सनातन धर्म में मूर्ति पूजा का विधान है। इस संसार को बनाने वाली मूर्ति रूप लेकर किसी न किसी वेश में अपने भक्तों के सामने प्रकट होती है। इसी के उदाहरण हैं षोडश कलायुक्त भगवान श्री कृष्ण एवं मर्यादा पुर्रोशोतमराम। यह आवश्यक नहीं कि वे मनुष्य रूप में ही जन्म लें। उन्होंने नरसिंह रूप में भी अवतार लिया, वामन अवतार, कूर्म अवतार, मत्स्य अवतार, वराह अवतार आदि अनेक रूपों में उन्होंने अपने को प्रकट किया। सही भी है, यदि वे विभिन्न कोटियों के प्राणियों, धरती, आकाश वायु, पर्वत आदि की रचना कर सकते हैं तो विभिन्न रूपों में स्वयं क्यों नहीं प्रकट हो सकते। इसीलिए सनातन धर्म में आकृति और वस्तु को विशेष महत्व दिया गया है। और यही कारण है कि मंदिरों में भगवान की प्रतिमाओं को अनेकानेक रूपों में पूजा जाता है। वेदों में देवी देवताओं की पूजा आराधना की विभिन्न विधियों का उल्लेख मिलता है जिनके द्वारा मनुष्य इस संसार में रहते हुए अपनी सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है। विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विभिन्न प्रकार की सामग्रियों द्वारा पूजा अर्चना का विधान है। उपर्युक्त पदार्थ यदि रत्न के बने हों, तो सर्वोत्तम और यदि स्वर्ण के हों तो उत्तम होते हैं। इन दोनों के अभाव में क्रमानुसार रजत ताम्र या किसी अन्य धातु अथवा किसी पत्थर, काष्ठ या कागज से बनी सामग्री का उपयोग कर सकते हैं। इस प्रकार से रत्न की वस्तुएं सर्वाधिक प्रभावशाली मानी गई हैं। अन्यथा स्वर्णनिर्मित रत्नजड़ित वस्तुएं उत्तम मानी गई हैं। इसी प्रकार से देवताओं के आवाहन एवं मंत्र सिद्धि के लिए स्वर्ण निर्मित यंत्रों के उपयोग का उल्लेख मिलता है। इसके अभाव में धातु निर्मित स्वर्णयुक्त यंत्रों को उत्तम माना गया है। उपयोगिता के अनुसार कुछ वस्तुओं का उपयोग निम्न प्रकार से है: विभिन्न मालाएं: विभिन्न मंत्रों के जप तथा कामनाओं की पूर्ति के लिए विभिन्न प्रकार की मालाएं प्रयोग की जाती हैं जैसे शिव मंत्र के लिए रुद्राक्ष माला, लक्ष्मी मंत्र के लिए कमल गट्टे की माला, सरस्वती मंत्र के लिए सफेद चंदन की माला, मंगल मंत्र के लिए लाल चंदन या मूंगे की माला, गुरु मंत्र के लिए हल्दी माला, दुर्गा मंत्र के लिए स्फटिक माला, महामृत्युंजय मंत्र या स्वास्थ्य वृद्धि के लिए पारद माला, शांति लाभ के लिए तुलसी माला, प्रेमवृद्धि के लिए फिरोजा माला, आकर्षण के लिए वैजयंती माला, नवग्रह शांति के लिए नवरत्न माला आदि। यंत्र: शास्त्रों में अनेक प्रकार के यंत्रों का उल्लेख मिलता है। मंत्रों को सिद्ध करने के लिए यंत्रों की स्थापना आवश्यक है। स्वर्ण पत्र पर निर्मित यंत्र सर्वोत्तम, रजत पत्र पर उत्तम एवं ताम्र पत्र पर मध्यम होता है। भोजपत्र पर भी यंत्र बनाए जाते हैं। इन सभी के अभाव में यंत्रों का निर्माण कागज या दीवार पर भी किया जा सकता है। यंत्र पर अंकित ज्यामितिक रेखाएं व मंत्र ही यंत्र का निर्माण करते हैं। विभिन्न प्रकार के फलों की प्राप्ति के लिए अनेक यंत्रों के एक साथ उपयोग का विधान भी है। श्री यंत्र: दरिद्रता दूर करने एवं सुख समृद्धि की वृद्धि के लिए श्री यंत्र की स्थापना सर्वोत्तम मानी गई है। धन धान्य की पूर्ति के लिए स्फटिक श्री यंत्र या स्वर्णनिर्मित श्री यंत्र, स्वास्थ्य के लिए पारद श्री यंत्र, शक्ति एवं ऊर्जा के लिए सनसितारा निर्मित श्री यंत्र, विजय के लिए मूंगे के श्री यंत्र, ज्ञानवृद्धि के लिए मरगज या पन्ने के श्री यंत्र और ग्रह शांति के लिए अष्टधातु के श्री यंत्र की स्थापना उत्तम फलदायक होती है। नवरत्न: रत्न ग्रहों की रश्मियों को एकत्रित करने में अतिसक्षम होते हैं। इन्हें धारण कर ग्रहों के अनुकूल प्रभाव को संवर्धित किया जाता है। नवरत्न लाॅकेट: यह सभी साधकों के लिए लाभकारी होता है। जिस व्यक्ति को अपनी जन्मतिथि जन्म समय आदि पता न हों, वह इसे धारण कर सकता है। यह सभी नौ ग्रहों का प्रतीक है। यह अशुभ ग्रहों के प्रभाव को दूर करता है। दक्षिणावर्ती शंख: यह भगवान विष्णु का प्रतीक है। इसे पूजा स्थल पर रखने और इससे सूर्य को अघ्र्य देने से धन धान्य और यश सम्मान की प्राप्ति होती है। गोमती चक्र: यह समुद्र में पाया जाता है। यह लक्ष्मी नारायण का प्रतीक है एवं धन प्रदायक है। एकाक्षी नारियल: यह नारियल शिव का प्रतीक है और शिव की आराधना के लिए इसकी पूजा अत्यंत शुभ मानी गई है। शालिग्राम: यह नदी में पाया जाता है एवं इसके अंदर विष्णु के प्रतीक सुदर्शन चक्र के चिह्न पाए जाते हैं। शालिग्राम की पूजा विष्णु भगवान की आराधना मानी जाती है। श्वेतार्क गणपति: यह श्वेत आक की जड़ में मिलता है। यह अत्यंत दुर्लभ है। इसे पूजा स्थल पर रखने से सारे विघ्न दूर हो जाते हैं। पिरामिड: जीवन को सुखमय बनाने के लिए पिरामिड का उपयोग किया जाता है। इससे जातक को आकाशीय ऊर्जा मिलती है। इंद्रजाल: यह समुद्र में पाया जाता है। इसके दर्शन से भूत प्रेत जनित और अन्य ऊपरी बाधाएं दूर हो जाती हैं। काले घोड़े की नाल: यह शनि के प्रभाव को कम करता है। व्यक्ति के अपने ऊपर चल रहे शनि के बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए इसे निवास या व्यापार स्थान के मुख्य द्वार पर अंग्रेजी के यू आकार में लगाना चाहिए। सच्ची श्रद्धा से एवं शाास्त्रानुसार उचित सामग्री प्रयोग कर मंत्र द्वारा पूजा अर्चना करने से शुभ फल शीघ्र अवश्य मिलते हैं।
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Monday, 18 January 2016
राहु द्वारा निर्मित योग और उनका फल
ज्योतिष में राहु नैसर्गिक पापी ग्रह के रूप में जाना जाता है। राहु को Dragon's Head तथा North Node के नाम से भी जाना जाता है। राहु एक छाया ग्रह है। इनकी अपनी कोई राषि नहीं होती। अतः यह जिस राषि में होते हैं उसी राषि के स्वामी तथा भाव के अनुसार फल देते हैं। राहु केतु के साथ मिलकर कालसर्प नामक योग बनाता है जो कि एक अषुभ योग के रूप में प्रसि़द्ध है। इसी प्रकार यह विभिन्न ग्रहों के साथ एवं विभिन्न स्थानों में रहकर अलग-अलग योग बनाता है जो कि निम्न है-- अष्टलक्ष्मी योग जब राहु जन्म कुण्डली के छठे भाव में होता है और बृहस्पति केन्द्र में होता है तब इस योग का निर्माण होता है। अष्टलक्ष्मी योग से अभिप्राय है व्यक्ति सभी प्रकार के सुख साधन सम्पन्नता को प्राप्त करता है। अष्ट लक्ष्मी आठ प्रकार की लक्ष्मीेे को सूचित करती है-- (1) धन लक्ष्मी योग (2) धान्य लक्ष्मी योग (3) धैर्य लक्ष्मी योग (4) विजय लक्ष्मी योग (5) आदि लक्ष्मी योग (6) विद्या लक्ष्मी योग (7) गज लक्ष्मी योग (8) सन्तान लक्ष्मी योग जिस जातक का इस योग में जन्म होता है वह सभी तरह की सफलता (Eight fold Prosperity) को प्राप्त करता है। लेकिन इस योग के पूर्ण फल की प्राप्ति तभी सम्भव है जबकि राहु और बृहस्पति दोनों जन्म कुण्डली में मजबूत स्थिति में हों। कपट योग चतुर्थ भाव में जब पापी ग्रह हांे या चतुर्थ भाव के स्वामी को पापी ग्रह देखते हों या उसके साथ युति संबंध बनाते हों तब इस योग का निर्माण होता है। चतुर्थ भाव में राहु जब शनि या मंगल के साथ हो तथा चतुर्थेष भी पाप प्रभाव में हो तब कुण्डली में कपट योग का निर्माण होता है। ऐसा व्यक्ति दुष्ट स्वभाव का, धोखा देने वाला तथा स्वार्थी स्वभाव का होता है। इनका चरित्र भी संदेहास्पद होता है । श्रापित योग जब राहु शनि के साथ एक ही राषि में होता है तो इस योग का निर्माण होता है। कुछ ज्योतिषियों के अनुसार शनि पर राहु का दृष्टि प्रभाव भी इस योग का निर्माण करता है। इस योग में जातक की कुंडली पूर्व जन्म के कारण श्रापित ;ब्नतेमक भ्वतवेबवचमद्ध हो जाती है जिसके कारण व्यक्ति को इस जन्म में मानसिक, आर्थिक, शारीरिक परेषानियों तथा साथ ही विवाह में परेषानियां, संतति प्राप्ति में परेषानियाँ हो सकती हैं। चांडाल योग गुरु और राहु की युति से इस योग का निर्माण होता है। यह एक अषुभ योग है। यह योग जिस जातक की कुंडली में निर्मित होता है उसे राहु के पाप प्रभाव को भोगना पडता है। इस योग की स्थिति में जातक को आर्थिक तंगी का सामना करना पडता है, नीच कर्मों के प्रति झुकाव रहता है तथा ईष्वर के प्रति आस्था का अभाव रहता है। कालसर्प योग जब सभी ग्रह राहु और केतु के बीच में स्थित होते हैं तो इस योग का निर्माण होता है। कालसर्प योग वाले सभी जातकों पर इस योग का समान प्रभाव नहीं पड़ता। राहु तथा केतु किस भाव में है तथा कौन सी राषि में है और अन्य ग्रह कहाँ-कहाँ बैठे हैं, और उनका बलाबल कितना है ये सभी बिंदु कालसर्प योग के फल को प्रभावित करते हैं। जिस जातक की कुंडली में राहु दोष या कालसर्प योग होता है उसे साधारणतया सपने में सर्प दिखायी देते हैं, पानी में डूबना, उँचाई से गिरना आदि घटनाएं हो सकती हैं। ग्रहण योग जब जन्म कुण्डली में सूर्य या चन्द्रमा की युति राहु से होती है तो ग्रहण योग बनता है। इस छाया ग्रह की युति सूर्य के साथ होने से सूर्य ग्रहण तथा चन्द्रमा के साथ होने से चन्द्र ग्रहण बनता है जिसका प्रभाव व्यक्ति विषेष के जीवन पर पड़ता है।
Sunday, 17 January 2016
क्या आप बन पाएंगे सफल इंजीनियर
राहु-केतु छाया ग्रह हैं, परंतु उनके मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव के आधार पर हमारे तत्ववेत्ता ऋषि-मुनियों ने उन्हें नैसर्गिक पापी ग्रह की संज्ञा दी है। केतु को ‘कुजावत’ तथा राहु को ‘शनिवत्’ कहा गया है। परंतु जहां शनि का प्रभाव धीरे-धीरे होता है, राहु का प्रभाव अचानक और तीव्र गति से होता है। राहु-केतु कुंडली में आमने-सामने 1800 की दूरी पर रहते हैं और सदा वक्र गति से गोचर करते हैं। राहु ‘इहलोक’ (सुख-समृद्धि) तथा केतु ‘परलोक’ (आध्यात्म), से संबंध रखता है। यह कुंडली के तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में अच्छा फल देते हैं। सूर्य और चंद्रमा से राहु की परम शत्रुता है। शुभ ग्रहों से युति व दृष्टि संबंध होने पर राहु सभी प्रकार के सांसारिक -शारीरिक, मानसिक और भौतिक -सुख देता है, परंतु अशुभ व पापी ग्रह से संबंध कष्टकारी होता है। फल की प्राप्ति संबंधित ग्रह के बलानुपात में होती है। राहु से संबंधित अशुभ ग्रह की दशा जितने कष्ट देती है, उससे अधिक कष्टकारी राहु की दशा-भुक्ति होती है। राहु द्वारा ग्रसित होने पर सूर्य अपने कारकत्व - पिता, धन, आदर, सम्मान, नौकरी, दाहिनी आंख, हृदय आदि- संबंधी कष्ट देता है। बहुत मेहनत करने पर भी लाभ नहीं मिलता। साथ ही सूर्य जिस भाव का स्वामी होता है उसके फल की हानि होती है। व्यक्ति के व्यवहार में दिखावा, घमंड व बड़बोलापन अंततः हानिकारक सिद्ध होता है। राहु द्वारा ग्रस्त होने पर चंद्रमा जातक की माता को कष्ट देता है। पारिवारिक शांति भंग होती है। जातक स्वयं छाती, पेट, बाईं आंख के रोग, या मानसिक संताप से ग्रसित होता है। उसे डर, असमंजस और चिंता के कारण नींद नहीं आती और वह बुरी आदतों में लिप्त हो जाता है। चंद्रमा के निर्बल और पीड़ित होने पर जातक हताशा में आत्महत्या तक कर लेता है। राहु द्वारा ग्रसित होने पर मंगल जातक को उग्र व क्रोधी बनाता है। वह चिड़चिड़ा और आक्रामक बन जाता है तथा समाज और कानून विरोधी कार्य करता है, लड़ाई-झगड़ा, संपत्ति हानि, चोट, फोड़ा-फुंसी, पित्त व रक्त-विकार, बुखार आदि की संभावना बढ़ जाती है। मंगल के स्वामित्व वाले भावों संबंधी कार्यों में अवरोध व हानि होती है। राहु द्वारा शुक्र के ग्रसित होने पर व्यक्ति अपनी सुख-सुविधाओं को अनैतिक रूप से प्राप्त करता है। उसे चेहरा, गला, आंख, किडनी, प्रजनन प्रणाली ओर यौन रोग की संभावना रहती है। व्यक्ति फिजूल-खर्ची करता है। उसके अन्य स्त्रियों से संबंध होते हैं, जो कष्टकारी सिद्ध होता है। राहु द्वारा बुध के ग्रस्त होने पर व्यक्ति के आचार-विचार में विकृति आती है। पढ़ाई में विघ्न तथा विद्या से लाभ नहीं होता। वह झूठ और बेईमानी का सहारा लेता है। उसे छाती, स्नायु, चर्म और पाचन संबंधी रोग होते हैं। राहु द्वारा बृहस्पति के ग्रस्त होने पर व्यक्ति को पुत्र, विद्या, धन, गुरु, धर्म, आदर, मान तथा सुख-समृद्धि में अवरोध आते हैं। उसे लिवर, मधुमेह, रक्त, हृदय, ट्यूमर, नासिका और चर्बी के रोग होते हैं। बृहस्पति के स्वामित्व वाले भावों संबंधी कार्यों में परेशानियां आती हैं। व्यक्ति की सोच में विकृति आती है। उसके संकुचित और अधार्मिक मार्ग अपनाने से मान-सम्मान में कमी आती है, वह दुखी रहता है। बृहस्पति से संबंध होने पर राहु के दुष्प्रभाव में कमी आती है। इस युति को ‘गुरु’ चंडाल योग’ कहते हैं। राहु द्वारा शनि का ग्रस्त होना सर्वाधिक अनिष्टकारी होता है। व्यक्ति को जीवन में दुख, कष्ट, अवरोध, बीमारी, धन हानि, और तिरस्कार मिलता है। व्यक्ति को सर्दी, जुकाम, पाचन क्रिया, तिल्ली, दांत व हड्डियों के रोग तथा अस्थमा, लकवा और गठिया जैसे दीर्घकालीन रोग होते हैं। इस प्रकार राहु तथा शनि का संबंध कुंडली के फलों में अनेक प्रकार के अवरोध लाता है। राहु के शनि से अगले भाव में स्थित होने पर जातक बहुत नीचे स्तर पर कार्य आरंभ करता है। उसकी प्रगति में अनेक बाधाएं आती हैं। वह असंतुष्ट रहता है। शिक्षा प्राप्ति की आयु में नैसर्गिक अशुभ ग्रहों से संबंधित राहु की दशा-भुक्ति ध्यान केन्द्रित नहीं होने देती और सफलता कठिनाई से मिलती है। राहु पर शुभ प्रभाव होने से टेकनिकल, इंजीनियरिंग, कंप्यूटर और डाॅक्टरी शिक्षा में सफलता मिलती है। राहु के केंद्र या त्रिकोण भाव में, त्रिकोण व केंद्र के स्वामी के साथ स्थित होने पर उसकी अपनी दशा-अंतर्दशा राजयोगकारी फल प्रदान कर व्यक्ति के जीवन को सुखी व समृद्धशाली बनाती है। इस प्रकार शुभ प्रभाव में राहु अपनी दशा-भुक्ति में शुभ फल तथा अशुभ प्रभाव में कष्ट देता है। अतः कुंडली में राहु के प्रभाव और भाव स्थिति का पूर्ण आकलन कर लेने से भविष्य कथन में परिपक्वता आती है। राहु प्रदत्त कष्ट निवारण के लिए प्रति दिन एक माला राहु मंत्र (ऊँ रां राहुवे नमः) का जप, तथा विशेषकर अमावस्या तिथि को एक, तीन या पांच कोढ़ियों को सरसों के तेल से बनी सब्जी, रोटी व एक गुड़-तिल का लड्डू स्वयं दान कर, साथ में कुछ दक्षिणा भी देना चाहिए।
