषधियां हैं, जो पेप्टिक अल्सर में शीघ्र लाभ करती हैंः यहां तक कि बहुत जल्द ही रोग को समूल नष्ट भी कर डालती हैं, जैसे आंवला। आंवला अपने विशेष रसायन से आमाशय की श्लेष्मिक कला पर म्यूसिन और एल्यूमिन को मिला कर एक परत सी बना देता है, जिससे श्लेष्मिक कला का कोमल भाग जठर रस और अम्ल के प्रभाव से बचने लग जाता है।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण: ज्योतिषीय दृष्टि से काल पुरुष की कुंडली में पंचम भाव पेप्टिक, अर्थात् पाचन संस्थान का है और सिंह राशि इस संस्थान का नेतृत्व करती है। पाचन संस्थान में अग्नि मूल, जिसके कारण पाचक रस उत्पन्न होता है, भोजन को पचाने का कार्य करता है। इस संस्थान में पाचक रस में अम्ल की मात्रा अधिक होने के कारण पाचक संस्थान में घाव (व्रण) बन जाता है, जो अल्सर कहलाता है। इसलिए अम्ल, जो अग्निकारक है, उसका नेतृत्व मंगल और सूर्य करता है। इसलिए पंचम भाव, सिंह राशि, सूर्य और मंगल का दुष्प्रभावों में रहने के कारण पेप्टिक अल्सर होता है। विभिन्न लग्नों में पेप्टिक अल्सर: मेष लग्न: सूर्य षष्ठ भाव में राहु, केतु से युक्त, या दृष्ट, बुध पंचम भाव में शनि से युक्त, या दृष्ट, मंगल चतुर्थ भाव में रहने से पेप्टिक अल्सर की संभावनाएं होती हैं। वृष लग्न: मंगल केतु युक्त और गुरु से दृष्ट पंचम भाव में तथा बुध अष्टम भाव में सूर्य से अस्त हो, शुक्र षष्ठ भाव में हो, तो जातक को पाचन संबंधी समस्या होती है, जो बाद में अल्सर का रूप धारण कर लेती है। मिथुन लग्न: पंचमेश शुक्र सूर्य से अस्त हो और लग्नेश पंचम भाव में मंगल से युक्त हो और गुरु से दृष्ट हो। राहु नवम् भाव में हो, तो अल्सर जैसा रोग पाचन संस्थान पर होता है। कर्क लग्न: बुध, राहु पंचम भाव में, मंगल शनि से युक्त षष्ठ भाव में, गुरु ग्यारहवें भाव में रहने से ऐसे रोग की संभावनाएं बन सकती हैं। सिंह लग्न: लग्नेश षष्ठ भाव में राहु, या शनि से युक्त हो, मंगल अष्टम भाव में पंचमेश के साथ हो और बुध पंचम भाव में शुक्र के साथ अस्त न हो, तो अल्सर रोग हो सकता है। कन्या लग्न: लग्नेश षष्ठ भाव में सूर्य से अस्त हो, मंगल पंचम भाव में गुरु से युक्त, या दृष्ट हो और शनि स्थिर राशियों में स्थित हो, तो अल्सर होने की संभावना रहती है। तुला लग्न: लग्नेश अष्टम भाव में मंगल से दृष्ट, या युक्त हो, गुरु एकादश भाव में हो, सूर्य पंचम भाव में स्थित हो और बुध अस्त हो कर षष्ठ भाव में हो, तो पेप्टिक अल्सर होने की संभावना होती है। वृश्चिक लग्न: लग्नेश मंगल द्वितीय भाव में, शनि अष्टम भाव में, बुध पंचम भाव में सूर्य से युक्त, शुक्र षष्ठ भाव में पंचमेश राहु, केतु से युक्त, या दृष्ट कुंडली में कहीं भी हो, तो पेप्टिक अल्सर होने की संभावना होती है। धनु लग्न: शुक्र-बुध पंचम भाव में, सूर्य चतुर्थ भाव में, लग्नेश गुरु त्रिक भाव में शनि से दृष्ट, या युक्त हो, गुरु पंचमेश केतु से युक्त कुंडली में कही भी हो, तो पेप्टिक अल्सर हो सकता है। मकर लग्न: गुरु पंचम भाव में केत से युक्त, या दृष्ट हो, मंगल द्वितीय भाव में, लग्नेश शनि अपनी नीच राशि बुध से युक्त हो, तो पेप्टिक अल्सर की संभावना बढ़ती है। कुंभ लग्न: अष्टमेश और नवमेश मंगल के साथ युक्त हो कर पंचम भाव में स्थित हों, सूर्य चतुर्थ भाव में गुरु से दृष्ट हो, लग्नेश शनि त्रिक भावों में हो, तो पेप्टिक अल्सर की संभावना बढ़ती है। मीन लग्न: शुक्र पंचम भाव से दृष्ट, या युक्त हो, सूर्य और मंगल षष्ठ भाव में, लेकिन मंगल अस्त न हो, बुध सप्तम भाव में, लग्नेश शनि से युक्त द्वादश भाव, या अष्टम भाव में हो, तो पेप्टिक अल्सर की संभावना बढ़ती है। उपर्युक्त सभी योग चलित कुंडली पर आधारित हैं। रोग की उत्पति संबंधित ग्रह दशा-अंतर्दशा और गोचर ग्रह के प्रतिकूल रहने से होता है। जब तक दशा-अंतर्दशा प्रतिकूल रहेंगे, शरीर में रोग रहेगा। उसके बाद ठीक हो जाएगा, लेकिन ठीक अवस्था में भी पाचन संस्थान में कुछ व्याधि रहेगी।

ब्रेन हेमरेज और ज्योतिष्य विश्लेषण

परिणामतः, काम के बोझ, तनाव, भाग-दौड़ के कारण मानव शरीर में कई प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं, जिनमें एक मस्तिष्क रक्तस्राव (ब्रेन हेमरेज) है। शरीर एवं मानसिक विकलांगता, लकवा तथा दर्दनाक मौत का कारण बनने वाले 'ब्रेन हेमरेज' के प्रकोप में आजकल तेजी से वृद्धि हो रही है। कभी इसका शिकार अधिक उम्र के लोग हुआ करते थे, लेकिन आधुनिक युग में यह कम उम्र के लोगों को भी मौत का शिकार बना रहा है। मस्तिष्क रक्तस्राव के मुखय कारण तो उच्च रक्तचाप, एन्यूरिज्म और आर्टिरियोवीनस मालफार्मेशन है। लेकिन मधुमेह, मोटापा, शराब, भाग-दौड़, दिमागी तनाव और धूम्रपान आदि ब्रेन हेमरेज की आशंका को बढ़ाते हैं। मधुमेह रोगियों तथा उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोग, जो रक्तचाप को नियंत्रण में नही रखते हैं, उनमें दिमाग की नस का फटना आम बात है। लेकिन कभी-कभी ऐसा भी देखने में आया है कि