आत्मघात और ज्योतिष
आत्मघात के बारे में प्रायः नित्य ही समाचार मिल जाता है। फांसी लगाकर, जल कर, विष खाकर, ऊंचे स्थान से गिरकर, रेल से कट कर, नस काटकर आदि। शास्त्रों में आत्मघात करना पाप माना गया है, क्योंकि शरीर परमात्मा का दिया हुआ है, उसका वास स्थान है, अतः इसे नष्ट करना उचित नहीं है। आत्महत्या या आत्मघात का अर्थ है स्वयं इस शरीर को नष्ट करना या समाप्त कर देना। जिस वातावरण में मनुष्य निराशा की चरम सीमा पर होता है, स्वयं को समाप्त कर उस वातावरण से छुटकारा पाना चाहता है। यदि थोड़ी सी भी समझदारी, बुद्धिमानी उस समय आ जाये तो वह स्वयं को उस वातावरण से दूर ले जा सकता है और उन परिस्थितियों से तथा जन-बंधुओं से पूर्णतया अलग हो सकता है। अब यह प्रश्न उठता है कि कोई भी व्यक्ति ऐसा कठिन कदम क्यों उठाता है। नैराश्य के घोर अंधकार में जब कहीं से भी कोई आस की किरण नहीं आती तब व्यक्ति स्वयं को गहन अवसाद से मुक्ति दिलाने के लिए स्वयं को ही समाप्त कर देता है। मानव का जीवन के प्रति उत्साह समाप्त हो गया हो, निराशा में मन डूब गया हो, कहीं से कोई सहानुभूति न मिल रहे हो तब जीवन के प्रति अनासक्ति होने लगती है। ऐसी स्थिति का कारण कुछ भी हो सकता है। शरीर रोग अथवा पीड़ा से ग्रस्त हो, मन को स्वजनों तथा अन्य व्यक्तियों से अत्यधिक मानसिक पीड़ा मिल रही हो, व्यवसाय में इतनी हानि हो गई हो कि भरपाई करना कठिन हो गया हो, समाज में अथवा अपने कार्य स्थान में असम्मान, निरादर, अपराधारोपण, मानहानि आदि हो, प्रेम में असफलता हो, परीक्षा में असफलता मिली हो, मन की इच्छाएं-आकांक्षाएं पूरी न हो पा रही हों आदि। इन सब परिस्थितियों में मन में निराशा भर जाती है और मन में निराशा भर जाने से जीवन व्यर्थ सा लगने लगता है। तब धैर्य साथ छोड़ देता है और मन इतना दुर्बल हो उठता है कि जीवन समाप्त करना ही एकमात्र उपाय लगता है। ऐसे में अच्छे-बुरे की परख नहीं रह जाती और सोचने-विचारने की क्षमता समाप्त हो जाती है। मन का कारक चंद्र है। मन की दुर्बलता को चंद्र की दुर्बलता से आंकंे। जब चंद्र पर पाप प्रभाव हो या चंद्र क्षीण हो या उस पर मारक ग्रहों का प्रभाव हो, षष्ठेश, सप्तमेश और अष्टमेश का चंद्र से संबंध हो तब मन की निराशा गंभीर हो उठती है। लग्न से संबंध हो, द्वितीयेश, तृतीयेश अथवा द्वादशेश के प्रभाव में चंद्र हो तो मानसिक दुर्बलता बढ़ जाती है। बुध तथा गुरु दुष्प्रभाव में हों तो बुद्धि के भ्रष्ट होने की संभावना बढ़ जाती है। सूर्य आत्माकारक ग्रह है। यदि यह मारक स्थान में हो अथवा मारकेश के प्रभाव में हो तो व्यक्ति आत्महत्या कर सकता है। विशेष रूप से यदि यह स्थिति गोचर में बन रही हो तो आत्महत्या की संभावना बनती है। आत्महत्या के प्रयास में व्यक्ति बचेगा या उसे शारीरिक कष्ट होगा या शरीर और जीवन दोनों ही सलामत रहेंगे, यह सब ग्रहों व उनके प्रभाव पर निर्भर करेगा। यहां कुछ कुंडलियों का विश्लेषण प्रस्तुत है। क्योंकि आत्महत्या का प्रयास एक क्षणिक उन्माद में किया गया तात्कालिक कर्म है, अतः उस समय के गोचर का अध्ययन महत्वपूर्ण है।
बुध ग्रह
बुध के जन्म की कथा काफी अद्भुत तथा उत्तेजक है। यदि हम उस काल की ओर लौटें जबकि यह घटनाएं हुई थीं तो इन घटनाओं ने सृष्टि में काफी उथल-पुथल मचा दी थी। शुरू में बुध को अपनाने के लिए कोई भी तैयार नहीं था तथा इसके पितृत्व को लेकर बहुत विवाद तथा उलझन थी, जिसके परिणाम में बुध को शुरू में एक परित्यक्त बालक का जीवन जीना पड़ा किंतु बाद में उसकी प्रतिभाओं को देखकर उसके पिता ने आगे आकर उसे अपना पुत्र स्वीकार किया। कथा के अनुसार चंद्रमा, बृहस्पति का शिष्य था तथा उनसे संसार के विभिन्न शास्त्रों की विद्या प्राप्त कर रहा था। बृहस्पति एक बड़ी आयु के व्यक्ति थे परंतु उनकी पत्नी नवयौवना व रूपमति थी जिसका नाम तारा था। चंद्रमा भी रूपवान और आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे। अतः चंद्रमा व तारा एक-दूसरे की ओर आकर्षित हुए तथा परस्पर प्रेम में डूब गए। कथा के अनुसार चंद्रमा तारा को लेकर लुप्त हो गया तथा दोनो हजारों वर्षों से भी अधिक साथ-साथ रहे, इतने समय के सहवास के बाद तारा के गर्भ धारण करने पर चंद्रमा ने तारा को त्याग दिया। इस बीच बृहस्पति तारा को खोजते रहने पर भी उसका पता नहीं लगा पाए, किंतु चंद्रमा द्वारा त्यागे जाने पर तारा पुनः अपने पति के पास लौट आई। बृहस्पति को तारा के जब कुछ माह से गर्भवती होने का ज्ञान हुआ तो वह बहुत क्रोधित हुए, इस क्रोध के मारे उन्होंने तारा के गर्भ से उस जीव को खींचकर बाहर निकालकर जमीन पर फेंक दिया, भले ही वह गर्भ अभी कुछ माह का ही था किंतु उसमें से सभी को चकित करता हुआ अति सुंदर बालक बुध जन्म लेकर खेलने लगा, वह बालक इतना सुंदर व गुणवान था कि बृहस्पति उसे देख बहुत प्रसन्न हुए तथा उन्होने सहर्ष ही उसका पिता होना स्वीकार कर लिया। ऐसी मान्यता है कि चन्द्रमा का वीर्य इतना शक्तिवान था कि बुध का जन्म तो होना ही था चाहे वह पूर्ण मास पूरा करने पर हुआ होता या नौ मास होने से पूर्व। बृहस्पति सभी से कहने लगे क्योंकि बुध का जन्म उनकी पत्नी तारा से हुआ है अतः वह ही उसके पिता हैं। चंद्रमा जो कि सत्य को जानता था, उसने इस अफवाह को फैलाया कि बूढ़े और अशक्त बृहस्पति ऐसे रूपवान पुत्र के पिता हो ही नहीं सकते और वास्तव में वह ही बुध के पिता हंै। इस अफवाह की चर्चा काफी समय तक होती रही तथा बुध के वास्तविक पिता का प्रश्न संसार में अपकीर्ति का विषय बना रहा। अंततः प्रजापति ब्रह्मा जी ने इस अफवाह को शांत करने का प्रयास प्रारंभ किया तथा बृहस्पति की पत्नी तारा को बुलाया तथा इस अफवाह के सत्य के विषय में पूछा। यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि माता ही बालक के पिता के विषय में बता सकती है। तारा ने प्रजापति ब्रह्मा को सब कुछ सच-सच बता दिया कि वास्तव में चंद्रमा ही बुध के पिता हैं। बुध के जन्म का संबंध चूंकि बृहस्पति और चन्द्रमा के साथ है, अतः कल्पनाशीलता तथा बुद्धिमत्ता के दो गुण उसमें नैसर्गिक रूप से ही विद्यमान हैं किंतु उसका स्वभाव दोनों ही से भिन्न है तथा उसके इस स्वतंत्र व्यक्तित्व को किसी भी प्रकार से चुनौती नहीं दी जा सकती। बुध संसार में बुद्धि का स्वामी है। अपनी बुद्धि के सही प्रयोग द्वारा वह कल्पना और ज्ञान की सीमाओं में न बंधकर बुद्धिमत्तापूर्ण प्रयासों से सत्य को प्राप्त करता है। उसका यही गुण उसे अन्य ग्रहों से अलग पहचान देता है। मानव बुद्धि में तर्क और चिंतन का स्वामी होने के कारण बुध सबका चहेता और प्रिय है। चेतना की उच्च शक्तियों के अनुभव के बिना विद्वान और ज्ञान की ऊंचाइयां पाना संभव नहीं है अतः बुध को स्वतः ही एक उच्चतम् स्थान प्रदान करता है। विज्ञान अथवा दर्शन में अपने पक्ष को सिद्ध करने के लिए हमें तर्क, चिन्तन व विश्लेषण की शक्तियों का उपयोग करना पड़ता है और यही बुध का क्षेत्र है। बुध, मिथुन व कन्या राशि का स्वामी है। ये दोनों ही अस्वाभाविक राशियां हैं। मिथुन वायु तत्व की राशि है और कन्या पृथ्वी तत्व की। ऐसी मान्यता है कि विचार वायु मार्ग से गति करते हैं तथा पृथ्वी पर स्थापित होते हैं। यहां पृथ्वी से हमारा अभिप्राय संसार से है। यदि हम मिथुन के स्वभाव का ध्यान पूर्वक अध्ययन करं तो हम पाते हैं कि विचारों का जन्म तो वायु में होता है और द्विस्वभाव राशि में जन्म के कारण विचारों में नैसर्गिक द्वि स्वभाव बना रहता है। कन्या में कोई भी विचार आरंभ से ही द्विस्वभावी रहता है, पूर्ण अध्ययन तथा बाद में जीवन में कार्यरूप लेने के पश्चात भी वह अपने द्विस्वभाव रूप को बनाए रखता है। अतः इस संसार में कुछ भी स्थायी स्वभाव वाला अथवा अपरिवर्तनीय बुध में नहीं है। शायद इसी कारण इस संसार के एक प्रमुख धर्म मुख्य रूप से बौद्ध धर्म के अनुसार यह संसार निरंतर परिवर्तनों से परिपूर्ण है। विज्ञान भी इस मूल सत्य से दूर नहीं है जहां नित्य नई खोजें निरंतर पुराने विचारों में परिवर्तन लाती रहती हं। तार्किक चिंतन का यह स्वभाव है कि वह प्रत्येक अनुभव और सत्य के परिपेक्ष्य में बदलता रहता है। संसार की प्रत्येक घटना को बहुत ही सुंदर ढंग से सिद्ध किया जा सकता है जो सुनने में बहुत विश्वसनीय और प्रभावी प्रतीत होती है। इसी बात को कुछ अधिक स्पष्टता से समझाने के लिए हम एक कहानी का सहारा लेंगे: बुध दर्शाता है कि कैसे व्यक्ति परिस्थितियों का संकलन करता है तथा उससे अधिकतम लाभ प्राप्त कर सकता है। इस प्रक्रिया में वह अपने जीवन के समस्त अनुभव तथा ज्ञान को अपनी परिकल्पना द्वारा इस प्रकार पुनः स्थापित और नियोजित करता है कि वह पूर्ण रूपेण तर्कसंगत लगे। शायद इसीलिए बुध को द्विस्वभाव वाला माना जाता है। बुध की यह प्रकृति दो विभिन्न स्तरों पर काम करती दिखाई देती है। पहला उच्च बौद्धिकता का वह स्तर है जहां गहरा विश्वास, तार्किक विश्लेषण तथा नकार एवं शून्यता के ज्ञान द्वारा दिव्य अनुभूतियों का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करना है। वेदों में उच्चतर ईश्वरीय ज्ञान प्राप्ति का एक मार्ग सभी के नकार द्वारा अंतिम सत्य को पाने का मार्ग भी है जिसे कि नेति-नेति (यह नहीं, यह भी नहीं) के सिद्ध त के नाम से जाना जाता है। वहीं दूसरे स्तर स्वार्थप्रियता, छल, प्रपंच, अतार्किकता, मानसिक असंतुलन या मूर्खता मुखर होती प्रतीत होती है। यदि हम विशेष ध्यान दें तो बुध के व्यवहार में निर्लिप्तता और भाव शून्यता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। यद्यपि विभिन्न मानसिक वृत्तियों से जनित भावनाएं इसकी कथा को भावनात्मक रंग देते हुए दिखाई देती हैं किंतु मूल भाव फिर भी बात को कहने का अंदाज बुरे को बुरा कहने का तथा तथ्यों को सबके सम्मुख सीधे-सीधे रखने का ही रहता है। इससे प्रतीत होता है मानो, संवाद के नियमों के अनुरूप अपने विचारों से लोगों को सोचने को बाध्य करते हुए सभी सत्यों से उन्हें अपगत कराने का प्रयास है। अवचेतन के स्तर पर यह इच्छा प्रतीत होती है कि चेतन में तथ्यों को इस रूप में प्रस्तुत किया जाए कि वह न केवल प्रभावशाली लगे बल्कि आंतरिक भावनाओं को भी एक सार्वभौमिक अभिव्यक्ति प्रदान करे। व्यक्तित्व के अवचेतन भावों को चेतन के स्तर पर लाने का एक प्रयास रहता है। फिर वह अवचेतन का खंडन चाहे हीरों की खान हो अथवा उसमें कोयला भरा हो, अतः बुध का प्रभाव मानवता के लिए नितांत आवश्यक हो जाता है क्योंकि यह अपनी तार्किकता की तीक्ष्णता से अतिवाद को दोनों ओर से काटता है। दूसरों के साथ गहराई से जुड़ने के लिए यह जरूरी है कि व्यक्ति पहले अपने आप से संवाद स्थापित करे तथा अपने अंतः करण को स्पष्टता से जाने। इस आंतरिक और बाध्य जगत में तारतम्यता और सौहार्दपूर्ण संबंध हुए बिना व्यक्ति वास्तविक उन्नति नहीं कर सकता। इस लक्ष्य को पाने के लिए अनुभव, विचारों व विश्लेषण को दूसरों से बांटना होता है। यह वैयक्तिक आदान-प्रदान तब तक चलता रहता है जब तक कि पूर्णता को प्राप्त न कर लें अर्थात समस्त सुझाव, ज्ञान, चिन्तन को एक सूत्र में न पिरो लें। अपने को सृजनात्मक अभिव्यक्ति देने के लिए विश्लेषण की महान योग्यता, ज्ञान की तीव्र जिज्ञासा तथा विश्व की नई खोजों और अवधारण् से संबंध की आवश्यकता होती है। जहां सृजन है वहां विध्वंस भी दूर नहीं रहता। अतः विपरीत बुध शक्ति और सामंजस्य को भंग करने के लिए अपनी विपरीत सोच और तार्किकता के प्रयोग भी उसी उग्रता से करता है। वाणी, वाद-विवाद, तर्क, संघर्ष तथा अपने मत को पूर्ण परिपक्वता से प्रस्तुत करना बुध का काम है तथा उसे सही अथवा गलत किसी भी प्रकार से प्रयोग करने में वह सक्षम है। बुध, मिथुन और कन्या राशि का स्वामी है। बुध कन्या राशि में 0 अंश से 15 अंश तक का उच्च माना जाता है तथा 15 अंश पर उच्चतम होता है तथा राशि के 16 अंश से 20 अंश तक वह अपने मूल त्रिकोण में होता है तथा शेष 21 से 30 अंश तक वह कन्या राशि को अपनी राशि मानता है। मीन राशि में यह नीच का होता है तथा 15 अंश पर नीचतम माना जाता है।
क्रिकेटर बनने के ग्रह योग
एक खिलाड़ी की जन्मकुंडली में चाहे कितने ही अच्छे योग क्यों न हों, यदि उसमें खेल विशेष से संबंधित अच्छे योग नहीं हैं, तो उसका करियर अधिक समय तक नहीं रह पाता है। बात क्रिकेट की करें तो हम देखते हैं कि प्रतिस्पद्र्धा के इस दौर में आये दिन खिलाड़ियों के चेहरे बदलते रहते हैं। इनमें से अधिकांश खिलाड़ी ऐसे होते हैं जो कुछ दिनों तक धूमकेतु अथवा पुच्छल तारे की भांति चमकते हैं और फिर लंबे समय के लिए गायब हो जाते हैं जबकि उन्हीं में से कुछ ऐसे भी खिलाड़ी होते हैं जो ध्रुव तारे की भांति अपना अलग ही स्थान बनाकर नित नये कीर्तिमान स्थापित करते रहते हैं। ऐसे खिलाड़ियों की जन्मकुंडली में निश्चित रूप से क्रिकेट संबंधी अच्छे योग पाये जाते हैं। ज्योतिष में क्रिकेट से संबंधित निम्नलिखित महत्वपूर्ण योग पाये जाते हैं- 1- लग्नेश, द्वितीयेश, तृतीयेश, नवमेश, दशमेश, एकादशेश में कोई चार या अधिक ग्रह शुभ स्थिति में हों। 2- तृतीयेश, षष्ठेश, अष्टमेश एवं द्वादशेश में दो या दो से अधिक ग्रहों की युति या दृष्टि संबंध हो। 3- दशमेश की तृतीयेश या अष्टमेश के साथ युति या दृष्टि संबंध हो। 4- अष्टमेश की युति या दृष्टि संबंध एकादशेश के साथ हो। 5- लग्न, तृतीय, षष्ठ, अष्टम, दशम या एकादश भाव पर मंगल, शनि या राहु की स्थिति हो। 6- लग्नेश, तृतीयेश, षष्ठेश, अष्टमेश, दशमेश या एकादशेश पर मंगल, शनि या राहु की दृष्टि हो अथवा युति संबंध हो। 7- तृतीयेश लग्न, तृतीय, नवम, दशम या एकादश में स्थित हो। 8- दशमेश लग्न, तृतीय, चतुर्थ या दशम भाव में स्थित हो। 9- गुरु की स्थिति या दृष्टि लग्न, तृतीय, षष्ठ, दशम या एकादश पर हो। 10- षष्ठेश, अष्टमेश एवं द्वादशेश अपने ही स्थान पर या परस्पर एक-दूसरे के स्थान पर स्थित हों। 11- विदेश यात्रा के चार-पांच अच्छे योग हों। उपर्युक्त ग्रह योगों को कुछ विश्व प्रसिद्ध क्रिकेटरों की कुंडलियों में देखना होगा। 12- लग्नेश शुक्र सप्तम भाव में उच्चराशिस्थ एकादशेश सूर्य के साथ युति करके शुभ स्थिति में है तथा चतुर्थ भाव में उच्च राशिस्थ द्वितीयेश मंगल के साथ तृतीय भाव का स्वामी गुरु भी युति करके शुभ स्थिति में है। इस प्रकार केंद्र में स्थित लग्नेश, द्वितीयेश, तृतीयेश और एकादशेश चारों ग्रह अपनी शुभ स्थिति में है। 13- अष्टमेश शुक्र की एकादशेश सूर्य के साथ युति है, जिन पर राहु की पंचम तथा मंगल की चतुर्थ दृष्टि है। 14- दशमेश चंद्रमा की तृतीय भाव में राहु के साथ युति है। 15- तृतीयेश गुरु की चतुर्थ भाव में मंगल के साथ युति है जिनकी संयुक्त दृष्टि दशम भाव पर है। 16- विदेश यात्रा के चार-पांच अच्छे ग्रह योग हैं।
षोडश वर्ग
षोडश वर्ग का फलित ज्योतिष में विशेष महत्व है। जन्मपत्री का सूक्ष्म अध्ययन करने में यह विशेष सहायक है। इन वर्गों के अध्ययन के बिना जन्म कुंडली का विश्लेषण अधूरा होता है क्योंकि जन्म कुंडली से केवल जातक के शरीर, उसकी संरचना एवं स्वास्थ्य के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है, लेकिन षोडश वर्ग का प्रत्येक वर्ग जातक के जीवन के एक विशिष्ट कारकत्व या घटना के अध्ययन में सहायक होता है। जातक के जीवन के जिस पहलू के बारे में हम जानना चाहते हैं उस पहलू के वर्ग का जब तक हम अध्ययन न करें तो विश्लेषण अधूरा ही रहता है। जैसे यदि जातक की संपत्ति, संपन्नता आदि के विषय में जानना हो, तो जरूरी है कि होरा वर्ग का अध्ययन किया जाए। इसी प्रकार व्यवसाय के बारे में पूर्ण जानकारी के लिए दशमांश की सहायता ली जाए। जातक के जीवन के विभिन्न पहलुओं को जानने के लिए किसी विशेष वर्ग का अध्ययन किए बिना फलित गणना में चूक हो सकती है। षोडश वर्ग में सोलह वर्ग होते हैं जो जातक के जीवन के विभिन्न पहलुओं की जानकरी देते हैं। जैसे होरा से संपत्ति व समृद्धि; द्रेष्काण से भाई-बहन, पराक्रम, चतुर्थांश से भाग्य, चल एवं अचल संपत्ति, सप्तांश से संतान, नवांश से वैवाहिक जीवन व जीवन साथी, दशांश से व्यवसाय व जीवन में उपलब्धियां, द्वादशांश से माता-पिता, षोडशांश से सवारी एवं सामान्य खुशियां, विंशांश से पूजा-उपासना और आशीर्वाद, चतुर्विंशांश से विद्या, शिक्षा, दीक्षा, ज्ञान आदि, सप्तविंशांश से बल एवं दुर्बलता, त्रिशांश से दुःख, तकलीफ, दुर्घटना, अनिष्ट; खवेदांश से शुभ या अशुभ फलों, अक्षवेदांश से जातक का चरित्र, षष्ट्यांश से जीवन के सामान्य शुभ-अशुभ फल आदि अनेक पहलुओं का सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है। षोडश वर्ग में सोलह वर्ग ही होते हैं, लेकिन इनके अतिरिक्त और चार वर्ग पंचमांश, षष्ट्यांश, अष्टमांश, और एकादशांश होते हैं। पंचमांश से जातक की आध्यात्मिक प्रवृत्ति, पूर्व जन्मों के पुण्य एवं संचित कर्मों की जानकारी प्राप्त होता है। षष्ट्यांश से जातक के स्वास्थ्य, रोग के प्रति अवरोधक शक्ति, ऋण, झगड़े आदि का विवेचन किया जाता है। एकादशांश जातक के बिना प्रयास के धन लाभ को दर्शाता है। यह वर्ग पैतृक संपत्ति, शेयर, सट्टे आदि के द्वारा स्थायी धन की प्राप्ति की जानकारी देता है। अष्टमांश से जातक की आयु एवं आयुर्दाय के विषय में जानकारी मिलती है। षोडश वर्ग में सभी वर्ग महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आज के युग में जातक धन, पराक्रम, भाई-बहनों से विवाद, रोग, संतान वैवाहिक जीवन, साझेदारी, व्यवसाय, माता-पिता और जीवन में आने वाले संकटों के बारे में अधिक प्रश्न करता है। इन प्रश्नों के विश्लेषण के लिए सात वर्ग होरा, द्रेष्काण, सप्तांश, नवांश, दशमांश, द्वादशांश और त्रिशांश ही पर्याप्त हैं। होरादि सात वर्गों का फलित में प्रयोग होरा: जन्म कुंडली की प्रत्येक राशि के दो समान भाग कर सिद्धांतानुसार जो वर्ग बनता है होरा कहलाता है। इससे जातक के धन से संबंधित पहलू का अध्ययन किया जाता है। होरा में दो ही लग्न होते हैं - सूर्य का अर्थात् सिंह और चंद्र का अर्थात् कर्क। ग्रह या तो चंद्र होरा में रहते हैं या सूर्य होरा में। बृहत पाराशर होराशास्त्र के अनुसार गुरु, सूर्य एवं मंगल सूर्य की होरा में और चंद्र, शुक्र एवं शनि चंद्र की होरा में अच्छा फल देते हैं। बुध दोनोें होराओं में फलदायक है। यदि सभी ग्रह अपनी शुभ होरा में हांे तो जातक को धन संबंधी समस्याएं कभी नहीं आएंगी और वह धनी होगा। यदि कुछ ग्रह शुभ और कुछ अशुभ होरा में होंगे तो फल मध्यम और यदि ग्रह अशुभ होरा में होंगे तो जातक निर्धन होता है। द्रेष्काण: जन्म कुंडली की प्रत्येक राशि के तीन समान भाग कर सिद्धांतानुसार जो वर्ग बनता है वह दे्रष्काण कहलाता है। दूसरे शब्दों में यह कुंडली का तीसरा भाग है। दे्रष्काण जातक के भाई-बहन से सुख, परस्पर संबंध, पराक्रम के बारे में जानकारी के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त इससे जातक की मृत्यु का स्वरूप भी मालूम किया जाता है। द्रेष्काण से फलित करते समय लग्न कुंडली के तीसरे भाव के स्वामी, तीसरे भाव के कारक मंगल एवं मंगल से तीसरे स्थित बुध की स्थिति और इसके बल का ध्यान रखना चाहिए। यदि द्रेष्काण कुंडली में संबंधित ग्रह अपने शुभ स्थान पर स्थित है तो जातक को भाई-बहनों से विशेष लाभ होगा और उसके पराक्रम में भी वृद्धि होगी। इसके विपरीत यदि संबंधित ग्रह अपने अशुभ द्रेष्काण में हों तो जातक को अपने भाई-बहनों से किसी प्रकार का सहयोग प्राप्त नहीं होगा। यह भी संभव है कि जातक अपने मां-बाप की एक मात्र संतान हो। सप्तांश वर्ग: जन्मकुंडली का सातवां भाग सप्तांश कहलाता है। इससे जातक के संतान सुख की जानकारी मिलती है। जन्मकुंडली में पंचम भाव संतान का भाव माना जाता है। इसलिए पंचमेश पंचम भाव के कारक ग्रह गुरु, गुरु से पंचम स्थित ग्रह और उसके बल का ध्यान रखना चाहिए। सप्तांश वर्ग में संबंधित ग्रह अपने उच्च या शुभ स्थान पर हो तो शुभ फल प्राप्त होता है अर्थात् संतान का सुख प्राप्त होता है। इसके विपरीत अशुभ और नीचस्थ ग्रह जातक को संतानहीन बनाता है या संतान होने पर भी सुख प्राप्त नहीं होता। सप्तांश लग्न और जन्म लग्न दोनों के स्वामियों में परस्पर नैसर्गिक और तात्कालिक मित्रता आवश्यक है। नवांश वर्ग: जन्म कुंडली का नौवां भाग नवांश कहलाता है। यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण वर्ग है। इस वर्ग को जन्मकुंडली का पूरक भी समझा जाता है। आमतौर पर नवांश के बिना फलित नहीं किया जाता। यह ग्रहों के बलाबल और जीवन के उतार-चढ़ाव को दर्शाता है। मुख्य रूप से यह वर्ग विवाह और वैवाहिक जीवन में सुख-दुख को दर्शाता है। लग्न कुंडली में जो ग्रह अशुभ स्थिति में हो वह यदि नवांश में शुभ हो तो शुभ फलदायी माना जाता है। यदि ग्रह लग्न और नवांश दोनों में एक ही राशि में हो तो उसे वर्गोमता हासिल होती है जो शुभ सूचक है। लग्नेश और नवांशेश दोनों का आपसी संबंध लग्न और नवांश कुंडली में शुभ हो तो जातक का जीवन में विशेष खुशियों से भरा होता है। उसका वैवाहिक जीवन सुखमय होता है और वह हर प्रकार के सुखों को भोगता हुआ जीवन व्यतीत करता है। वर-वधू के कुंडली मिलान में भी नवांश महत्वपूर्ण है। यदि लग्न कुंडलियां आपस में न मिलें, लेकिन नवांश मिल जाएं तो भी विवाह उत्तम माना जाता है और गृहस्थ जीवन आनंदमय रहता है। सप्तमेश, सप्तम् के कारक शुक्र (कन्या की कुंडली में गुरु), शुक्र से सप्तम स्थित ग्रह और उनके बलाबल की नवांश कुंडली में शुभ स्थितियां शुभ फलदायी होती हैं। ऐसा देखा गया है कि लग्न कुंडली में जातक को राजयोग होते हुए भी राजयोग का फल प्राप्त नहीं होता यदि नवांश वर्ग में ग्रहों की स्थिति प्रतिकूल होती है। देखने में जातक संपन्न अवश्य नजर आएगा, लेकिन अंदर से खोखला होता है। वह स्त्री से पेरशान होता है और उसका जीवन संघर्षमय रहता है। दशमांश: दशमांश अर्थात् कुंडली के दसवें भाग से जातक के व्यवसाय की जानकारी प्राप्त होती है। वैसे देखा जाए तो जन्मकुंडली में दशम भाव जातक का कर्म क्षेत्र अर्थात् व्यवसाय का है। जातक के व्यवसाय में उतार चढ़ाव, स्थिरता आदि की जानकरी प्राप्त करने में दशमांश वर्ग सहायक होता है। यदि दशमेश, दशम भाव में स्थित ग्रह, दशम भाव का कारक बुध और बुध से दशम स्थित ग्रह दशमांश वर्ग में स्थिर राशि में स्थित हों और शुभ ग्रह से युत हों तो व्यवसाय में जातक को सफलता प्राप्त होती है। दशमांश लग्न का स्वामी और लग्नेश दोनों एक ही तत्व राशि के हों, आपस में नैसर्गिक और तात्कालिक मित्रता रखते हों तो व्यवसाय में स्थिरता देते हैं। इसके विपरीत यदि ग्रह दशमांश में चर राशि स्थित और अशुभ ग्रह से युत हो, लग्नेश और दशमांशेश में आपसी विरोध हो तो जातक का व्यवसाय अस्थिर होता है। दशमांश और लग्न कुंडली दोनों में यदि ग्रह शुभ और उच्च कोटि के हों तो जातक को व्यवसाय में उच्च कोटि की सफलता देते हैं। द्वादशांश: लग्न कुंडली का बारहवां भाग द्वादशांश कहलाता है। द्वादशांश से जातक के माता-पिता के संबंध में जानकारी प्राप्त होती है। लग्नेश और द्वादशांशेश इन दोनों में आपसी मित्रता इस बात का संकेत करती है कि जातक और उसके माता-पिता के आपसी संबंधी अच्छे रहेंगे। इसके विपरीत ग्रह स्थिति से आपसी संबंधों में वैमनस्य बनता है। इसके अतिरिक्त चतुर्थेश और दशमेश यदि द्वादशांश में शुभ स्थित हों तो भी जातक को माता-पिता का पूर्ण सुख प्राप्त होगा, यदि चतुर्थेश और दशमेश दोनों में से एक शुभ और एक अशुभ स्थिति में हो तो जातक के माता-पिता दोनों में से एक का सुख मिलेगा और दूसरे के सुख में अभाव बना रहेगा। इन्हीं भावों के और कारक ग्रहों से चतुर्थ और दशम स्थित ग्रहों और राशियों के स्वामियों की स्थिति भी द्वादशांश में शुभ होनी चाहिए। यदि सभी स्थितियां शुभ हों तो जातक को माता-पिता का पूर्ण सुख और सहयोग प्राप्त होगा अन्यथा नहीं। त्रिंशांश: लग्न कुंडली का तीसवां भाग त्रिंशांश कहलाता है। इससे जातक के जीवन में अनिष्टकारी घटनाओं की जानकारी प्राप्त होती है। दुःख, तकलीफ, दुर्घटना, बीमारी, आॅपरेशन आदि सभी का पता इस त्रिंशांश से किया जाता है। त्रिंशांशेश और लग्नेश की त्रिंशांश में शुभ स्थिति जातक को अनिष्ट से दूर रखती है। जातक की कुंडली में तृतीयेश, षष्ठेश, अष्टमेश और द्वादशेश इन सभी ग्रहों की त्रिंशांश में शुभ स्थिति शुभ जातक को स्वस्थ एवं निरोग रखती है और दुर्घटना से बचाती है। इसके विपरीत अशुभ स्थिति में जातक को जीवन भर किसी न किसी अनिष्टता से जूझना पड़ता है। इन सात वर्गों की तरह ही अन्य षोड्श वर्ग के वर्गों का विश्लेषण किया जाता है। इन वर्गों का सही विश्लेषण तभी हो सकता है यदि जातक का जन्म समय सही हो, अन्यथा वर्ग गलत होने से फलित भी गलत हो जाएगा। जैसे दो जुड़वां बच्चों के जन्म में तीन-चार मिनट के अंतर में ही जमीन आसमान का आ जाता है, इसी तरह जन्म समय सही न होने से जातक के किसी भी पहलू की सही जानकारी प्राप्त नहीं हो सकती। कई जातकों की कुंडलियां एक सी नजर आती हैं, लेकिन सभी में अंतर वर्गों का ही होता है। यदि वर्गों के विश्लेषण पर विशेष ध्यान दिया जाए तो जुड़वां बच्चों के जीवन के अंतर को समझा जा सकता है। यही कारण है कि हमारे विद्वान महर्षियों ने फलित ज्योतिष की सूक्ष्मता तक पहुंचने के लिए इन षोड्श वर्गों की खोज की और इसका ज्ञान हमें दिया।