सामान्य रक्तचाप वालों की भी दिमागी नस फट जाती है, जिसे स्पांटेनियस हेमरेज कहते हैं। ऐसा मस्तिष्क के अंदर एन्युरिज्म, या आर्टिरियोवीनस मालफार्मेशन के कारण होता है। मस्तिष्क विशेषज्ञों (न्यूरो सर्जन) का मानना है कि एन्युरिज्म में दिमाग में खून की नलियों के अंदर एक प्रकार का गुब्बारा, रोग के कारण, फट जाता है, तो रोगी को ब्रेन हेमरेज हो जाता है और मरीज बेहोश हो जाता है, जबकि आर्टिरियोवीनस मालफार्मेशन में दिमाग में खून की नसों का एक असामान्य गुच्छा बन जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह गुच्छा पैदाइशी होता है और व्यक्ति की उम्र बढ़ने के साथ-साथ यह भी बढ़ता रहता है और एक समय ऐसा आता है कि मस्तिष्क का अधिक से अधिक रक्त इस आर्टिरियोवीनस मालफार्मेशन से हो कर जाने लगता है, जिस कारण मस्तिष्क के दूसरे भाग में, रक्त की आपूर्ति कम कर के, अधिकांश रक्त को अपने अंदर इक्ट्ठा कर लेता है। दूसरे भाग को रक्त की आपूर्ति नहीं मिल पाती। इस स्थिति को स्त्री लिंग फेनोमेना कहते हैं और इसमें आर्टिरियोवीनस मालफार्मेशन मस्तिष्क के दूसरे भाग में, रक्त की आपूर्ति कम कर के, अधिकांश रक्त को अपने अंदर इक्ट्ठा कर लेता है, जिसकी वजह से वह फट जाता है। एन्युरिज्म के रोगी का इलाज यदि गुब्बारा फटने के चार घंटे के अंदर शुरू हो जाए, तो रोग का पता लगाया जा सकता है और तुरंत शल्य चिकित्सा द्वारा फटे हुए गुब्बारे को सील कर दिया जाता है। एन्युरिज्म का इलाज जल्द न होने पर इसके दोबारा फटने की आशंका बहुत ज्यादा होती है। अगर पहले ब्रेन हेमरेज से रोगी बच भी जाए, तो दूसरी या तीसरी बार नस फटने पर रोगी का जीवित रहना मुश्किल हो जाता है। इसी प्रकार अर्टिरियोवीनस मालफार्मेशन में भी रोगी का जल्द इलाज होना आश्यक है। एन्युरिज्म, या अर्टिरियोवीनस मालफार्मेशन के कारण होने वाला ब्रेन हेमरेज युवा और मध्य वर्ग के लोगों में ज्यादा पाया जाता है, जबकि रक्तचाप और मधुमेह के कारण होने वाला ब्रेन हेमरेज बुजुर्ग लोगों में अधिक होता है। इसलिए जिस परिवार में किसी व्यक्ति को मधुमेह, या उच्च रक्तचाप की समस्या नहीं रही हो और उस परिवार के किसी व्यक्ति को ब्रेन हेमरेज हो जाता है, तो उसका कारण मधुमेह और रक्तचाप नहीं, बल्कि 75 प्रतिशत एन्युरिज्म, या आर्टिरियोवीनस मालफार्मेशन होता है। एन्युरिज्म और आर्टिरियोवीनस मालफांर्मेशन ज्यादातर 20 से 40 वर्ष के लोगों को ही होता है और इन्हीं लोगों पर पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियां होती हैं। इसलिए ऐसे मामलों में जरा भी देर नहीं करनी चाहिए तथा, जितनी जल्दी हो सके, जांच करवा कर इलाज करवाना चाहिए। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि एन्युरिज्म और आर्टिरियोवीनस मालफार्मेशन का रोग पुरुषों और महिलाओं में सामान्य रूप से पाया जाता है। लेकिन उच्च रक्तचाप के कारण होने वाला ब्रेन हेमरेज ज्यादातर पुरुषों में ही अधिक होता है, क्योंकि उन पर सामाजिक और व्यावसायिक तनाव अधिक होते हैं, जबकि एन्युरिज्म्म तथा आर्टिरियोवीनस मालर्फोशन का तनाव से कोई संबंध नही होता। यह तो खूनी नसों और नाड़ियों की कमजोरी है। नस फटने के बाद रोगी के सिर में अचानक बहुत तेज दर्द होता है और रोगी बेहोश हो जाता है, या रोगी को मिर्गी का दौरा आता है, या उसका एक हाथ, या पैर काम करना बंद कर देते हैं। यह रोग 10 साल के बच्चे को भी हो सकता है।
रोग के लक्षण : जब किसी व्यक्ति को लगातार सिर और गर्दन में तेज दर्द हो और आंखों के आगे अंधेरा छा जाता हो, जो आम दवाओं से ठीक नहीं हो रहा हो, तो इसे मामूली नहीं समझना चाहिए। इसका इलाज फौरन न्यूरो सर्जन से करवाना चाहिए। ब्रेन हेमरेज के यही लक्षण हैं। उपाय : बेन हेमरेज का एक मात्र उपाय शल्य चिकित्सा ही है। दवाइयों से यह ठीक नहीं होता। इसलिए जब भी सिर और गर्दन में दर्द हो और दवाइयों से ठीक नहीं हो रहा हो, तो शल्य चिकित्सा द्वारा ब्रेन हेमरेज से बचा जा सकता है। ब्रेन हेमरेज होने के बाद शल्य चिकित्सा के अलावा और कोई चारा नहीं रहता।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण : ज्योतिष के अनुसार ब्रेन हेमरेज प्रथम भाव, लग्नेश, सूर्य, बुध और मंगल के दुष्प्रभावों में रहने से होता है। काल पुरुष की कुंडली में प्रथम भाव सिर, मस्तिष्क का नेतृत्व करता है। इसलिए प्रथम भाव और लग्ेनश (प्रथमेश) अगर दुष्प्रभावों से रहित हो, तो जातक को मस्तिष्क से संबंधित रोग नहीं होता और इसके विपरीत होने पर रोग की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। इसी तरह ग्रहों में सूर्य भी सिर, मस्तिष्क का नेतृत्व करता है और शरीर में ऊर्जा के प्रभाव का कारक है। मंगल भी ऊर्जा का कारक है, लेकिन वह रक्त कणों का भी नेतृत्व करता है। बुध त्वचा और नसों का नेतृत्व करता है। रक्त नसों में बहता है। ब्रेन हेमरेज में, नस की कमजोरी से, रक्त के बहाव में कहीं रुकावट के कारण, गुब्बारा बन कर फट जाता है। कारण सिर की नसों में कमजोरी तथा उसमें बहने वाले रक्तचाप का उच्च होना है। इसलिए सूर्य, मंगल, बुध, लग्नेश और लग्न अगर दुष्प्रभावों से रहित हो कर बलवान हों, तो ब्रेन हेमरेज नहीं होता और इसी की विपरित स्थिति में ब्रेन हेमरेज होने की संभावना बढ़ जाती है। जब इन ग्रहों की दशा-अंतर्दशा होती है और गोचर में इन्हीं ग्रहों की स्थिति कमजोर होती है, तब ब्रेन हेमरेज होता है। विभिन्न लग्नों में ब्रेन हेमरेज मेष लग्न : लग्नेश अष्टम भाव में, शनि षष्ठ भाव में, बुध लग्न में, सूर्य द्वितीय भाव में राहु-केतु से दृष्ट, या/ युक्त हो, तो जातक को ब्रेन हेमरेज होता है। वृष लग्न : गुरु लग्न में, मंगल दशम में, शुक्र षष्ठ भाव में बुध से युक्त हो और सूर्य सप्तम भाव में हो तथा चंद्र चतुर्थ, या अष्टम भाव में राहु से युक्त, या दृष्ट हो, तो संबंधित दशांतर्दशा में रोग हो सकता है। मिथुन लग्न : मंगल लग्न में हो, या लग्न पर दृष्टि रखे, बुध षष्ठ भाव में, अष्टम भाव में हो, या किसी भी भाव में अस्त हो, गुरु त्रिकोण भाव में हो और चंद्र पर मंगल की दृष्टि, या युति हो, तो मंगल या गुरु की दशांतर्दशा में ब्रेन हेमरेज होने की संभावना होती है। कर्क लग्न : मंगल और लग्नेश चंद्र कुंडली में इस प्रकार स्थित हों कि राहु, या केतु किसी एक से युक्त हो और दूसरे पर दृष्टि लगा रहे हों, अर्थात् अगर राहु-मंगल से युक्त है, तो उसकी दृष्टि चंद्र पर अवश्य पड़े और बुध लग्न में स्थित हो तथा इस पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक ब्रेन हेमरेज का रोगी होता है। सिंह लग्न : लग्नेश सूर्य, राहु, केतु से युक्त हो और बुध अस्त न हो कर लग्न में रहे और शनि से दृष्ट हो, मंगल इन स्थानों में रहे, तो जातक में, सूर्य या मंगल की दशांतर्दशा में, मस्तिष्क संबंधित रोग उत्पन्न होता है। कन्या लग्न : लग्नेश अस्त हो, लग्न में गुरु-मंगल की युति, या दृष्टि, सूर्य राहु-केतु से दृष्ट, या युक्त हो, चंद्र भी अस्त हो, तो जातक को मंगल की दशांतर्दशा में ब्रेन हेमरेज होता है। तुला लग्न : सूर्य-बुध लग्न में और बुध अस्त हो, मंगल सप्तम, या दशम भाव में हो, शुक्र-चंद्र तृतीय भाव में राहु-केतु से दृष्ट हों, गुरु लग्न पर दृष्टि लगाए, तो सूर्य, या गुरु की दशांतर्दशा में ब्रेन हेमरेज होता है। वृश्चिक लग्न : लग्नेश नीच का और चंद्र से युक्त तथा राहु से दृष्ट हो, लग्न में बुध, द्वादश भाव में सूर्य-शनि से दृष्ट, या युक्त हो, तो जातक को बुध, या शनि की दशांतर्दशा में ब्रेन हेमरेज होने की संभावना होती है। धनु लग्न : शुक्र और शनि लग्न भाव में युक्त हों और मंगल-शनि एक दूसरे पर दृष्टि रखें, लग्नेश गुरु जिन भावों में और बुध तृतीय भाव में सूर्य के साथ अस्त नहीं हो, तो ब्रेन हेमरेज का योग बनता है। मकर लग्न : मंगल लग्न में गुरु से दृष्ट हो, बुध पंचम भाव में गुरु से दृष्ट, या युक्त हो, लग्नेश अष्टम भाव में, सूर्य-शनि चतुर्थ भाव में हों और शनि अस्त हो, तो मस्तिष्क संबंधित रोग का योग बनाते हैं। कुंभ लग्न : शनि गुरु से युक्त हो कर पंचम भाव में हो, मंगल लग्न पर दृष्टि रखे, सूर्य लग्न में हो और बुध अस्त हो, राहु-केतु पर मंगल की दृष्टि हो और राहु-केतु लग्न पर दृष्टि रखें, तो ब्रेन हेमरेज जैसे रोग देते हैं। मीन लग्न : शुक्र लग्न में बुध से युक्त हो और बुध अस्त नहीं हो, सूर्य द्वादश भाव में राहु-केतु के प्रभाव में हो, लग्नेश शनि से युक्त सप्तम भाव हो और त्रिक भावों में रहने से ब्रेन हेमरेज का योग बनाते हैं। शनि, या बुध की दशांतर्दशा में रोग की संभावना प्रबल होती है।

अंकशास्त्र और आपका स्वास्थ्य

अंकशास्त्र की उपयोगिता जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लक्षित होती है। जातक का स्वभाव, वाहन, मकान व लॉटरी के नंबर, कंपनी का चयन, मेलापक, शेयर बाजार आदि सभी में अंकों की उपयोगिता सर्वोपरि होती है। आपके मूलांक में ही वे सभी योग्यताएं, प्रभाव और स्वास्थ्य सन्निहित है जो आपका मार्गदर्शन करते हैं। यदि आप स्वस्थ हैं तो आशा है कि आप इस संसार में कुछ कर पाएंगे और यदि सदा बीमार ही रहते हैं तो दवाईयां खाने या पड़े-पड़े कराहते रहने के अतिरिक्त और क्या करेंगे? (एक अरबी कहावत) यहां हम सर्वप्रथम स्वास्थ्य को इसलिए ले रहे हैं कि स्वास्थ्य मनुष्य की सबसे अमूल्य व महत्वपूर्ण धरोहर है। जिंदगी की हजारों सौगातें भी स्वास्थ्य की बराबरी नहीं कर सकती। आपकी जन्म तारीख तो आपको मालूम ही है। उसी को मूल अंक में परिवर्तित करें और देखें कि आपको क्या-क्या बीमारी हो सकती है और आपको उनसे किस प्रकार बचना है। आपके मूलांक में वे सभी गुप्त योग्यताऐं प्रभाव और स्वास्थ्य सन्निहित है, जिनका यदि आप ध्यान रखेंगे तो अस्वस्थ्य होने पर भी निम्नलिखित सुझावों की सहायता से आप अपना बचाव कर सकते हैं। मूलांक ज्ञात करने का तरीका यह है कि जैसे आपका जन्म किसी भी माह की 1, 10, 19, 28 तारीख को हुआ है तो आपका मूलांक 1 है। 