द्वादशांश से अनिष्ट का सटीक निर्धारण
सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने जब से इस संसार की रचना की है तभी से जीवन में प्रत्येक नश्वर आगमों को चाहे वे सजीव हों अथवा निर्जीव, उन्हें विभिन्न अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है। जीवन की इस यात्रा में सबों को अच्छे एवं बुरे समय का स्वाद चखना पड़ता है तथा दोनों परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ता है। यदि हमारा अध्यात्म एवं पराविद्याओं में विश्वास है तो इनके अनुसार जन्म से मृत्युपर्यन्त मनुष्य के जीवन की हर घटना ग्रहों, नक्षत्रों एवं दशाओं आदि द्वारा पूर्णरूपेण निर्देशित होती है। इनके सम्मिलित प्रभाव जीवन में घटित होने वाली हर घटना को प्रभावित करते हैं। आधुनिक भौतिकवादी विश्व में प्रत्येक मनुष्य धनी, सुखी एवं हर प्रकार से संपन्न जीवन जीने की कल्पना करता है तथा उसकी यह आकांक्षा होती है कि उसे वे सभी विलासितापूर्ण सुख-सुविधाएं प्राप्त हों जिनकी उसे आकांक्षा है। किंतु यह हमारे हाथ में नहीं है। हम सिर्फ कर्म कर सकते हैं, फल का निर्धारण हमारी जन्म कुंडली में स्थित ग्रह करते हैं जो हमारे जन्म लेने के साथ हमारी कुंडली में अवतरित होते हैं। जन्म लेने के उपरांत यह अवश्यंभावी हो जाता है कि हमें निरंतर सुख एवं दुख के चक्र से गुजरना है। अब किसके भाग्य में विधाता ने क्या सुख अथवा दुख लिखे हैं इसका विवेचन ज्योतिषी अपने दैवीय ज्ञान, ज्योतिष के गहन एवं गूढ़ सिद्धांतों के ज्ञान के आधार पर करते हैं तथा लोगों को परामर्श देकर उनका मार्गदर्शन करते हैं कि उसके जीवन का अमुक समय सुख का है अथवा आने वाला समय दुख का होगा, अतः भावी परेशानियों अथवा आसन्न संकट के प्रति सावधान हो जायें। यदि बुरे समय का ज्ञान पूर्व में ही हो जाय तथा समुचित मार्गदर्शन मिल जाय तो व्यक्ति आने वाले बुरे समय के प्रति सचेत हो सकता है, मानसिक रूप से तैयार हो सकता है अथवा दैवीय उपायों द्वारा तथा अपने कृत्यों द्वारा ईश्वर प्रदत्त इस पीड़ा को कमतर करने में, इसकी तीव्रता एवं विभीषिका को न्यून करने में अवश्य सफल हो सकता है। यद्यपि कि ज्योतिष में अनिष्ट के निर्धारण एवं उनकी भविष्यवाणी के अनेक ज्ञात एवं अज्ञात सूत्र मौजूद हैं, किंतु एक अति महत्वपूर्ण, व्यवहृत एवं सिद्ध तकनीक द्वादशांश चक्र के द्वारा अनिष्ट के निर्धारण का है जिसमें राहु का गोचर देखकर काफी सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है। यह तकनीक वर्षों के शोध एवं पर्यवेक्षण के परिणामस्वरूप प्रकाश में आयी है तथा शत-प्रतिशत सही फल देने में सक्षम है। नियम 1: चरण 1: लग्न कुंडली का अष्टमेश देखें। चरण 2: लग्न कुंडली के अष्टमेश की द्वादशांश में स्थिति देखें। चरण 3: राहु का गोचर देखें। जब भी द्वादशांश में लग्न कुंडली के अष्टमेश को राहु गोचर द्वारा प्रभावित करेगा, वह समय काफी घातक अथवा समस्या देने वाला होगा। नियम 2: यदि लग्न कुंडली का अष्टमेश शनि हो तो वैसी स्थिति में नियम में थोड़ा सा परिवर्तन है। ऐसी स्थिति में देखें कि द्वादशांश में शनि कहां अवस्थित है। जब कभी भी राहु की स्थिति गोचर में शनि से तृतीय अथवा दशम भाव में होगी, वह समय जातक के लिए बुरा, कष्टदायक अथवा घातक होगा। निम्नांकित उदाहरण इस सिद्धांत की सत्यता के परिचायक एवं इसकी विश्वसनीयता को सिद्ध करने में सहायक होंगे। लेकिन ज्योतिर्विदों को यह ध्यान रखना अति आवश्यक है कि इस सिद्धांत के अनुसार राहु हर साढ़े सात वर्ष के उपरांत संवेदनशील बिंदु पर गोचर करेगा। अतः फलकथन करते वक्त हमेशा इसे दृष्टिगत रखकर सावधानी बरतनी आवश्यक है। हमेशा ही यह मृत्यु देने वाला तथा अतिघातक नहीं होगा। किंतु इतना तो है कि जातक को बुरी परिस्थितियों का सामना अवश्य करना ही पड़ेगा चाहे इसकी मात्रा कम या अधिक हो
व्यवहारिक उपाय
सभी ग्रह मानव पर अपना प्रभाव डालते हैं। हमारे पूर्व जन्मों के कृत्यों के अनुरूप ग्रह हमारी कुंडली के विभिन्न स्थानों में स्थित होकर अपना अच्छा या बुरा फल देते हैं। प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन को सुचारू रूप से चलाने हेतु इन ग्रहों के बुरे प्रभाव को खत्म कर अच्छे प्रभावों की कामना करता है। इसके लिए विभिन्न यंत्र, मंत्र व तंत्रों का प्रयोग भी करता है। परंतु यदि मनुष्य कुछ साधारण उपाय करे तो नवग्रह शांत हो शुभ फलदायक हो जाते हैं। सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु व केतु ये नौ ग्रह हैं। नवग्रहों के अतिरिक्त ईश्वर को सर्वोपरि माना गया है। ईश्वर के प्रति समर्पण, भक्ति और आराधना की भावना रखने से नवग्रह प्रभावहीन हो जाते हैं। नवग्रहों का मंत्र जप, उपासना और जहां आवश्यक हो वहां महामृत्युंजय मंत्र का जप करने से भी नवग्रह शांति हो जाती है। कुसंगति, कुचिंतन और कुसाहित्य का त्याग करके सात्विक रहन-सहन, सात्विक भोजन एवं सात्विक विचार अपनाने से भी नवग्रहों की शांति होती है। मनुष्य के दुखों का कारण उसकी लालसा है। अपनी अनावश्यक आवश्यकताएं कम कर देने से नवग्रह प्रभावहीन हो जाते हैं। निष्काम कर्म करते हुए, ईश्वर पर अटूट विश्वास रखना उसका स्मरण, ध्यान एवं भजन करने मात्र से भी नवग्रहों का कुप्रभाव खत्म हो जाता है। वासनाओं से अलग रहकर किये गये उचित कर्मों से नवग्रह प्रसन्न होकर सौभाग्य सूचक हो जाया करते हैं। मन, वाणी और क्रिया से किये गये पापों या दुष्कर्मों के लिए ईश्वर से क्षमा याचना करने से भी नवग्रह शांत हो जाते हैं। ईर्ष्या व शत्रुता को त्यागकर व वैराग्य को अपनाते हुए मन, वचन व कर्म से अहिंसा का पालन करने से भी नवग्रहों की शांति संभव है। आध्यात्मिक साहित्य का निरंतर पठन-पाठन भी नवग्रहों की शांति का अचूक उपाय है। इष्टदेव का ध्यान, सत्संग व भक्ति करते हुए पूर्ण शरणागति को अपनाने से भी नवग्रहों का कुप्रभाव समाप्त हो जाता है। मन व इंद्रियों के निग्रह अर्थात उन्हें वश में कर लेने से भी नवग्रह शांत होते हैं। ईश्वर उपासना नवग्रह शान्ति का सर्वोत्तम उपाय है। यदि आप सभी कार्य ईश्वर को अपर्ण करके करें, अपनी सभी गतिविधियां उसकी इच्छा समझकर करें। क्या होगा? ईश्वर जाने, जो होगा वह अच्छा होगा भले के लिए होगा और जैसा भी होगा मुझे स्वीकार होगा ऐसा चिंतन करें। मन में यह धारणा बनाएं कि ईश्वर की कृपा से मैं प्रतिदिन हर प्रकार से अच्छा बनता जा रहा हूं। इससे शक्ति मिलेगी और बहुत से कष्ट स्वतः ही दूर हो जाएंगे। यह भी सोचें और इसका हर समय स्मरण व उच्चारण करते रहें- ''मैं कुछ नहीं हूं, मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैं कुछ भी नहीं कर सकता हूं। तू ही सब कुछ है। तुम बिन कुछ नहीं है जीवन को तेरा ही सहारा है, तू ही पालनहार है।'' यह अहंकार और मोह को दूर करके ईश्वरार्पण, आत्मनिवेदन व शक्ति प्रदान करेगा। ईश्वरार्पण की भावना से अपने कर्तव्य निभाते रहेगें तो सुख पाने का मार्ग स्वतः ही प्रशस्त होगा और नवग्रह भी आप पर कुप्रभाव डालने से कतरायेंगे। आप अपनी क्षमताओं को पहचान कर पाप, खतरनाक भाव, घृणा, बड़ी बाधा, अधिक बोलना और बुरी भावना, ईर्ष्या व असत्य को त्याग करके किसी की आलोचना न करते हुए, समय के अपव्यय में बचते हुए आज और अभी अपने विश्वसनीय मित्र अर्थात् अपने हाथों से उत्साह सहित कार्य में संलग्न हो जायेंगे और सदैव, सच्चाई ईमानदारी व विनम्रता अपनायेंगे तो नवग्रह प्रभावहीन होकर शांत हो जाते हैं। ऐसे में आप आत्मविश्वासी बन जायेंगे, विवेक व धैर्य आपके सहयोगी होंगे और आप सहज ही अपना लक्ष्य पा सकेगें। परोपकार की भावना, सभी को प्रसन्न देखने की इच्छा आपको ईश्वर के करीब ले जाने में सक्षम है। ऐसे व्यक्ति पर नवग्रह हमेशा कृपालु रहते हैं।
कुंडली में ग्रहण योग
सूर्य/चंद्रमा के राहु/ केतु के साथ होने से ग्रहण योग बनता है - इस योग में अगर सूर्य ग्रहण योग हो तो व्यक्ति में आत्म विश्वास की कमी रहती है और वह किसी के सामने आते ही अपनी पूर्ण योग्यता का परिचय नहीं दे पाता है उल्टा उसके प्रभाव में आ जाता है। कहने का मतलब कि सामने वाला व्यक्ति हमेशा ही हावी रहता है। चन्द्र ग्रहण होने से कितना भी घर में सुविधा हो मगर मन में हमेशा अशांति ही बनी रहती है कोई न कोई छोटी-छोटी बातों का डर भी सताता है। कोई अज्ञात भय मन में बना रहता है। संतुष्टि का हमेशा आभव रहता है। मंगल के राहु के साथ होने से अंगारक योग बनता है - इस योग के कारण जिस काम को दूसरा कोई आसानी से कर लेता है उसी काम को करने में अनेक प्रकार की बाधाएं, अड़चन आदि बनी रहती है यानि कोई काम सुख शांति पूर्वक सम्पन्न नहीं होता है। गुरु की राहु/केतु के साथ युति हो तो चांडाल योग बनता है- इस योग के कारण व्यक्ति का धन से संबंधित कोई काम सफल नहीं होता है। कितना भी धन अच्छे समय में कमा ले लेकिन जैसे ही इन ग्रहों की महादशा- अन्तर्दशा- प्रत्यंतर दशा आएगी तो वो सब कमाया हुआ धन एकदम से खत्म हो जाता है और इस योग के कारण व्यक्ति को कर्ज लेने के बाद चुकाने में दिक्कत होती है और एक दिन उसको ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ता है कि कहीं से कुछ रुपये उधार लेकर खाना खाना पड़ता है। शुक्र और राहु की युति से लम्पट योग का निर्माण होता है - इस योग के कारण जातक का ध्यान पराई स्त्रियों में लगा रहता है और कई-कई प्रेम सम्बन्ध बनते हैं लेकिन ज्यादातर का अंत बहुत बुरा, लड़ाई- झगडे़ के साथ और अपमान के साथ होता है। कर्कशा स्त्री जीवन में बनी रहती है। शनि राहु की युति हो तो नंदी योग बनता है- इस योग के कारण व्यक्ति सच्चाई के मार्ग पर चलना चाहते हुए भी हमेशा झूठ और फरेब का शिकार होता है और कई बार जेल जाने तक की नौबत आती है। अपराध की दुनिया से सम्बन्ध बनता है और जीवन अनेक संकटों में फंस जाता है। इसके अलावा भी कुछ और अशुभ स्थितियां अगर आपकी कुंडली में है तो वो आप मिलान करें और देखंे की क्या ऐसा है आपकी कुंडली में। सप्तम, जीवनसाथी के स्थान का स्वामी ग्रह अगर छठे, आठवंे या बारहवें भाव मै बैठा हो या फिर सूर्य के साथ बैठकर अस्त है तो विवाह सुख का नाश करने वाला योग बन जाता है और अगर पुरुष की कुंडली में शुक्र अस्त हो या पापी ग्रह से युक्त हो तो भी ऐसा योग बनता है, अगर महिला की कुंडली में गुरु अस्त हो या गुरु के साथ कोई अशुभ या पापी ग्रह बैठा हो तो महिला का वैवाहिक जीवन अनेक समस्या से भरा या निराश या सपने जो देखे हों पति को लेकर वह सभी टूटे हुए लगते हैं। कुंडली में अगर लग्नेश कमजोर अवस्था का या अशुभ स्थति में है तो आपका स्वास्थ्य कभी भी सम्पूर्ण अच्छा नहीं रहेगा। धनेश और लाभेश अगर अशुभ स्थति में हो तो धन के कारण सम्पूर्ण जीवन संघर्ष करना पड़ता है। कर्मेश यदि छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो या फिर अशुभ युति में हो तो अनेक काम बदलने के बाद भी स्थायित्व नहीं रहता है और धन प्राप्ति में बाधा होती है। सूर्य, मंगल, शनि, राहु और केतु ये पांच पापी ग्रह माने गए हैं और चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र ये चार ग्रह बहुत ही शांत और शुभ माने जाते हैं। अगर इन चार ग्रहों के साथ कोई भी पापी ग्रह बैठा हो या शुभ ग्रहों में से कोई अस्त हो या फिर नीच का हो या फिर कमजोर अवस्था का हो तो जीवन में शुभता की कमी रहती है, योग्यता के अनुसार जीवन यापन नहीं होता है।
राहु-केतु की परम अशुभ फलदाई स्थिति
राहु-केतु कुंडली में एक दूसरे से 1800 की दूरी पर (ठीक विपरीत राशि में) स्थित होते हैं। अन्य पापी ग्रहों की तरह ये 3, 6, 11 भाव में शुभ फल देते हैं, और अन्य भावों में अपनी स्थिति व दृष्टि द्वारा उनके कारकत्व को हानि पहुंचाते हंै। यह सदैव वक्री गति से राशि चक्र में भ्रमण करते हैं। सातवीं दृष्टि के अतिरिक्त (बृहस्पति की तरह) यह अपनी स्थिति से पंचम और नवम् भाव पर पूर्ण दृष्टि डालते हैं। राहु-केतु के शुभाशुभ फल के बारे में ‘लघुपाराशरी’ ग्रंथ में बताया गया है। यद्यद्भावगतौ वापि यद्यद्भावेश संयुतौ। तत्तत्फलानि प्रबलो प्रदिशेतां तमो ग्रहौ।। (संज्ञाध्याय, श्लोक/13) अर्थात् ‘‘राहु और केतु जिस भाव में स्थित हों या जिस भाव के स्वामी के साथ बैठे हों, उन्हीं से संबंधित विशेष फल देते हैं।’ बृहत् पाराशर होरा शास्त्र (अ. 36.17) के अनुसार यदि राहु-केतु केंद्र या त्रिकोण में उस भावेश के साथ हो या उससे दृष्ट हो तो वह राजयोगकारक जैसा फल देते हैं। राहु-केतु की अन्य भावों की अपेक्षा प्रथम (लग्न) और सप्तम भाव में स्थिति परम अशुभ फलदाई होती है। कुछ ज्योतिर्विद राहु की लग्न में और केतु की सातवें भाव में स्थिति को ‘अनन्त’ नामक कालसर्प योग, और राहु की सातवें भाव में व केतु की लग्न में स्थिति को ‘तक्षक’ नामक ‘कालसर्प योग’ की संज्ञा देते हैं। वास्तव में विभिन्न भयानक सर्पों के नाम के कालसर्प योग राहु-केतु की अपनी भाव-स्थिति का ही फल देते हैं।लग्न का राहु जातक को रोगी, अल्पायु, धनी, क्रोधी, कुकर्मी और व्यर्थ बोलने वाला बनाता है। सप्तम का राहु जातक को अल्पबुद्धि, वीर्य-दोष से पीड़ित और सहयोगियों से अलगाव देता है। पत्नी धन का नाश करती है। अन्य पापी ग्रहों से युक्त होने पर पत्नी दुष्ट स्वभाव और कुटिल होती है। लग्न का केतु वात रोग से पीड़ा, दुर्जनों की संगति, धन की कमी, स्त्री व पुत्र की चिंता और व्याकुलता देता है। सप्तम का केतु धन का नाश, अपमान, आंतांे और मूत्र की बीमारी, स्त्री से वियोग तथा व्यग्रता देता है। लग्न पीड़ित होने पर व्यक्ति का सारा जीवन कष्टमय रहता है। राहु-केतु के लग्न व सप्तम तथा विपरीत स्थिति का दुष्प्रभाव निम्न कुंडलियों द्वारा भली प्रकार समझा जा सकता है। दोनों ही स्थिति में राहु व केतु अपने दुष्प्रभाव से लग्न, पंचम, सप्तम, नवम, तृतीय व एकादश भाव के फल की हानि करते हैं जिससे स्वास्थ्य, विद्या, बुद्धि, संतान, दांपत्य सुख, पिता, धर्म; पुरूषार्थ और लाभ की हानि होती है। इन भावों के पीड़ित होने पर व्यक्ति का जीवन निराशापूर्ण व दुखी रहता है। राहु व केतु पापदृष्ट अथवा नीच राशि में स्थित होने पर अधिक और उच्चस्थ अथवा शुभ दृष्ट होने पर कम दुष्प्रभावी होते हैं। इस बहुमुखी हानिकारक प्रभाव के कारण कुछ ज्योतिषियों ने इसे ‘लज्जित दोष’ कहना आरंभ कर दिया है, जो भविष्य में ‘कालसर्प योग’ और ‘पितृदोष’ की तरह प्रसिद्धि पा सकता है। अपना प्रारब्ध भोगता व्यक्ति ज्योतिषियों के मार्गदर्शन में अपनी मेहनत की कमाई विभिन्न उपायों पर खर्च करता है। परंतु ज्योतिष (ईश्वरीय ज्योति) केवल मनुष्य के प्रारब्ध (भाग्य) को दर्शाती है, भाग्य नहीं बदलती। प्रारब्ध तो भोगकर ही कटता है। शास्त्रोक्त मंत्रजप, हवन, व दान द्वारा कष्टों को सहनशील ही बनाया जा सकता है। बृहत् पाराशर होरा शास्त्र (अध्याय 2) के अनुसार जीव के प्रारब्ध (शुभ/अशुभ कर्मफल) को फलीभूत करने के लिए जनार्दन (ईश्वर) ग्रह रूप में कुंडली के शुभ/अशुभ भावों में स्थित होकर उनकी दशा-भुक्ति में अच्छा या बुरा फल देते हैं। ‘जब कोई ग्रह (दशा, भुक्ति या गोचर में) कष्टकारी हो तो उसकी यथाशक्ति पूजा (मंत्र जप व हवन, तथा ग्रह की वस्तु का दान) करना चाहिए, क्योंकि ब्रह्माजी ने ग्रहों को वरदान दिया है कि जो तुम्हारी पूजा करे उसका भला करो।’’ पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से विधिपूर्वक स्वयं किया उपाय कष्टों को आसान बनाता है, जैसे स्वयं भोजन करने पर ही भूख शांत होती है। ग्रह के मंत्रजप, हवन और दान को प्रायश्चित स्वरूप मानकर व्यक्ति के संकल्प और प्रयास में दृढ़ता आती है। राहु-केतु की पूजा का विधान इस प्रकार है। चैत्र, पौष और अधिकमास को छोड़कर किसी अन्य माह के शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से आरंभ कर 18 शनिवार को करना चाहिए। व्रत के दिन प्रातः स्नान करके सूर्य को अघ्र्य देना चाहिए। उसके बाद काले रंग के वस्त्र धारण कर कंबल के आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला से राहु के लिए ‘‘ऊँ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः’’ की और केतु के लिए ‘‘ऊँ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः’’ की 11 या 5 माला एक दिन में जप करें। राहु मंत्र के जप के समय एक पात्र में जल और दूर्वा तथा केतु मंत्र जप के समय जल मंे कुश डालकर अपने पास रखना चाहिए। उस दिन का जप पूरा होने पर उसे पीपल की जड़ में चढ़ा दें। दिन मंे एक समय मीठी रोटी या चूरमा अथवा काले तिल से बना बिना नमक का भोजन करना चाहिए। सूर्यास्त के बाद एक सरसों के तेल का दीपक पीपल के वृक्ष की जड़ के समीप जलाना चाहिए। जप-अनुष्ठान की समाप्ति पर जप-संख्या के ‘दशांश’ का हवन करना चाहिए। ‘मत्स्य पुराण’ के अनुसार हवन में ग्रह संबंधी समिधा का अवश्य प्रयोग करना चाहिये। राहु के लिए ‘दूर्वा’ और केतु के लिए ‘कुशा’ को आम की समिधा के साथ मिलाकर हवन में प्रयोग करें। अनुष्ठान के समय सुबह-शाम लोबान की धूनी घर में घुमाना चाहिए। हवन के बाद यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन कराकर उन्हें ग्रह संबंधी वस्तुओं का दान देना चाहिए। दान की वस्तुएं इस प्रकार हैं:- राहु की वस्तुएं: सतनाजा, कंबल, तिल से भरा लौह पात्र, उड़द, सरसों, नारियल, तेल, नीला वस्त्र व सीसा। केतु की वस्तुएं: कंबल, ऊनी वस्त्र, बकरा, सतनाजा व उड़द। अंत में दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त कर विदा करना चाहिए। इस प्रकार राहु-केतु की पूजा अनुष्ठान से कष्टों का शमन होकर सम्मान प्राप्त होता है। अनुष्ठान के उपरांत राहु के लिए कोढ़ियों को सरसों के तेल से बनी सूखी सब्जी और रोटी (विशेषकर अमावस्या व शनिवार को) खिलाना चाहिए। केतु के लिए गली के कुत्ते को (विशेषकर बुधवार को) दूध रोटी खिलाना चाहिए। इससे जीवन की कठिनाइयां सरल होती जाती हैं।
Saturday, 16 January 2016
Friday, 15 January 2016
शनि को कल्याणकारी बनाने के उपाय
शनि शुभ होने पर निम्न उपाय करें: - नीलम रत्न, चांदी की अंगूठी में बनवा कर, मध्यमा अंगुली में, शनिवार के दिन प्रातः पहनें। - नीले रंग की वस्तुओं का उपयोग करें जैसे नीले वस्त्र, चादर, पर्दे आदि। - शनि से संबंधित वस्तुओं (जैसे लोहा, तेल, चमड़ा आदि) का व्यापार करें और शनि के दिन एवं नक्षत्रों का विशेष तौर पर उपयोग करें। - लोहे के बरतन में 7 काली मिर्च, 7 काले चने के दाने, पत्थर का कोयला, 7 दाने उड़द की साबुत दाल, एक चमड़े का टुकड़ा एवं नीले रंग का वस्त्र/ कपड़ा डाल कर घर के आंगन में दबा दें। - इष्ट देव या शनि देव की लोहे की मूर्ति बनाएं, बनवाएं और शनि को शुभ मुहूर्त में घर/ कार्यस्थान में रखें। - शनिवार के दिन सरसों के तेल का तिलक करें और खाने में इसका उपयोग करें। - 5 शनिवार शनि देव/भैरों के मंदिर में सरसों के तेल का दीपक जलाएं। - शनिवार को घर में भैंस रखें या भैंस को हरा चारा खिलाएं। - शनिवार को उड़द की दाल का उपयोग खाने में करें। - नीले रंग की बोतल में सूर्यतप्त जल का उपयोग 27 दिन करें। - शनिवार को काला-भूरा कुत्ता पालें। - स्टील के बरतनों का उपयोग करें। - शनिवार को सिर और बदन पर सरसों के तेल की मालिश करें। - काले घोड़े के नाल का छल्ला/शनि यंत्र का उपयोग करें (मध्यमा अंगुली में धारण करें)। - शनिवार के दिन लोहे का कड़ा हाथ में पहनें। शनि अशुभ होने पर निम्न उपाय करें: - शनि यंत्र, 23000 मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित कर के धारण करें। - नीले रंग की वस्तुओं का उपयोग पूर्णतया वर्जित है। - भैंस या कुत्ता न पालें। - 5 शनिवार को आक के पौधे पर लोहे का टुकड़ा चढ़ाएं। - 5 शनिवार लोहे की कटोरी में तेल का दान करें। - 5 शनिवार कौआंे को दही-रोटी डालें। - 7 शनिवार सवा किलो उड़द की साबुत दाल दान करें। - उड़द की साबुत दाल के 7 दाने, 7 चने के दाने, 7 काली मिर्च, 7 कीलें, 1 पत्थर के कोयले का टुकड़ा, 1 चमड़े का टुकड़ा बहते पानी में बहाएं। - उपर्युक्त चीज़ों को नीले कपड़े में बांध कर निर्जन जगह दबाएं। - नशे की चीजों का उपयोग न करें। - भैंस को 7 शनिवार सतनाजा चराएं। - चींटियों को 7 शनिवार काले तिल, आटा और शक्कर डालें। - शनिवार को नया कार्य या यात्रा आरंभ न करें। - 5 शनिवार श्मशान घाट में लकड़ी का दान करें। - मंदिर में शनि की वस्तुओं का 5 शनिवार दान करें। - निर्धन को 7 शनिवार भोजन कराएं। - 7 शनिवार मछलियों को आटे की गोलियां डालें। - शनिवार को दान न लें। - पत्थर का कोयला मंदिर/भंडारे के लिए दान करें। - काले कुत्ते को दूध पिलाएं।
कुंडली में अष्टम चन्द्र
अष्टम चंद्र यानि जन्म कुंडली में आठवें भाव में स्थित चंद्र। आठवां भाव यानि छिद्र भाव, मृत्यु स्थान, क्लेश‘विघ्नादि का भाव। अतः आठवें भाव में स्थित चंद्र को लगभग सभी ज्योतिष ग्रंथों में अशुभ माना गया है और वह भी जीवन के लिए अशुभ। जैसे कि फलदीपिका के अध्याय आठ के श्लोक पांच में लिखा है कि अष्टम भाव में चंद्र हो तो बालक अल्पायु व रोगी होता है। एक अन्य ग्रंथ बृहदजातक में भी वर्णित है कि चंद्र छठा या आठवां हो व पापग्रह उसे देखें तो शीघ्र मृत्यु होगी। जातक तत्वम के अध्याय आठ के श्लोक 97 में भी आठवें चंद्र को मृत्यु से जोड़ा गया है। ज्योतिष के ग्रंथ मानसागरी के द्वितीय अध्याय के श्लोक आठ में वर्णित है कि यदि चंद्र अष्टम भाव में पाप ग्रह के साथ हो तो शीघ्र मरण कारक है। इसी कारण से अधिकतर ज्योतिषी अष्टम चंद्र को अशुभ कहते हैं और जातक को उसकी आयु के बारे में भयभीत कर पूजादि करवा कर धन लाभ भी लेते हैं, ज्योतिष के प्रकांड ज्ञानी भी जन्मपत्री में अष्टम चंद्र को देखते ही जन्मपत्री को लपेटना शुरू कर देते हैं, वे अष्टम चंद्र को ऐसा सर्प मानते हैं जिसके विष को जन्म कुंडली में स्थित शुभ ग्रह गुरु, शुक्र या बुध रूपी अमृत भी निष्प्रभावी नहीं कर सकते। वे अष्टम चंद्र को भय का प्रयाय व साक्षात मृत्यु का देवता मानते हैं, मैंने स्वयं अनेक पंडितों को अष्टम चंद्र की भयानकता बताते देखा है। परंतु यह सर्वथा गलत है कि अष्टम चंद्र को देखते ही जन्मपत्री के अन्य शुभ योगों, लग्न व लग्नेश की स्थिति, अष्टम व अष्टमेश की स्थिति आदि को भूल जाएं और अष्टम चंद्र को देखते ही अशुभ बताना शुरू कर दें, क्या इस अष्टम चंद्र की भयानकता हमें इतना सम्मोहित कर देती है कि इसे देखते ही मृत्यु या प्रबल अरिष्ट के रूप में अपना निर्णय सुनाने लगते हैं, बिना यह विचार किए कि सुनने वाले जातक को ऐसे मुर्खतापूर्ण निर्णय से कितना आघात पहुंचता है। यह अपने आप में नकारात्मक ज्योतिष है और हमें इससे बचना चाहिए। केवल मृत्यु या भयानकता ही अष्टम चंद्र का प्रतीक नहीं है वरन् आशा व जीवन का प्रतीक भी अष्टम चंद्र ही है। अतः अष्टम चंद्र का केवल नकारात्मक पक्ष ही नहीं, बल्कि इसके सकारात्मक पक्ष पर भी गहन विचार करने के बाद ही ज्योतिषी को अपना निर्णय सुनाना चाहिए। आइए अष्टम चंद्र के बारे में ज्योतिष के विभिन्न ग्रंथों में लिखित निम्न श्लोकों पर एक नजर डालें जो अष्टम चंद्र के सकारात्मक पक्ष को उजागर करते हैं अर्थात भयभीत करने से बचाते हैं: 1. जातक परिजात में लिखा है कि जिस जातक का कृष्ण पक्ष में दिन का जन्म हो या शुक्ल पक्ष में रात्रि का जन्म हो और उसकी जन्म कुंडली में छठा या आठवां चंद्र हो, शुभ व पाप दोनों प्रकार के ग्रहों से दृष्ट हो तो भी मरण नहीं होता। ऐसा चंद्र बालक की पिता की तरह रक्षा करता है। 2. मानसागरी में कहा गया है कि लग्न से अष्टम भावगत चंद्र यदि गुरु, बुध या शुक्र के द्रेष्काण में हे तो वही चंद्र मृत्यु पाते हुए की भी निष्कपट रक्षा करता है। अब इन श्लोकों पर तो ज्योतिषीगण ध्यान देने की आवश्यकता समझते नहीं या ध्यान देना ही नहीं चाहते जो अष्टम चंद्र का सकारात्मक पक्ष उजागर करते हैं बल्कि नकारात्मक पक्ष को उजागर कर स्वार्थ सिद्ध करते हैं। अतः हमें अष्टम चंद्र से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह जीवन का प्रयाय भी बन जाता है यदि निम्न सिद्धांत इस पर लागू हों तो: 1.जातक का जन्म कृष्ण पक्ष में दिन का हो या शुक्ल पक्ष में रात्रि का हो। 2.जन्म कुंडली में चंद्र शुभ ग्रह गुरु, शुक्र या बुध की राशि में हो या इन्हीं ग्रहों से दृष्ट हो। 3.द्रेष्काण कुंडली में चंद्र पर गुरु, शुक्र या बुध की दृष्टि हो या चंद्र इन्हीं तीन ग्रहों की राशियों में स्थित हो। 4.नवांश कुंडली में चंद्र पर गुरु, शुक्र या बुध की दृष्टि हो या चंद्र इन्हीं तीन ग्रहों की राशियों में स्थित हो।
मकर संक्रांति महत्व