2, 11, 20, 29 तारीख का मूलांक 2 है। 3, 12, 21, 30 तारीख का मूलांक 3 है। 4, 13, 22, 31 तारीख का मूलांक 4 है। 5, 14, 23 तारीख का मूलांक 5 है। 6, 15, 24 तारीख का मूलांक 6 है। 7, 16, 25 तारीख का मूलांक 7 है। 8, 17, 26 तारीख का मूलांक 8 है। 9, 18, 27 तारीख का मूलांक 9 है। मूलांक 1: जिन व्यक्तियों का मूलांक 1 होता है वे किसी न किसी हृदय रोग से पीड़ित रहने की प्रवृत्ति होती है। हृदय रोग प्रायः मूत्र रोग आदि से संबंधित रोगों द्वारा उत्पन्न हो जाता है। धड़कन तेज होना, रक्त का ठीक तरह से संचार न होना और बुढापे में रक्तचाप। उनको आंख की परेशानी हो सकती है, अतः समय-समय पर नजर का परीक्षण कराते रहना चाहिए। आधुनिक हृदय रोग चिकित्सा में रोग ग्रस्त व्यक्ति को आराम करने की सलाह दी जाती है, परंतु यह रोग अधिकांशतः उन्हीं व्यक्तियों को होता है जो आरंभ से ही श्रमहीन कार्य करते हैं और अनेक कारणों से अपने शरीर को स्थूल बना लेते हैं। ऐसे व्यक्तियों को निम्न निर्देशों का पालन अवश्य करें। इनसे वे लोग हृदय रोगों से बचे रहेंगे। व्यायाम: सूर्य नमस्कार आसनों का क्रम से एक चक्र निम्न प्रकार करें। लेकिन हृदय रोग हो चुका है तो न करें। व्रत: इन्हें रविवार का व्रत रखना चाहिए। भोजन एक समय करना चाहिए और नमक नहीं खाना चाहिए। हृदय रोगियों के लिए नमक वैसे भी ठीक नहीं होता। यदि वे नमक का त्याग कर दें तो और भी अच्छा है। उपासना: इन लोगों का इष्ट सूर्य है। इन्हें पूर्व दिशा में उगते हुए सूर्य के दर्शन करने चाहिए और उसी की उपासना भी करना चाहिए। जड़ी, बूटी व खाद्य पदार्थ: केसर, लौंग, संतरा, नीबू, खजूर, अदरक, जौ, शहद आदि। इन्हें शहद का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए। अनुकूल रंग: इनके लिए सबसे उपयुक्त और अनुकूल रंग सुनहरी पीला या पीलापन लिए हुए भूरा होता है। अनेक ज्योतिषियों रंगों का विधान तो कर दिया परंतु वे यह भूल गये कि हर व्यक्ति समाज के अनुकूल ही कपड़े पहनेगा और पहनने भी चाहिए। पीले या सुनहरे रंग के कपड़े पहनकर कोई भी व्यक्ति बाजार में घूमना पसंद नही कर सकता। आपको अपनी पोशाक या परिधान उसी प्रकार के बनाने होंगे जो समाज में भद्दे अथवा अशोभनीय न समझे जाएं। इसके लिए सबसे अच्छा उपाय यह है कि आप अपने घरों की दीवारों का रंग अपने अनुरूप रखें और वस्त्रों में अपने समान को हमेशा उसी रंग का रखें। यदि आप टाई पहनते हैं तो उसमें सुनहरी धारियां हों। इससे आपकी पोशाक का मुख्य अंग आपके अनुकूल हो जाएंगे। 1 मूलांक वाली महिलाऐं सुनहरे पल्लू वाली साड़ी पहने तो वह आपके अनुकूल रहेगी। ब्लाउज भी सुनहरी धारी वाला या भूरे पीले रंग का पहने तो अच्छा रहेगा। रत्न व धातु: माणिक्य आपका मुख्य रत्न है। इसे अंग्रेजी में रूबी कहा जाता है। धातुओं में स्वर्ण को प्राथमिकता देनी चाहिए। अंगूठी आदि भी स्वर्ण में ही बनवाकर पहननी चाहिए। सोने की अंगूठी में रत्न इस प्रकार जड़वायें कि वह आपकी त्वचा से स्पर्श करता रहे। महत्वपूर्ण: जीवन के 19वें, 28वें, 37वें, 55वें, 64वें वर्ष में उनके स्वास्थ्य में अच्छा या बुरा कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन आएगा। अक्तूबर, दिसंबर तथा जनवरी में उन्हें स्वास्थ्य की ओर से सावधान रहना चाहिए और अधिक परिश्रम से बचना चाहिए। परेशानी के समय निम्न यंत्रों को अपने घर की दीवार पर या कागज पर अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार स्वर्ण, चांदी, तांबे के ऊपर अंकित कराकर हमेशा अपने पास रखें। आपकी परेशानी दूर होगी। अंकित करने के पश्चात यंत्र की पंचोपचार पूजा अवश्य करें। मूलांक 2: जिन व्यक्तियों का मूलांक 2 होता है वह प्रायः पेट से संबंधित रोगों से पीड़ित रहते हैं। इन्हें प्रायः अपच, गैस, अफरा, मंदाग्नि या अतिसार इत्यादि रोग ग्रसित कर सकते हैं। इन्हें चाहिए कि वे आरंभ से ही भले ही इन्हें कोई भी रोग न हो अपने खान-पान पर नियंत्रण रखना चाहिए। नियमित भोजन करें और सदैव भूख से कम भोजन करें। व्यायाम: इस मूलांक वाले व्यक्तियों को योगसनों में मयूरासन, सर्वांगासन, उत्तानपादासन और पवनमुक्तासन का नियमित व्यायाम करना चाहिए। भले ही दस मिनट के लिए करें। इन्हें चाहिए कि रात का खाना दिन टलने के साथ ही कर लेना चािहए, जिससे अच्छी नींद आएगी और भोजन से रस बनने में मदद मिलेगी। सूर्य नमस्कार भी अति उत्तम आसन है। रात को ऐसे पदार्थों का सेवन करें जिनसे गैस बनती हो। व्रत: ऐसे व्यक्तियों को सोमवार का व्रत करना चाहिए। साथ ही पूर्णिमा एवं प्रदोषत व्रत भी रखें। उपासना: आपके आराध्यदेव श्री शंकर जी है। प्रतिदिन घर में या मंदिर शिवजी का पूजन करें तथा शिव स्तोत्र, शिव चालिसा का पाठ करना चाहिए। जड़ी बूटी व खाद्य पदार्थ: आपके लिए प्रमुख खाद्य पदार्थ है गोभी, शलजम, खीरा, खबूजा, अलसी इत्यादि। अनुकूल रंग: हल्का हरा रंग आपके लिए उपयुक्त है। काले और अत्यधिक गहरे रंगों से बचना चाहिए तथा हल्के हरे रंग का रूमाल सदा अपनी