सूर्य के राशि परिवर्तन का समय संक्रांति कहलाता है। सूर्य लगभग एक माह में राशि परिवर्तन कर लेते है। इस प्रकार एक वर्ष में मेष-वृषादि 12 संक्रांति होती है। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना मकर संक्रांति कहलाता है।मकर संक्रांति को सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण हो जाते है। इसी कारण इस संक्रांति का पुराणों एंव शास्त्रों में बहुत महत्व प्रतिपादित किया है। अयन का अर्थ होता है चलना। सूर्य के उत्तर गमन को उत्तरायण कहते है। उत्तरायण के छह महीनों मे सूर्य मकर से मिथुन तथा दक्षिणायन में सूर्य कर्क से धनु राषि में भ्रमण करते है। ‘‘महाभारत’’ एंव ‘‘ भागवत् पुराण’’ के अनुसार सूर्य के उत्तरायण आने पर ही ‘‘भीष्म पितामह’’ ने देह त्याग किया था। भगवान कृष्ण ने भी गीता में कहा है कि जो प्राणी सूर्य के उत्तरायण होने पर शरीर त्याग करता है, वह जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है।शास्त्रो में उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा गया है। इस प्रकार मकर संका्रन्ति एक प्रकार से देवताओं का प्रातःकाल है।‘‘हेमाद्रि’’/‘‘भविष्य पुराण’’ में घोषणा की गई है कि उत्तरायण के आ जाने पर यानी मकर संक्रांति में एक प्रस्थ घी से सूर्य को स्नान करावे। पीछे उसे ब्राह्मण को दे दे, कुटुम्बी ब्राह्मण के लिये घृतधेनुक दान करे, वह सब पापो से छुटकर सूर्यलोक को जाकर बहुत समय तक रहता है वहाँ से आकर प्रजा को आनंद देने वाला राजा होता है। मकर संक्रांति के दिन स्नान, दान, जप, तप, श्राद्ध तथा अनुष्ठान आदि का सौ गुना फल प्राप्त होता है। उत्तर प्रदेश में इस पर्व को ‘‘खिचडी’’ कहते है। इसका वैज्ञानिक महत्व यह है कि बाजरे आदि की खिचडी से कड़ाके की सर्दी भी बेअसर हो जाती है। महाराष्ट्र में विवाहित स्त्रियाँ पहली संक्रांति पर तेल, कपास, नमक, आदि वस्तुएं सौभाग्यवती स्त्रियों को दान करती है। बंगाल में इस दिन स्नान कर तिल का दान करने का प्रचलन है। दक्षिण भारत में इसे ‘‘पोंगल’’ कहते है। असम में मकर संक्रांति को बिहू का त्योहार मनाया जाता है। राजस्थान में इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियाॅ सुहाग की वस्तुए , गजक ,तिल के लड्डू, घेवर, या मोतीचूर के लड्डू आदि पर रूपया रखकर बायना के रूप में अपनी सास के चरण स्पर्श करके देती है। किसी भी वस्तु का चैदह की सख्ंया में संकल्प कर ब्राह्मणों या अन्य परिचितो को दान करती है। इस दिन नव वर्ष का पंचांग ब्राह्मणों को दान करने की भी परम्परा है। इस दिन तिल ही से स्नान करे, तिल ही का उबटन लगावे, तिल ही का हवन, तिल का जल, तिल का ही भोजन तथा दान ये छः कर्म तिल ही से करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। ‘‘विष्णु धर्म’’ के अनुसार संक्रांति के दिन तिल, श्वेत वस्त्र, स्वर्ण, चाँदी, अन्न, गाय बछडे, पशु, आहार आदि दान करने से एक हजार गुना फल प्राप्त होता है। इस दिन बेटी-जवाँई को घर बुलाकर उनका आदर सत्कार करने से भी विशेष फल प्राप्त होता है।मकर संक्रांति के दिन यदि गंगासागर अथवा पवित्र सरोवर में स्नान किया जाये तो वर्ष भर में किये गये जाने-अनजाने सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। वहां के लोग यह मानते हैं कि जब सूर्य मकर राशि मे प्रवेश करते हैं, उस समय वहाॅ के मन्दिर के आस-पास जो पर्वत हैं उन पर आग की लपटे द्रष्टिगोचर होती है जो अग्नि स्वरूप भगवान सूर्य एवं ईश्वर का साक्षात दर्शन है। केरल में इस दिन अयप्पा भगवान की पूजा-अर्चना की जाती है।शास्त्रों में गऊधाट पर इस दिन स्नान करने से गोदान के बराबर फल बताया गया है। ‘‘बृह्माण्ड पुराण’’ में इस दिन दधि-मंथन का दान करने से पुत्र प्राप्ति होने तथा जन्म-जन्मान्तर के दारिद्रय नष्ट हो जाने की बात लिखी है। तमिलनाडु में मकर सक्रान्ति दीपावली की तरह उंमग व उल्लास से मनाई जाती है। पंजाब व जम्मू-कश्मीर, जो सिख बहुल क्षेत्र है वहाँ मकर संक्रान्ति की पूर्व संघ्या को लोहडी के रूप में गाजे-बाजे उमंग व रास-रंग के साथ मनाया जाता है। नव विवाहित एवं षिषुओ के उपलक्ष्य मे इस त्यौहार को धूम धाम से मनाते हैं, प्रार्थना करते हैं -.. दे मा लोहड़ी - तेरी जीवे जोड़ी दक्षिण बिहार में मकर संक्रांति पर विशाल मेला भी लगता है जो एक पक्ष तक चलता है। यहाँ मंदार पर्वत के नीचे सरोवर में स्नान किया जाता है। मान्यता है कि मधु कैरभ नामक असुरों का भगवान विष्णु ने यहीं पर वघ कर इसी सरोवर में स्नान किया था। यह जल पापनाशक कहलाता है। इस दिन कुरूक्षेत्र के पवित्र सरोवर में भी लाखों व्यक्ति स्नान कर पुण्य कमाते हैं। ‘धर्म सिन्घु’ ग्रन्थ के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सफेद तिल से देवताआंे का तथा काले तिल से पित्तरों का तर्पण करना चाहिये। षिवलिंग पर षुद्ध जल का अभिषेक करने से महाफल की कृपा प्राप्ति होती है। ‘‘शिव रहस्य’’ घोषणा करता है कि ’’मकर सक्रांति एंव माघ मास में जो घृत एंव कम्बल का दान करता है वह अनेक भोगांे को भोगकर अन्त में मोक्ष पाता है। घृत व कंबल देने से कई मनुष्य राजा हो गये। ’ वायु पुराण के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त मे स्नान कर दूर्वा, दघि, मक्खन, गोबर, चंदन, लाल फूल जल सहित, गौ, मृतिका, धान्या को पीपल को स्पर्ष कराकर दोनो हाथों से सूर्य को प्रणाम करना चाहिये।इससे सूर्य देव अति प्रसन्न रहते हैं।‘विष्णु घर्म सूत्र’ के अनुसार पितरो की शान्ति के लिये एवं स्वास्थ्यवर्द्धन एवं कल्याण के लिये तिल के यह प्रयोग स्नान, दान, भोजन, जल,अर्पण, तिल ,आहुति तथा उबटन मर्दन करने से पाप नष्ट होकर पुण्य की प्राप्ति होती है । हरियाणा एवं पंजाब मे इस दिन संघ्या होते ही आग जलाकर अग्नि पूजा करते हैं तथा तिल, गुड़, चावल, भुने हुए मक्के की आहुति दी जाती है । इस सामग्री को तिलचैली कहा जाता है । सभी लोग इन वस्तुओं को आपस मे बांटकर खुषियां मनाते हैं । उत्तर प्रदेष मे यह पर्व बहुत पवित्र माना जाता है। इलाहाबाद मे हर वर्ष विशाल माघ मेले की शुरूआत होती है। बंगाल मे प्रतिवर्ष गंगा सागर का विषाल मेला लगता है। षास्त्रो में इसका बडा महत्व है। कहते भी है कि सारे तीर्थ बार बार गंगा सागर एक बार ।
स्वतंत्र व्यवसाय के ग्रह योगों की विवेचना
स्वतंत्र व्यवसाय के ग्रह योगों की विवेचना सप्तम भाव, दशम भाव व्यवसाय से संबंधित होते हैं। भाव 10-11 धन से संबंधित होते हैं और व्यवसाय से संबंधित मुखय ग्रह बुध को माना गया है। लग्न, चंद्र लग्न, सूर्य लग्न में से जो बली हो उसके 10वें भाव से व्यवसाय से विचार किया जाता है। दशमेश जिस नवांश में हो उसके नवांशेद्गा को व्यवसाय चयन में प्रमुखता दी जाती है। व्यवसाय में सफलता के कुुछ ग्र्रह योग लग्न, चंद्र लग्न, सूर्य लग्न से जो भी अत्यधिक बलशाली हो, उस लग्न के दशम भाव में यदि बुध हो तो जातक सफल व्यापारी होता है। यदि 10 वें भाव में किसी शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो भी जातक व्यापारी होगा। यदि कुंडली में लग्नेश एवं दशमेश एक साथ हों तो व्यापार का योग बनता है। यदि भाव 10 का स्वामी भाव 1, 4, 7, 10 केंद्रों या भाव 5, 9 या भाव 11 में शुभ ग्रहों से दृष्ट होकर बैठा हो, तो सफल व्यापारी बनाता है। यदि दशम में बैठा ग्रह उच्च का है तो जातक को अधिक प्रगति कराता है। यदि नीच का होकर बैठा है तो कम उन्नति और व्यापार में उतार-चढ़ाव का द्योतक है। चंद्रमा से बुध, शुक्र, गुरु तीनों या कोई एक भी ग्रह यदि भाव 1, 4, 7, 10 में से किसी में हो तो व्यापारी बनने का योग बनता है। बुध, शुक्र, चंद्र यदि एक दूसरे से द्वितीयस्थ या द्वादशस्थ हो तो भी व्यापारी बनने का योग होता है। चंद्रमा से यदि गुरु, शुक्र तीसरे या ग्यारहवें बैठे हो तो भी व्यापारी बनने का योग बनता है। यदि भाव 02 का स्वामी भाव 11 में एवं 11 भाव का स्वामी भाव 02 में हो तो भी जातक सफल व्यापारी होता है। यदि केंद्र में पाप ग्रह हों और उन पर शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो तो जातक मांस, मछली से संबंधित व्यवसाय करता है। यदि भाव 09 में शनि बुध, शुक्र हो तो जातक कृषि द्वारा धनवान होता है। यदि मंगल और चतुर्थ भाव का स्वामी किसी एक केंद्र में हो या किसी एक त्रिकोण में हो या फिर भाव 11 में हो तथा भाव 10 का स्वामी चंद्र, शुक्र से युति करे या दृष्ट हो तो जातक कृषि एवं पशु पालन का व्यवसाय करता है। भाव 10 का स्वामी यदि सूर्य के नवांश में हो तो जातक दवा, ऊन, अन्न, सोना, मोती आदि का व्यापार कर लाभ उठाता है। यदि भाव 10 का स्वामी चंद्र के नवांश में हो तो जातक मोती, कृषि, बच्चों के खिलौने, रेडीमेट वस्त्र, फैन्सी स्टोर आदि का व्ववसाय करता है। यदि भाव 10 का स्वामी मंगल के नवांश में हो, तो तांबा व पीतल के बर्तन की दुकान व कोयला आदि का व्यपार करता है। यदि दशम भाव का स्वामी बुध के नवांश में हो तो जातक लकड़ी का कारखाना, फर्नीचर, ज्योतिष शास्त्र या वैद्य का काम करता है। यदि दशम भाव का स्वामी गुरु के नवांश में हो तो जातक, अध्यापक वृत्ति तथा स्टेशनरी, धार्मिक पुस्तकों आदि का व्यापार करता है। यदि दशम भाव का स्वामी शुक्र के नवांश में हो तो जातक जानवरों का क्रय, विक्रय, चावल, किराना अथवा फेन्सी स्टोर, सौन्दर्य प्रसाधन स्टोर का व्यापार करता है। यदि दशम भाव का स्वामी शनि के नवांश में हो तो जातक लोहे, तिल, तेल, ऊन, चमड़ा आदि का व्यापार करता है। यदि व्यापार कारक ग्रह बुध भाव2, 3, 7 या 11 वें में उच्च या स्वग्रही हों और क्रूर ग्रहों से न देखा जाता हो, तो जातक एक सफल व्यापारी होता है। बुध ग्रह की राशि मिथुन या कन्या उक्त भावों में पड़ी हो, और किसी शुभ ग्रह के साथ हो या शुभ योग बना रहा हो तो भी कुशल व्यापारी होता है। यदि भाव 10 में वायु तत्व राशि मिथुन, तुला, कुंभ में से एक हो तो इलेक्ट्रानिक्स के कार्य/ वैज्ञानिक का कार्य करने की संभावना होती है। यदि 10वें भाव में अग्नि तत्व राशि मेष, सिंह, धनु हो तो जातक इंजीनियर या लोह या धातु से संबंधित कार्य करता है। यदि पृथ्वी तत्व राशि वृष, कन्या, मकर दशम भाव में हो तो जातक प्रशासनिक कार्य, आर्थिक कार्य, सिविल कार्य, धातु से संबंधित कार्य या खेती बाड़ी या एजेंसी का कार्य करता है। यदि भाव 10 में जल तत्व राशि कर्क, वृश्चिक, मीन में से कोई हो तो तरल पदार्थ, रसायन, डेयरी व्यापार, सामुद्रिक जहाज रानी या ठंडे पेय पदार्थों से संबंधित कार्य करने की संभावना रहती है। यदि दशमेश चंद्र पराक्रम भाव में धनु राशि में हो और इस पर धनेश मंगल व लग्नेश शुक्र की नवम भाव से दृष्टि हो, लाभेश सूर्य भाग्येश बुध के साथ लाभ भाव में होकर पंचमेश शनि से दृष्ट हो तो ऐसा जातक अपना स्वतंत्र व्यवसाय/सौंदर्य प्रसाधन से संबंधित कार्य करता है। यदि कर्मेश शुक्र पर शनि की दृष्टि हो, भाग्येश मंगल लग्नेश सूर्य, पंचमेश गुरु-राहु के साथ युति कर केंद्र में हो और लाभेश बुध की स्वग्रही चंद्रमा पर दृष्टि हो तो ऐसा जातक विल्डिंग डिजाइन का स्वतंत्र व्यवसाय करता है। यदि दशमेश मंगल स्वग्रही होकर धनेश सूर्य के साथ दशम में हो, भाग्येश गुरु चंद्र के साथ गज-केसरी योग बनता हो, लाभ भाव में राहु वृषभ राशि का हो, शुक्र कुंडली में उच्चाभिलाषी हो साथ ही पराक्रम भाव का स्वामी, बुध दशम भाव से दशम अर्थात सप्तम भाव के स्वामी शनि के साथ भाग्य भाव में युति करता हो, तो ऐसा जातक कपड़े के व्यापार के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त अन्य कई प्रकार के ग्रहयोग भी स्वतंत्र व्यवसाय या व्यापार के होते हैं।
ज्योतिष अनुसार केसर का प्रयोग
हमारी प्रकृति ने हमें कई ऐसे मसाले और जड़ी-बूटियां दी हैं जो हमारे लिए कम फायदेमंद नहीं है। केसर का मसालों में विशिष्ट स्थान है। केसर सबसे कीमती मसाला है जिसे अंग्रेजी में सैफ्रोन कहते हैं। साधारणतः इसे उर्दू और अरबी में जाफरान कहते हैं। केसर भारतीय रसोई घर का प्रमुख मसाला है। इसे मसालों का राजा कहें तो ज्यादा बेहतर होगा। इसमें करिश्माई गुण समाए हैं। इसका वैज्ञानिक नाम क्रोकस सैटिबस है। केसर के फूल में चमकता हुआ स्टिग्मा पाया जाता है। स्टिग्मा को जब अच्छी तरह सुखाया जाता है तब जाकर केसर प्राप्त होता है। ये फूल जाड़े में हाथ से तोड़े जाते हैं। स्टिग्मा एक केप्सूल की तरह होता है। जैसा कि केसर के बारे में कहा जाता है कि यह सातवीं सदी में चीन पहुंचा और मध्यकाल में यूरोप में इसका प्रचार हुआ। यह मोरक्को और तुर्की में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। ज्योतिष के अनुसार केसर का उपयोग करने से सात्विक गुणों और सदाचार की भावना बढ़ती है। केसर पाउडर और थ्रेड के रूपों में उपयोग में लाया जाता है। केसर का सुगंध पाने के लिए इसे पानी में भिगोना पड़ता है। केसर का सबसे ज्यादा आयात ईरान और स्पेन से होता है क्योंकि यहां के केसर की क्वालिटी काफी अच्छी होती है। भारत में कश्मीर में इसकी खेती होती है। जिस प्रकार बृहस्पति ग्रह का रत्न पुखराज है उसी प्रकार केसर का प्रतिनिधि ग्रह बृहस्पति है। बृहस्पति जो ग्रहों में सबसे महान् हैं अपनी स्थिति से आकाश में उच्च स्तर पर है। बृहस्पति का मार्गी होना, वक्री होना, उच्च राशि अथवा नीच राशिगत होना यह सब जीवन पर प्रभाव डालते हैं। अगर बृहस्पति मार्गी हो तो बुद्धि सुचारू रूप से सही दिशा मिलती है। किंतु वक्री होने पर मन-मस्तिष्क में भ्रम और विवाद पैदा करते हैं। बृहस्पति ग्रह ज्ञान, विद्या का ग्रह है। अध्ययन में रुचि बढ़ाने के लिए बृहस्पति का बलवान होना जरूरी है। बृहस्पति या गुरु शरीर में चर्बी, लीवर, दिमाग से संबंधित रोगों का कारक होता है। धर्म के अधिष्ठाता बृहस्पति को मांगलिक कार्यों का कारक ग्रह माना गया है। घर से किसी मांगलिक कार्य के लिए निकलें तो इसका तिलक कर सकते हैं। विवाह में रुकावट के लिए बृहस्पति का कमजोर होना माना गया है। केसर का इस्तेमाल हम किसी और तरह से कर सकते हैं। केसर का इस्तेमाल, केसर दूध, केसर वाले चावल, ठंडई से लेकर मसाले तक में केसर का विभिन्न रूपों में प्रयोग किया जाता है। केसर वाली खिरनी, गुरुवार को खुद खायें और किसी गुरु को खिलाएं तो बृहस्पति सकारात्मक फल देता है। इसकी थोड़ी सी मात्रा किसी भी दिश को खुशबूदार बना देती है। ध्यान रहे ज्यादा मात्रा में लेने पर दिमाग, भारी हो जाता है और नींद आने लगती है। केसर का उपयोग धार्मिक कार्यों में भी किया जाता है। बृहस्पतिवार के दिन केसर का तिलक करें। केसर दूध या केसर वाली खिरनी, छोटे चावल वाली खीर, दान करें। यदि किसी गुरु को सेवन करने को दें तो इससे बृहस्पति सकारात्मक फल देता है। वैवाहिक जीवन में संतुलन बनाए रखने के लिए बृहस्पति का अच्छा होना बहुत जरूरी है। ज्योतिष विद्या विश्वास नहीं विज्ञान है। सत्य को परखने के लिए हम प्रयोग करके देख सकते हैं।