जेब में रखना चाहिए। घर के पर्दे, सोफे, आदि हरे रंग के ही रखें। घर में चार-छह गमले भी रखें जिनमें हरे पौधे लहलहाते रहें। रत्न व धातु: आपके लिए सर्वाधिक लाभकारी रत्न मोती है। धातु के रूप में चांदी आवश्यक है। पुरूष चांदी में मोती जड़वाकर पहनें व महिलाएं नाक में छोटे-छोटे मोती जड़वाकर पहने तो अप्रत्याशित लाभ होगा। महत्वपूर्ण: आपके जीवन के 20,25,29,43,47,52वें तथा 65वें वर्ष में स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण परिवर्तन होगा। जनवरी, फरवरी तथा जुलाई में आपको रोगों तथा अधक परिश्रम से बचकर रहना चाहिए। मूलांक 1 में बताई गई विधि के अनुसार परेशानी के समय निम्न यंत्रों का उपयोग अवश्य करें। मुलांक 3: इस अंक के व्यक्तियों को स्नायु-संस्थान निर्बल होने से हड्डियों में दर्द और थकान की शिकायत रहेगी। चर्म रोग की भी संभावना है। व्यायाम: इन व्यक्तियों को शीर्षासन, धनुरासन एवं सूर्य नमस्कार इत्यादि योगासनों का अभ्यास करना चाहिए। यदि योगासनों से अथवा वैसे ही अधिक थकान महसूस करे तो शवासन भी करें। यदि आप शवासन या उसी प्रकार के अन्य योगासनों आदि की सही प्रक्रिया जान लेंगे तो आपको थकान की शिकायत से सदा के लिए छुटकारा प्राप्त हो जाएगा। व्रत: आपको पूर्णिमा का व्रत करना चाहिए। यदि बीमार हो तो गुरुवार को भोजन न करें। उपासना: आपको श्री विष्णु की उपासना करना चाहिए। विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र का जप करें तथा श्रीसत्यनारायण जी की कथा करें या करावें। जड़ी-बूटी व खाद्य पदार्थः चुकंदर, चैरी बेर, स्ट्राबेरी, सेब, शहतूत, नाशपाती, जैतून, अनार, अनानास, अंगूर, केसर, लौंग, बादाम, अंजीर व गेहूं इत्यादि पदार्थ आपको अनुकूल रहेंगे। अनुकूल रंग: आपको पीला रंग सर्वथा अनुकूल है। रत्न व धातु: पुखराज आपके लिए सर्वश्रेष्ठ रत्न है। धातु स्वर्ण है। सवर्ण मुद्रिका में पुखराज जड़वाकर तर्जनी उंगली में पहनें। महत्वपूर्ण: 12, 21, 39, 48 तथा 57वें वर्ण स्वास्थ्य में परिवर्तन की दृष्टि से महत्वपूर्ण होंगे। दिसंबर, फरवरी, जून तथा सितंबर में स्वास्थ्य के प्रति विशेष सावधान रहना चाहिए तथा अधिक परिश्रम से बचना चाहिए। वर्णित विधि के अनुसार निम्न यंत्र धारण करें व परेशानियों से छुटकारा पायें। मूलांक 4ः इस मूलांक के व्यक्ति प्रायः रक्त की कमी से पीड़ित रहते हैं, जिसे अंग्रेजी में एनीमिया कहते हैं तथा रहस्यमय रोगों से ग्रस्त होने की संभावना है जिनका निदान कठिन होगा। वे न्यूनाधिक उदासीपन, रक्ताल्पता तथा सिर एवं कमर दर्द रहेंगे। इन्हें विद्युत चिकित्सा तथा सम्मेहन विद्या से लाभ होगा। थोड़ा सा ही बीमार होने पर रक्त की भी कष्ट रहेगा। इसलिए इन लोगों को भोजन में ऐसे तत्वों का समावेश रखना चाहिए जिनमें लौह तत्व प्रधान हो। व्यायाम: यह व्यक्ति आरंभ से ही कुछ योगासन करते रहेंगे तो उन्हें रक्ताल्पता का कष्ट ही नहीं होगा। सूर्य नमस्कार, शीर्षासन, सर्वांगासन तथा श्वसासन करना चाहिए। यदि कोई से भी दो आसन करने के पश्चात वे लोग शीर्षासन को सही ढंग से प्रतिदिन नियमपूर्वक पांच मिनट भी कर लेंगे तो इन्हें कभी भी रक्त की कमी अथवा उसके अशुद्ध होने की शिकायत नहीं होगी। व्रत: इन्हें सोमवार और गणेश चतुर्थी का व्रत करना चाहिए। गणेश चतुर्थी का व्रत समस्त प्रकार से शुभ रहेगा। उपासना: इन्हें श्रीगणेश भगवान की उपासना करना चाहिए। घर में उनकी प्रतिमा या चित्र भी रख सकते हैं। श्रीगणेश जी का उपासना से धन-धान्य की कमी नहीं रहेगा। नारदपुराणोक्त संकष्टनाशक श्री गणेश स्तोत्र का नियमित पाठ करें। जड़ी-बूटी व खाद्य पदार्थः हरी सब्जियों का प्रयोग अत्यधिक करें जैसे पालक, लौकी, तोरई मेथी, इत्यादि। नशीले पदार्थ व अत्यधिक मसालेदार पदार्थों का सेवन से बचना चाहिए। अनुकूल रंग: चमकदार नीला रंग इनके लिए अनुकूल है। टाई भी इसी रंग की पहनें या नीले रंग का रूमाल तो अवश्य हमेशा अपने पास रखना चाहिए। रत्न व धातु: आपके लिए सौभाग्यवर्धक रत्न नीलम है। नीलम अनुकूल न हो तो गोमेद धारण करें तो धन धान्य की कमी कभी नहीं रहेगी। नीलम या गोमेद पंच धातु की अंगूठी में मध्यमा उंगली में धारण करें। महत्वपूर्ण: 13, 22, 31, 40, 49 और 58वां वर्ष स्वास्थ्य में परिवर्तन की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहेंगे। जनवरी, फरवरी, जुलाई, अगस्त व सितंबर माह में स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें व अत्यधिक परिश्रम से बचें। वर्णित विधि अनुसार निम्न यंत्रों का प्रयोग करें। मूलांक 5 इस अंक वाले व्यक्ति प्रायः सर्दी जुकाम व फ्लू इत्यादि से पीड़ित रहते हैं। इन्हें नर्वस ब्रेक डाउन का भी भय बना रहता है। थका लेने वाली प्रवृति हेती है। वे मन से बहुत अधिक सोचतेहैं और स्नायविक रोगों तथा अनिद्रा से ग्रस्त हो जाते हैं। निद्रा, विश्राम और शांति इनके लिए सर्वोत्तम औषधियां है। व्यायाम: इनके लिए शवासन ठीक रहेगा। यदि नजला जुकाम रहता है तो जलनेति आदि