भोग कारक शुक्र और बारहवां भाव
द्वादश भाव को प्रान्त्य, अन्त्य और निपु ये तीन संज्ञायें दी जाती हैं और द्वादश स्थान (बारहवां) को त्रिक भावों में से एक माना जाता है, अक्सर यह माना जाता है कि जो भी ग्रह बारहवें भाव में स्थित होता है वह ग्रह इस भाव की हानि करता है और स्थित ग्रह अपना फल कम देता है। बलाबल में भी वह ग्रह कमजोर माना जाता है, लेकिन शुक्र ग्रह बारहवें भाव में धनदायक योग बनाता है और यदि मीन राशि में बारहवें भाव में शुक्र हो तो फिर कहना ही क्या? कारण यह है कि शुक्र बारहवें भाव में काफी प्रसन्न रहता है क्योंकि बारहवां भाव भोग स्थान है और शुक्र भोगकारक ग्रह, इसी कारण इस भाव में शुक्र होने से भोग योग का निर्माण करता है, चंद्र कला नाड़ी की मानें तो- व्यये स्थान गते कात्ये नीचांशक वर्जिते। भाग्याधिपेन सदृष्टे निधि प्राप्तिने संशयः।। यानि- शुक्र द्वादश स्थान में स्थित हो और नवमेश द्वारा दृष्ट हो तो ऐसा मनुष्य निधि की प्राप्ति करता है। अर्थात शुक्र की द्वादश स्थान में स्थिति अच्छी मानी गई है। भावार्थ रत्नाकार में कहा गया है- शुक्रस्य षष्ठं संस्थानं योगहं भवति ध्रुवम्। व्यय स्थितस्य शुक्रस्य यथा योगम् वदन्ति हि।। अर्थात - शुक्र छठे स्थान में स्थित होकर उतना ही योगप्रद है जितना की वह द्वादश भाव में स्थित होकर योगप्रद है। उत्तरकालामृत में कहा गया है कि - ‘षष्टस्थो शुभ कृत्कविः यानि छठे स्थान में शुक्र की स्थिति इसलिये अच्छी मानी जाती है, क्योंकि बारहवें भाव में उसकी पूर्ण दृष्टि रहती है, जिस कारण वह भोगकारी योग बनाता है। इस तरह शुक्र की बारहवें भाव में स्थिति भोग योग बनाती है और भोग बिना धन के संभव नहीं है अतः यही भोग योग धन योग भी बन जाता है। जिन व्यक्तियों के बारहवें भाव में शुक्र स्थित होता है, वे बहुधा योग सामग्री द्वारा अपना जीवन सुविधा से चला लेते हैं। यदि अधिक धनी न हों तो दरिद्री को भी प्राप्त नहीं होता। परंतु जब यह ग्रह शुक्र लग्न के साथ सूर्य लग्न से व चंद्र लग्न से भी द्वादश हो या किन्हीं दो लग्नों में द्वादश स्थान में स्थित हो तो दो लग्नों से द्वादश स्थान में होने के कारण शुक्र दुगुना योगप्रद हो जाता है और तीनों लग्नों से द्वादश हो तो सोने पर सुहागा वाली बात होगी, ऐसी स्थिति में शुक्र अतीव शुभ योग देने वाला, महाधनी बनाने वाला बन जाता है- भावार्थ रत्नाकर के अनुसार - यह भाव कारको लग्नाद् व्यये तिष्ठति चेद्यदि। तस्य भावस्थ सर्वस्य भाग्य योग उदीरितः।। यानि - इस भाव से जातक को विषयक बातों का लाभ होगा, जिस भाव का कारक लग्न से द्वादश भाव में स्थित हो शुक्र जाया (पत्नी) भाव का कारक ग्रह है, अतः जिन जातकों के बारहवें भाव में शुक्र रहता है, उन्हें स्त्री सुख में कभी कमी नहीं होगी, प्रायः ऐसे व्यक्तियों की पत्नी दीर्घजीवी हुआ करती है।
विभिन्न भावों में मंगल का फल
प्रथम भाव जन्मकुंडली के प्रथम भाव में मंगल जातक को साहसी, निर्भीक, क्रोधी, किसी हद तक क्रूर बनाता है, पित्त रोग का कारक होता है तथा चिड़चिड़ा स्वभाव वाला बनाता है। उसमें तत्काल निर्णय लेने की क्षमता होती है तथा वह लोगों को प्रभावित करने तथा अपना काम करवाने की योग्यता रखता है। वह अचल संपत्ति उत्तराधिकार से प्राप्त करता है। साथ ही साथ स्वयं के प्रयास से भी निर्माण करता है। परन्तु यदि इस भाव में मंगल नीच का हुआ तो जातक दरिद्र, आलसी, असंतोषी, उग्र स्वभाव का, सुख में कमी, कठोर, दुव्र्यसनी तथा पतित चरित्र वाला बना सकता है। जातक को नेत्रों के कष्ट तथा पांचवें वर्ष में जीवन पर संकट का भय होता है। द्वितीय भाव जन्मकुंडली के दूसरे भाव का मंगल जातक को कृषि से आजीविका प्रदान करता है। चरित्रहीन लोगों से कष्ट पा सकता है। अनावश्यक विश्वास के कारण धन हानि तथा दांतों में कष्ट का भी भय रहता है। परिवार के अन्य सदस्यों का रूखा स्वभाव दुखों का कारण हो सकता है तथा उसके बिजली तथा आग से सावधान रहने की आवश्यकता है। वह तीखे भोजन का शौकीन, चिड़चिड़ा तथा औषधियों और पशुओं से लाभ प्राप्त करता है। जीवन के नवें वर्ष में स्वास्थ्य का तथा 12वें वर्ष में धन की हानि का भय रहता है। तृतीय भाव तृतीय भाव का मंगल जातक को पराक्रमी, शत्रु पर विजय पाने वाला, यु़द्ध कला में निपुण, परिवार जनों से सुख पाने वाला, छोटे भाई के लिए कष्ट का कारण तथा यात्रा का प्रेमी बनाता है। वह राजा अथवा शासन द्वारा सम्मान का अधिकारी होता है, परंतु पीड़ित मंगल मानसिक कष्ट, धन अभाव तथा जीवन के 13वें वर्ष में माता के लिए कष्ट का कारण हो सकता है। चतुर्थ भाव चतुर्थ भाव के मंगल का जातक पत्नी के प्रभाव में रहता है। माता से अप्रसन्न तथा विभिन्न रोगों से पीड़ा प्रदान करता है। जातक व्याकुल, चोर व अग्नि का भय तथा जीवन साथी (पति या पत्नी) से असंतोष का अनुभव करता है। इस भाव में उच्च का मंगल जातक को अचल संपत्ति तथा वैभवशाली वाहन का सुख प्रदान करता है किंतु नीच का मंगल आठ वर्ष की आयु में परिवार में दुर्घटना का कारण होता है। पंचम भाव पंचम भाव का मंगल जातक को शारीरिक रोगों से कष्ट, संतान से चिंता, अग्नि से भय तथा कम अक्ल लोगों से प्रभावित होने वाला बनाता है। जातक परिवार के साथ तीर्थ यात्रा करने वाला, क्रूर, चंचल, पत्नी का गर्भपात से कष्ट की संभावनाओं वाला होता है। जोखिम उठाने वाला, वैभवशाली, शिक्षा में बाधा, अनैतिक कार्य करने वाला तथा जीवन के छठे वर्ष में बिजली अथवा आग से कष्ट पाने वाला होता है। षष्ठम भाव छठे भाव का मंगल जातक को प्रसिद्धि, विद्वानों से मैत्री तथा उपक्रमों में सफलता प्रदान करता है। उनमें विरोधी और प्रतिद्वंद्वियों से सीधे सामना करने की योग्यता होती है। यदि छटे भाव में मंगल नीच का हो या कमजोर हो तो जातक अधीनस्थों व ठगों से छला जाने वाला, माता से सुख में कमी, निर्भीक किन्तु रोगों से कष्ट पाने वाला बनाता है। आयु का 34वां वर्ष लाभकारी होता है। सप्तम भाव सप्तम् भाव में मंगल जातक को साझेदारी से कष्ट, वैवाहिक जीवन में असंतोष अथवा परिवार से दूर आवास दे सकता है। यदि मंगल पीड़ित हो तो विभिन्न प्रकार से कष्ट देता है। जातक अनैतिक कार्यों में लिप्त हो सकता है। नशे आदि व्यसन का आदि हो सकता है। उसे विभिन्न मामलों में अदालत में खींचा जा सकता है। जीवन में समय-समय पर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। आयु के 27वें वर्ष में परिवार में किसी सदस्य के स्वास्थ्य के प्रति कष्टदायक होता है। अष्टम भाव अष्टम् भाव का मंगल जातक को धनवान और नेता बनाता है। उसमें व्यय की उत्कृष्ट ईच्छा होती है तथा वह नेत्र विकार से पीड़ित होता है। उसे अग्नि व अस्त्र से भय रहता है। इस भाव में उच्च का मंगल जातक को पैतृक संपत्ति पाने में सहायक होता है किंतु नीच का मंगल समस्याओं को जन्म देता है। ऐसा जातक बवासीर से पीड़ित तथा सदा आर्थिक समस्याओं से घिरा रहता है। आयु का 25वां वर्ष दुर्भाग्य देने वाला हो सकता है। नवम भाव नवम् भाव में मंगल जातक को झूठा, हठी, क्रूर, संदेही, ईष्र्यालु तथा पिता के प्यार से वंचित रखता है। उच्च का मंगल जातक को प्रसिद्धि, धार्मिक, धनी, दानी, शासन से सम्मानित, बुद्धिमान तथा अपने प्रयास द्वारा कार्यक्षेत्र में उन्नति के शिखर को पाने वाला बनाता है। नीच का मंगल उसे विभिन्न रोगों से पीड़ित, पापमय तथा दुर्भाग्यवान करता है। आयु के 28वें वर्ष में भाग्य लक्ष्मी जी की उस पर विशेष कृपा होती है। दशम भाव दशम् भाव का मंगल जातक को तेजस्वी, विजयी, उदारमना, बलिष्ठ, शक्तिमान तथा विपरीत लिंग वालों को सहज ही प्रभावित करने वाला बनाता है। वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने वाला कोई भी कार्य अधूरा न छोड़ने वाला तथा अपने गुरु व बड़ों का आदर करने वाला होता है। वह धैर्यवान, दूसरों की सहायता करने वाला, दानी तथा अपने पराक्रम द्वारा विद्रोहियों को परास्त करने की क्षमता रखने वाला होता है। वह चुनौतियों को स्वीकार करने वाला तथा अधिकतर अवसरों पर अपनी योग्यता को सिद्ध कर दिखाले वाला होता है। यदि मंगल कमजोर है तो जातक को नशे की लत, व्यापार में नुकसान तथा आयु के 26वें वर्ष में स्वयं पर संकट देता है। एकादश भाव ग्यारवें भाव का मंगल व्यक्ति को धनवान तथा अपनी अधिकांश इच्छाओं व अकांक्षाओं को पूरा करने वाला बनाता है। जातक उदार हृदय, शासन से लाभ पाने वाला, मुख्यतः अपने द्वारा किए गये प्रयासों से लाभान्वित होने वाला तथा प्रभावशाली लोगों से मैत्री रखने वाला होता है, किंतु नीच का मंगल समय-समय पर बाधाएं उत्पन्न करता है। उसे नीतिहीन, दुश्चरित्र मित्रों व संतान द्वारा धनहानि का भय रहता है। जीवन के 24वें वर्ष में वह विशेष लाभ अर्जित करता है। द्वादश भाव बारहवें भाव का मंगल जातक को सम्मान से वंचित तथा दूसरे के धन पर कुदृष्टि रखने वाला बनाता है। ऐसे व्यक्ति में नशे की लत व विवाह से अतिरिक्त संबंध होने की संभावना रहती है। यद्यपि वह परिश्रमी तथा धनसंग्रह की ईच्छा रखने वाला परंतु परिवार, विशेष रूप से पत्नी उसके जीवन की एक बड़ी बाधा होती है। नीच का मंगल होने पर जातक उच्च पद से पतित होता है एवं जेल का कष्ट भी भोगना पड़ सकता है। आयु के 45वें वर्ष में उसे समस्याओं से जूझना पड़ सकता है। विभिन्न राशियों में मंगल का परिण् ााम व प्रभावः मेष मंगल मेष राशि में व्यक्ति को साहसी, यु़द्ध क्षेत्र में विजयी तथा अधिकारियों व शासन से लाभ पाने वाला बनाता है। राजा व शासन से सम्मान, अधिकाधिक धन कमाने वाला तथा जीवन में संपत्ति और समृद्धिवान करता है। मेष राशि का व्यक्ति सदा सदाचारी रहता है किंतु कभी-कभी शारीरिक रोग का भागी होता है। वृष वृष राशि में मंगल व्यक्ति को ज्ञानी, व्यक्तियों का सम्मान करने वाला बनाता है। उसके उद्देश्य सदा सकारात्मक होते हैं। वह सत्य कर्मों में अपने धन को लगाने में रुचि रखता है। वह चिन्तनशील तथा जहां तक हो सके व्यवहारी होने का प्रयास करता है। उसमें वृद्धावस्था के लिए बहुत-सा धन संचय करने की एक महत्वपूर्ण ईच्छा रहती है तथा पत्नी के लिए वह अस्वस्थता का कारक होता है। मिथुन यदि मंगल मिथुन राशि में विराजमान हो तो यह व्यक्ति को भ्रमण प्रिय बनाता है। अतः वह विभिन्न स्थानों से अच्छी तरह परिचित हो जाता है। इस जातक का अपने पिता से हमेशा मतभेद रहता है किंतु अपने उच्चाधिकारियों पर वह अच्छा प्रभाव छोड़ता है। परिजनों से समरूपता का अभाव रहता है। वह बातूनी तथा विभिन्न कलाओं में दक्ष होता है। मंगल की इस राशि में उपस्थिति इसे अतिव्ययी बनाती है। कर्क कर्क राशि में मंगल जातक को वाहन, घर, नौकर, चाकर तथा अचल सम्पत्ति का सुख प्रदान करता है। उसमें अनावश्यक विवादों में पड़ने तथा उसके कारण मानसिक कष्ट भोगने की वृत्ति रहती है। कभी-कभी उसके अवैचारिक कार्य उसके लिए कष्ट का कारण होते हैं तथा पत्नी व संतान से असंतोष भी स्पष्ट दिखाई देता है। सिंह सिंह राशि में मंगल जातक को उच्चाधिकारी तथा दूसरों को सदा ही प्रभावित करने वाला होता है। वह व्यक्ति साहसी, विश्वसनीय, दृढ़ निश्चय वाला तथा नेतृत्व के गुणांे वाला होता है। वह राजा व अधिकारियों का प्रिय, संयमी, भाग्यवान तथा अपने अधिकारों के लिए सदा लड़ने को तैयार रहने वाला होता है। पत्नी या पति द्वारा भाग्य में वृद्धि, किंतु पुत्र से असंतोष, बिजली व आग से कष्ट का भय रहता है। कन्या कन्या राशि का मंगल जातक को चरित्रवान, नैतिक, समर्थ तथा अति धनी बनाता है। वह हंसमुख, प्रसन्नचित्त, हास-परिहास में रुचि वाला तथा दूसरों को सहज ही अपनी ओर कर लेने वाला होता है। विपरीत लिंग वालों से बहुत-सी आशाएं लगाने वाला होता है। जटिल परिस्थितियों के निर्णय में समर्थ किंतु धन का आना कुछ बाधित रहता है। तुला तुला राशि में मंगल जातक को कार्योन्मुख, स्पष्ट व्यवहार वाला, ईमानदार तथा उन्मुक्त स्वभाव वाला बनाता है। उसमें विद्युत गति से निर्णय लेने की शक्ति होती है। वह यात्राओं का प्रेमी तथा नए लोगों से मिलने को सदा आतुर रहता है। इन जातकों में व्यावसायिक समझ सदा सही होती है तथा विपरीत लिंग वालों से संबंधों में भाग्यवान होते हैं। वृश्चिक भाव वृश्चिक राशि में मंगल जातक को अचल संपत्ति से आय प्रदान करता है। वह साहसी, निर्भीक, खतरे उठाने वाला तथा बिना किसी देर के येन केन प्रकारेण सफलता के मार्ग पर बढ़ने वाला होता है। वह अपने इर्द-गिर्द बहुत से शत्रु बना लेता है। किंतु कोई भी उसके सम्मुख होकर उसकी आलोचना नहीं कर पाता। इनकी रुचि व अरुचि अति हद तक बढ़ी होती है। इन्हें जो रुचिकर होता है उस पर वह प्यार व ममता की बौछार कर देते हैं किंतु अरुचि