हठयोग की क्रियाऐं करनी चाहिए। नवर्स टेंशन रहता है तो शवासन करें। व्रत: इन लोगों को पूर्णिमा का व्रत करना चाहिए। इसके साथ श्री सत्यनारायण कथा करें या करावें। उपासना: इनके प्रधान देवता श्री लक्ष्मीनारायण भगवान है। इनकी पूजा करना चाहिए और उन्हीं से संबंधित श्रीयंत्र का पाठ करना चाहिए। जड़ी-बूटी व खाद्य पदार्थः गाजर, जौ व सूखे मेवे इत्यादि है। महत्वपूर्ण: 14, 23, 41 तथा 50वां वर्ष स्वास्थ्य परिवर्तन की दृष्टि से महत्वपूर्ण होंगे। जून, सितंबर तथा दिसंबर से स्वास्थ्य के प्रति सजग रहते हुए कठिन परिश्रम से बचना चाहिए। अनुकूल रंग: इसके लिए हरा बहुत ही अनुकूल और सौभाग्यवर्धक है। वैसे पेस्टल कलर भी अनुकूल रहेंगे। रत्न व धातु: पन्ना धारण करना श्रेष्ठ है। पन्ना हमेशा स्वर्ण धातु में ही धारण करें। मूलांक 6ः इस अंक वाले को गले, नाक और फेफडे़ के ऊपरी हिस्से के रोगों से ग्रस्त होने की संभावना रहती है। साधारणतः इनका शरीर गठीला होता है। विशेषकर खुल वातावरण में या देहात के रहने वालों का। यूं तो आजकल फेफड़ों से संबंधित तपेदिक रोगों का इलाज साधारण बात हो गयी है। परंतु कुछ अन्य रोगों का संबंध भी फेफड़ों से है। मूलतः यह कामवासना का प्रधान अंक है। इन्हें इस प्रकार के रोगों के होने का भी भय बना रहता है। ेव्यायाम: इन व्यक्तियों को प्रायः स्वच्छ एवं शुद्ध वायु में दीर्घ श्वांस लेना चाहिए। यदि यह प्रणायाम की सरल प्रक्रिया सीख लें तो इनका स्वास्थ्य हमेशा ठीक रहेगा। प्राणायाम के साथ शलभासन करना भी अधिक उपयोगी रहेगा। व्रत: इन्हें शुक्रवार का व्रत करना चािहए। महिलाऐं मां संतोषी का व्रत करें। उपासना: इनके प्रधान देवता श्री कतिवीर्याजुन हैं। अतः इन व्यक्तियों को इनकी पूजा-अर्चना करनी चाहिए। जड़ी-बूटी व खाद्य पदार्थः इनके लिए सर्वोत्तम खाद्य पदार्थ है दालें, मूली, खरबूजा, अनार, सेब, नाशपाती, बादाम, अंजीर व अखरोट इत्यादि है। अनुकूल रंग: सभी प्रकार के हल्के नीले रंग इनके लिए अनुकूल है। गुलाबी रंग भी अच्छा है। परंतु गहरे रंग कभी भी नहीं पहनना चाहिए। रत्न व धातु: इनका रत्न हीरा व धातु चांदी या प्लैटिनम में ही धारण करना चाहिए। महत्वपूर्ण: 15, 24, 42, 51 तथा 60वें वर्ष स्वास्थ्य परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण है। मई, अक्तूबर, नवंबर में स्वास्थ्य के प्रति सजग रहते हुए कठिन परिश्रम से बचना चाहिए। मूलांक 7 इस अंक वाले को प्रायः फोड़े-फुन्सी या अन्य प्रकार के चर्म रोग होनेकी संभावना रहती है। इस रोग से संबंधित शिकायत बनी ही रहेगी। अन्यों के अपेक्षा यह चिंता तथा चिढ़न से अधिक शीघ्र प्रभावी होते हैं। जब तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहे वे कितना भी कार्य कर सकते हैं। किंतु परिस्थितियों की तथा व्यक्तियों की चिंताऐ उन्हें घेर लेने पर वे ऐसी-ऐसी बातें सोचने लगते हैं जो वस्तु स्थिति से कहीं बदतर है। वे शीघ्र निराश तथा उदास हो जाते हैं। वे अपने वातावरण के प्रति अति संवेदनशील होते हैं। अपने प्रशंसकों के लिए कोई भी दायित्व प्रसन्नता से अपने ऊपर ले लेते हैं। अपनी रुचि का कार्य करने में असामान्य रूप से चेतन रहते हैं किंतु वे भौतिक के बजाय मानसिक रूप से अधिक सबल होते हैं। इनका शरीर दुबला-पतला होता है और वे अपनी सामथ्र्य से कहीं अधिक कार्य करने का प्रयास करते हैं। इनकी त्वचा विशेष कोमल होती है। जरा सी भी खरोंच इन्हें परेशान कर देती है। अथवा पसीने के संबंध में उन्हें कोई विचित्र बात हो सकती है। ेव्यायाम: चर्म रोगों से बचाव हेतु इन्हें हठ योग की शंख प्रक्षालन विधि का अभ्यास करना चाहिए और यदा-कदा इसकी प्रक्रिया करते रहने चाहिए। सूर्य नमस्कार भी इस प्रकार के रोगों से बचने की सरल प्रक्रिया है। व्रत: इन लोगों को मंगलवार के व्रत रखना चाहिए और हनुमान जी के दर्शन करना चाहिए। उपासना: श्रीनृसिंह भगवान की पूजा-अर्चना करना चाहिए। इनकी उपासना से इस मूलांक वालों के सारे कष्ट दूर होंगे तथा धन धान्य की वृद्धि होगी। जड़ी-बूटी व खाद्य पदार्थः गोभी, खीरा, अलसी, मशरूम, सेब, अंगूर व फलों का रस इत्यादि इन्हें सेवन करना लाभकारी रहेगा। अनुकूल रंग: सफेद, हल्का हरा, हल्का पीला रंग अनुकूल व शुभ है। रत्न व धातु: इन्हें लहसुनिया सौभाग्यवर्धक रहता है। जिसे स्वर्ण में जड़वाकर पहनें। महत्वपूर्ण: 7, 16, 25, 34, 43, 52 तथा 61वें वर्ष स्वास्थ्य परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण है। जनवरी, फरवरी, जुलाई व अगस्त में स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहें। मूलांक 8ः इस मूलांक के व्यक्ति जिगर से संबंधित रोग लगे रहते हैं। वित्त तथा आंतों की परेशानियों से ग्रस्त हो सकते हैं। इन्हें सिरदर्द तथा गठिया रोग की भी प्रवृत्ति होत है। लीवर खराब होने से अन्य बीमारियां भी हो सकती है। इसलिए यथासंभव इन रोगों से बचने का प्रयत्न करना चाहिए। ेव्यायाम: इन्हें सूर्य नमस्कार, भुजंगासन, धनुरासन, हलासन और शीर्षासन बहुत उपयुक्त हैं इन आसनों की यह विशेषता है कि इनसे जहां लीवर से संबंधित रोग दूर होंगे साथ ही शरीर भी सुदृढ होकर रोग प्रतिरोधक शक्ति से भरपूर होगा। व्रत: शनिवार का व्रत उपयोगी रहेगा। भोजन एक समय करें व खटाई व नमक का सेवन न करें। उपासना: श्री शनिदेव की उपासना करें। तेल कपड़ा तथा काले तिलों का दान करें। जड़ी-बूटी व खाद्य पदार्थः मांस व घी से बच कर रहें। यथासंभव ताजे फल साग सब्जियों का सेवन करना चाहिए। अनुकूल रंग: काला। काले रंग की पैंट इत्यादि तो प्रायः पहनी जाती है। टाई भी काली धारियों की पहनेंगे तो अच्छा रहेगा। घर से सोफे के कुशन आदि भी काली धारी वाले हो सकते हैं। रत्न व धातु: रत्न नीलम है। इसे लौह की अंगूठी में जड़वाकर पहनें। महत्वपूर्ण: 17, 26, 35, 44, 53 तथा 62वें वर्ष स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहेंगे। दिसंबर, जनवरी, फरवरी तथा जुलाई में स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें। मूलांक 9ः इन अंक वालों को न्यूनाधिक सभी प्रकार के ज्वर, खसरा, चेचक, चर्म रोग तथा नासारन्ध्र से संबंधित जुकाम आदि रोगों से पीड़ित हो सकते हैं। इन्हें चाहिए कि वे इन रोगों से बचाव रखने का भरपूर प्रयत्न करें। ेव्यायाम: यदि जुकाम आदि नासारन्ध्र से संबंधित रोग हो तो इन्हें जलनेति आदि हठयोग की क्रियाऐं करनी चाहिए। इससे जहां इनके जुकाम की शिकायत हमेशा के लिए दूर होगी वहीं जुकाम के प्रभाव से होने वाले रोग समय से पूर्व बालों का सफेद होना या नेत्र ज्योति क्षीण होना भी नहीं होंगे। इन्हें प्राणायाम दीर्घ श्वासोच्छवास का भी अभ्यास करना चाहिए। इससे चेहरे पर आभा उत्पन्न होगी। सूर्य नमस्कार की क्रिया भी लाभदायी है। व्रत: इन लोगों को मंगलवार का उपवास करना चाहिए व भोजन से पूर्व श्रीहनुमान जी महराज के दर्शन करना चाहिए। उपासना: इन्हें श्री हनुमान जी को ईष्ट मानकर इनकी आराधना करने के साथ हनुमानाष्टक हनुमान चालीसा व बजरंग बाण का प्रतिदिन पाठ करना चाहिए। जड़ी-बूटी व खाद्य पदार्थः गरिष्ठ भोजन तथा मदिरापान से हमेशा बच कर रहें। प्याज, लहसुन, सरसों, अदरक, मिर्च इत्यादि का सेवन उचित रहेगा। अनुकूल रंग: लाल। लाल रंग का रूमाल हमेशा अपने पास रखें तथा इसी रग का अधिकाधिक प्रयोग करें। रत्न व धातु: मूंगा। स्वर्ण या तांबे की अंगूठी में जड़वाकर पहनें। महत्वपूर्ण: 9, 18, 27, 36, 45 तथा 63वें वर्ष स्वास्थ्य की परिवर्तन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। अप्रैल, मई, अक्तूबर व नवंबर में स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें।

Electing right time for starting (मुहर्त)

Every moment in life is an indication of the time ahead. Practically It is not possible to select time for our routine activities like going to office for work/job, coming back home, etc. But choosing the most auspicious moments for major events in our life, electional astrology should be considered, because work started in an auspicious moment is likely to be successfully accomplished. If you take care of the beginning, end will take care of itself is the rationale of Muhurata. In fact, Muhurata is a measure of time which means 2 Ghatis = 1 muhurata = 48 minutes. Muhurata signifies auspicious moment when planetary transition favors us in order to accomplish our work successfully. Once the auspicious moment is decided, our next step is to match its auspiciousness with the person concerned. Sun and Moon play significant role in Muhurata. An auspicious day is decided by Panchang Shudhi that is Tithi, Vaar, Nakshatra, Karan and Yoga are taken into consideration. After selection of day one is to choose an auspicious point of time which is called lagna shudhi. Decision of one’s destiny, wealth, richness and longevity is done by the creator at the time of his/her birth itself. The birth time of the child is an auspicious time of his life which has stored in itself all the data of the ups and downs i.e. auspicious and inauspicious moments. In the similar manner, muhurata of an important work takes care of the future of that work. For example Muhurata for marriage works as a window to preview the status of married life. And selection of time for a entering into a new house decides the happy and peaceful environment at home. This is the theory which is the root cause of its importance in life and that is the reason, by choosing the most auspicious moments; we can turn that work in our favour. Vedic astrology is based on three principles - 1. Sidhanta 2. Samhita 3. Hora Hora astrology deals with the analysis of native’s horoscope. Sidhanta astrology calculates planetary transition, and lunar and solar calendars. In Samhita astrology muhurata, rising and setting of planets,. Matching etc. are considered and analysed. In this way, Muhurata is an important part of samhita Astrology. For calculation of Muhurata, Muhurat chintamani, the main scripture, is written by Ram Daivagya who was the younger brother of Nilkantha. The most famous interpretation on Muhuratachintamani known as Peeyushdhara was done by Shri Govind, son of Nilkantha. Selection of time (Muhurata) is decided in the following ways- 1. Ask the native, for which event he wants the muhurata to be decided and the favorable period i.e. which month, day etc suit him best. 2. Then select the month based on the event. 3. To take out the auspicious time for marriage, month may be selected on Sun’s strength also. 4. The month should be purified. Keeping in view planetary strength, holashatak, pitra paksha, combustion of Venus and Jupiter etc. 5. Panchang shudhi and lagna shudhi should be done. Panchang shudhi means - a good lunar day, beneficial week day, an auspicious constellation, a good yoga and a fertilizing karana. In the same way lagna shudhi should be done. 6. Decide chandra bal after calculating Moon’s strength. Avoid debilitated Moon and the transit period of Moon in 4, 8, 12 rashi from birth rashi. 7. The best Tithis should be selected and tell the native accordingly. Then select two or three tithis for commencing the work. 8. Now, to find out the auspicious time perform lagna shudhi. If the native is short of time and can not wait for months to accomplish the work, month purification may be avoided and Muhurta is selected just after panchang shudhi and lagna shudhi. If, the native is unable to afford even this much period then just perform lagna shudhi. If possible time can be selected on the basis of an auspicious hora or chaughadia. One more opinion which is prevalent about the Muhurata is whenever one has high spirit to perform the task, it is the best muhuratha..Secondly, the strength of lagna takes precedence over planetary strength. Muhurata taken out on the basis of lagna shudhi is more auspicious than any other auspicious tithi. This rule is applicable in that case, when it becomes difficult to find out an auspicious tithi. Muhurata can be calculated just after lagna shudhi. Abhijit Muhurata is also considered very important in selecting auspicious time. Abhijit muhurata is a period of 48 minutes which stays 24 minutes before and 24 minutes after mid-day or mid night. Work started in Abhijit Muhurata gets successfully accomplished. Abhijit Muhurata can be used in case one is short of time. Our scholars and seers of astrology stand uniformly at least on the subject of calculation of Muhurata. Generaly, they have difference of opinions in predictive astrology and differ more on remedial measures. It may be because many items are related to planets and remedies suggested either in form of donation, immersion or in acceptance of those items by our astrologers. Some astrologers emphasize on chanting the mantras to ward off the malefic effects. Diversification of opinion is a common phenomemon among the astrologers since long. But astrologers win the faith of masses in elective astrology as base of calculating the muhurata is same, hence they come out with the same muhurata for any important event. Subject like Muhurata has been widely written by our astrologers, but the discussion regarding its basis of the calculation has not been checked. That is why, Muhurata can not be termed scientific rather it is left with the crutch of faith and reverence only. For example selection of day and time to perform marriage is not sufficient to predict marriage performed in this period shall yield fruitful results. A majority of astrologers have tested the importance of muhurata for successful accomplishment of the work and found failure if work is done without considering Muhurata. So, it is mandatory to utilize electional astrology in life in order to make our life more prosperous and happy.