होने पर उनके द्वेष व घृणा की कोई सीमा नहीं रहती तथा तब वह अपने वृश्चिक स्वभाव में आ जाते हैं। धनु भाव धनु राशि का मंगल जातक को सदा सत्य कार्यों में लिप्त तथा अपनी स्पष्ट छवि के प्रति सदा सचेत बनाता है। वह मेहनती व कर्मठ होते हैं तथा एक बार लक्ष्य के प्रति एकाग्र होने पर वह उसे पाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। अनावश्यक विवादों से दूर रहने वाले तथा संबंधों में खुलेपन से व्यवहार करने वाले होते हैं। ये धार्मिक प्रवृत्ति तथा पौराणिक ग्रंथों में रुचि लेने वाले होते हैं। मकर मकर राशि में मंगल जातक को विजयी तथा युद्ध भूमि में सम्मान पाने वाला बनाता है। वाद-विवाद में बहुत कुशल तथा कभी भी प्रतिवादी से न हारने वाला होता है। वह उच्च पद प्राप्त करता है। समृद्ध वातावरण में जीवनयापन करता है। अच्छी आय तथा उच्च अधिकारी पद प्राप्त करने में समर्थ होता है। नेतृत्व की योग्यता होती है तथा अपने कार्यों के कारण समाज में ख्याति प्राप्त करता है। कुंभ कुंभ राशि में मंगल जातक को अर्थहीन, वाद-विवादों में लिप्त तथा अलाभकारी उपक्रमों में समय अपव्यय करने वाला बनाता है। यद्यपि सावधान रहते हैं किंतु अपने से संबंध न रखने वाले विषयों में उलझने वाले होते हैं। इनमें धार्मिक कर्मकांडों के विरोध की वृत्ति होती है। परंतु अधार्मिक होने का दिखावा करते हैं जो कि वे वास्तव में नहीं होते। संतान के साथ तालमेल में कमी तथा उन्हें न समझ पाना चिंता का कारण होता है। वह अतिव्ययी व क्रोधी हो सकता है। मीन मीन राशि में मंगल जातक को मानसिक द्वंद्व प्रदान करता है। इनमें दूसरों की सहायता व सत्यकर्म की अटूट ईच्छा होती है। किंतु इनका चित्त विभिन्न विचारों से इतना चिंताग्रस्त रहता है कि वह अपना संयम खोकर कठोर वृत्ति वाला हो जाता है। अव्यावहारिक निवेश उसके दुखों को बढ़ा देते हैं तथा उन्हीं के चलते वह कर्ज के बोझ में भी दब सकते हैं। संतान के लिए चिंता व बिना ईच्छा के परदेश में वास करना पड़ सकता है।
सफल ज्योतिषी बनने के योग
इस विद्या में पारंगत व्यक्ति 'ज्योतिषी' कहलाता है। एक सफल ज्योतिषी केवल वही बन सकता है जो सच्ची निष्ठा एवं लगन से ईश्वरोपासना की ओर उन्मुख होकर उस परमब्रह्म का आशीर्वाद एवं ईश्वरीय कृपा प्राप्त कर ले। एक सफल ज्योतिषी बनने के लिये जन्म पत्रिका में शुभ ग्रहों का बली होना अति आवश्यक है। कुंडली में लग्न, पंचम, नवम भाव तथा बुध, गुरु, शुक्र, शनि एवं केतु ग्रह की उत्तम स्थिति जातक को ज्योतिष विद्या के अध्ययन की ओर अग्रसर करती है। फलदीपिका ग्रंथ के अनुसार- दशमेश यदि बुध के नवांश में हो तो काव्यागम, लेखनवृत्ति, लिपिविद्या, ज्योतिष, ग्रह नक्षत्र से संबंधित व्यवसाय, गणित, पूजा पाठ, पुरोहित आदि के कार्य द्वारा वृत्ति होती है। नवम भावस्थ, मिथुन, कर्क राशिगत सूर्य, कर्क राशिस्थ चंद्र, लग्नस्थ तथा एकादशस्थ बुध, लग्नस्थ या स्वराशिगत शुक्र, मीन राशिगत शनि एवं पंचमस्थ केतु जातक को ज्योतिषी बनाने में अहम् भूमिका निभाते हैं। -लग्न भाव या लग्नेश से बुध या गुरु ग्रह का संबंध हो अथवा बुध केंद्रस्थ हो तथा शुक्र लग्नस्थ होकर स्वराशि में हो तो जातक अच्छा ज्योतिषी बन सकता है। कुंडली नं. 1 में बुध लग्नेश शुक्र के साथ लग्न भाव में ही युति बना रहा है। शुक्र स्वराशिगत है तथा गुरु भी लाभ भाव में मीन राशि में स्थित है। बुध, गुरु, शुक्र शुभ स्थिति में है। जातक एक सफल, लोकमान्य ज्योतिषी है। कुंडली में यदि चंद्र गुरु की युति पंचम या नवम भावों में है अथवा चंद्र गुरु का दृष्टि संबंध इन भावों में बन रहा हो तो जातक मुखयतः हस्त रेखा विज्ञान में सफलता प्राप्त करता है। कुंडली नं. 2 में गुरु पंचम भाव में, तथा मित्र राशिस्थ चंद्र सप्तम में और शुक्र अपनी ही राशि नवम भाव में स्थित है, सूर्य मिथुन राशिगत तथा बुध एकादश भावस्थ है। यह कुंडली एक ज्योतिषी की है, जो अत्यंत कुशाग्र बुद्धि एवं प्रभावशाली, ओजस्वी वाणी का स्वामी है। जातक ज्योतिषीय गणनायें करने में भी पूर्णतया समर्थ है। मात्र 25-26 वर्ष की आयु में ही जातक ने एक लोकप्रिय कथावाचक, कुशल हस्तरेखाविद् एवं सटीक फलादेश करने में पारंगत ज्योतिषी के रूप में खयाति अर्जित कर ली है। कुंडली में नवम भावस्थ शुक्र पर पंचम भावस्थ गुरु की पंचम दृष्टि इस बात का स्पष्ट संकेत दे रही है कि भविष्य में भी जातक के ज्योतिष के क्षेत्र में चरम शिखर तक पहुंचने की पूरी संभावना है। शनि ग्रह को भी ज्योतिष एवं ज्ञान का आधार ग्रह माना गया है। जन्मकुंडली में शनि यदि मीन राशि में हो तो भी जातक अच्छा ज्योतिषी बनता है। साथ ही गोचर में शनि यदि जन्मस्थ शनि से सप्तम स्थान में भ्रमण करे तथा उच्चस्थ ग्रह की दशा-अंतर्दशा चल रही है उस विशेष समय में जातक ज्योतिष संबंधी अलौकिक ज्ञान प्राप्त करके खयाति, प्रसिद्धि, कीर्ति, धन, सम्मान, यश सभी कुछ प्राप्त करता है। कुंडली नं. 3 एक ज्योतिषी की है। पत्रिका में बुध व केतु लग्न भाव में स्थित है। शनि मीन राशिस्थ है तथा चंद्र गुरु की युति लाभ भाव में गजकेसरी योग का निर्माण कर रही है। जातक ज्योतिष विद्या का अध्ययन काफी समय से कर रहा है। किंतु एक प्रतिष्ठित एवं सम्मानित ज्योतिषी के रूप में सफलता उसे अब मिली है। वर्तमान समय में शनि का गोचर कन्या उच्चराशिस्थ मंगल की महादशा चल रही है जिसने ज्योतिष के कारक ग्रह बुध की अंतर्दशा एवं गोचरस्थ शनि के शुभ प्रभाव में जातक को वर्तमान समय में एक सफल ज्योतिषी बनने में पूर्ण सहायता प्रदान की है। केतु ग्रह को गणितीय योग्यता, गुप्त ज्ञान एवं अद्वितीय प्रतिभा का कारक ग्रह माना गया है तथा पंचम भाव से पूर्व जन्मों के संचित कर्म, मान-पुण्य, मंत्र, आत्मा आदि का विचार करते हैं। इस प्रकार केतु ग्रह तथा पंचम भाव दोनों ही गुप्त ज्ञान से संबंधित हैं। यही कारण है कि यदि केतु पंचम भाव में स्थित हो तो जातक अद्वितीय गुप्त ज्ञान, गणितीय योग्यता एवं बौद्धिक प्रतिभा के बल पर एक सफल ज्योतिषी बन सकता है। कुंडली नं. 4 मिथुन लग्न एवं सिंह राशि की है। शनि तथा मंगल अपनी उच्च राशि में हैं। इन सब के साथ ही पंचम भाव में उच्च का शनि विशिष्ट स्थिति में है। बुध तथा केतु दोनों ही ज्योतिष के आधार ग्रह हैं। उन पर उच्चस्थ शनि की तृतीय दृष्टि भी है। बुध व केतु की इस विशेष स्थिति के कारण जातक प्रकांड विद्वान, सफल ज्योतिषी एवं उच्च बौद्धिक प्रतिभा का धनी है। जन्मपत्रिका में उक्त ग्रहयोग जितनी अधिक प्रबल एवं शुभ स्थिति में होंगे, जातक ज्योतिष विद्या में उतना ही पारंगत होगा एवं अपने पास आने वाले प्रत्येक व्यक्ति का उचित मार्ग दर्शन करके उसे उसके आने वाले पलों के लिए तैयार कर सकेगा।
Thursday, 14 January 2016
ज्योतिषानुसार जाने की मन से परीक्षा का भय कैसे भगाएं
विद्यार्थियों के लिए परीक्षा का समय पास आ रहा है और परीक्षा पास आते ही विद्यार्थियों को उसका भय सताने लगता है। पढ़ाई में मन नहीं लगना, पाठ याद न होना, पुस्तक खुली होने पर भी मन का पढ़ाई में एकाग्रचित्त न होना, रात को देर तक नींद न आना या मध्य रात्रि में नींद उचट जाना आदि परीक्षा के भय के लक्षण है।
परीक्षा पढ़ाई का केवल एक मापक है, यह विद्यार्थी के ज्ञान का आकलन मात्र है। व्यक्ति के जीवन में उतार चढ़ाव या लाभ-हानि इसके द्वारा निर्धारित नहीं होते। किसी भी परीक्षा में सफल होने के लिए कुछ सूत्र होते हैं। इन सूत्रों को जान लेने, समझ लेने और उनके उपयोग करने से अच्छी सफलता सहजता से प्राप्त हो सकती है। परीक्षा के भय से मुक्ति के लिए निम्नलिखित सूत्र लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं-
ज्योतिषानुसार षनि की साढ़ेसाती और ढैया भी पढ़ने में अरुचि पैदा कर देती हंै। अतः किसी ज्ञानी पंडित द्वारा विद्यार्थी की पत्री को पढ़वाकर उसके उपाय करना उचित रहता है। इसके लिए सरसों के तेल का छाया दान या षनि की वस्तुओं का दान लाभदायक होता है। षनि के मंत्रों का जप व षनि मंदिर के दर्षन मन को एकाग्रचित्त करते हैं।
मन को एकाग्रचित्त करने के लिए प्राणायाम अत्यंत प्रभावशाली पाया गया है। इससे शरीर के अंदर की अशुद्ध वायु बाहर निकल जाती है और स्वच्छ वायु शरीर के स्नायुओं को पुनः क्रियान्वित व ऊर्जित कर देती है। इससे शरीर में शक्ति व स्फूर्ति पैदा होती है और मन एकाग्र हो जाता है। इसके लिए एक समय में केवल 5 से 10 बार सांस लेने और छोड़ने की प्रक्रिया को पूरी करें। परीक्षाओं के समय 5 से 10 बार तक अपने पढ़ने के स्थान पर ही प्राणायाम कर लेना लाभदायक होता है।
सरस्वती यंत्र की स्थापना और सरस्वती मंत्र का जप भी परीक्षा में उत्तम अंक प्राप्त करने के लिए लाभप्रद है।
।। ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं सरस्वत्यै नमः ।।
निम्न देवी के मंत्र का जप विद्या प्राप्ति के लिए अत्यंत उत्तम है।
या देवि सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
गायत्री मंत्र का जप रुद्राक्ष व स्फटिक मिश्रित माला पर करना श्रेयस्कर है।
ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम ।
भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।।
सरस्वती मंत्र सहित सरस्वती लाॅकेट बुधवार को धारण करें।
चार मुखी और छः मुखी रुद्राक्ष युक्त पन्ने का त्रिषक्ति कवच पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करने में अत्यंत लाभदायक लाभप्रद है।
बुधवार को गणेष जी को लड्डुओं का भोग लगाएं।
पढ़ाई के कमरे में मां सरस्वती का चित्र लगाकर रखें।
पढ़ते समय अपना मुख पूर्व या ईशान की ओर रखें। इससे मन एकाग्र रहेगा।
सोते समय अपने पैर उत्तर व सिर दक्षिण दिशा में रखें। इससे नींद गहरी आएगी और प्रातः काल ताजा व ऊर्जावान महसूस करेंगे।
परीक्षा के समय परीक्षा की तैयारी तो अवश्य करें लेकिन कितने अंक प्राप्त होंगे इस पर विचार नहीं करना चाहिए क्योंकि फल की आसक्ति ही मनुष्य को कमजोर बनाती है। दूसरे, हम यदि आने वाले अंकों पर विचार भी करेंगे तो इससे अंकों में बढ़ोतरी तो होगी नहीं, बल्कि सोच के कारण मन न लगने से अंक कम अवश्य हो सकते हैं। अतः सदा याद रखें:
परीक्षा पढ़ाई का केवल एक मापक है, यह विद्यार्थी के ज्ञान का आकलन मात्र है। व्यक्ति के जीवन में उतार चढ़ाव या लाभ-हानि इसके द्वारा निर्धारित नहीं होते। किसी भी परीक्षा में सफल होने के लिए कुछ सूत्र होते हैं। इन सूत्रों को जान लेने, समझ लेने और उनके उपयोग करने से अच्छी सफलता सहजता से प्राप्त हो सकती है। परीक्षा के भय से मुक्ति के लिए निम्नलिखित सूत्र लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं-
ज्योतिषानुसार षनि की साढ़ेसाती और ढैया भी पढ़ने में अरुचि पैदा कर देती हंै। अतः किसी ज्ञानी पंडित द्वारा विद्यार्थी की पत्री को पढ़वाकर उसके उपाय करना उचित रहता है। इसके लिए सरसों के तेल का छाया दान या षनि की वस्तुओं का दान लाभदायक होता है। षनि के मंत्रों का जप व षनि मंदिर के दर्षन मन को एकाग्रचित्त करते हैं।
मन को एकाग्रचित्त करने के लिए प्राणायाम अत्यंत प्रभावशाली पाया गया है। इससे शरीर के अंदर की अशुद्ध वायु बाहर निकल जाती है और स्वच्छ वायु शरीर के स्नायुओं को पुनः क्रियान्वित व ऊर्जित कर देती है। इससे शरीर में शक्ति व स्फूर्ति पैदा होती है और मन एकाग्र हो जाता है। इसके लिए एक समय में केवल 5 से 10 बार सांस लेने और छोड़ने की प्रक्रिया को पूरी करें। परीक्षाओं के समय 5 से 10 बार तक अपने पढ़ने के स्थान पर ही प्राणायाम कर लेना लाभदायक होता है।
सरस्वती यंत्र की स्थापना और सरस्वती मंत्र का जप भी परीक्षा में उत्तम अंक प्राप्त करने के लिए लाभप्रद है।
।। ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं सरस्वत्यै नमः ।।
निम्न देवी के मंत्र का जप विद्या प्राप्ति के लिए अत्यंत उत्तम है।
या देवि सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
गायत्री मंत्र का जप रुद्राक्ष व स्फटिक मिश्रित माला पर करना श्रेयस्कर है।
ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम ।
भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।।
सरस्वती मंत्र सहित सरस्वती लाॅकेट बुधवार को धारण करें।
चार मुखी और छः मुखी रुद्राक्ष युक्त पन्ने का त्रिषक्ति कवच पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करने में अत्यंत लाभदायक लाभप्रद है।
बुधवार को गणेष जी को लड्डुओं का भोग लगाएं।
पढ़ाई के कमरे में मां सरस्वती का चित्र लगाकर रखें।
पढ़ते समय अपना मुख पूर्व या ईशान की ओर रखें। इससे मन एकाग्र रहेगा।
सोते समय अपने पैर उत्तर व सिर दक्षिण दिशा में रखें। इससे नींद गहरी आएगी और प्रातः काल ताजा व ऊर्जावान महसूस करेंगे।
परीक्षा के समय परीक्षा की तैयारी तो अवश्य करें लेकिन कितने अंक प्राप्त होंगे इस पर विचार नहीं करना चाहिए क्योंकि फल की आसक्ति ही मनुष्य को कमजोर बनाती है। दूसरे, हम यदि आने वाले अंकों पर विचार भी करेंगे तो इससे अंकों में बढ़ोतरी तो होगी नहीं, बल्कि सोच के कारण मन न लगने से अंक कम अवश्य हो सकते हैं। अतः सदा याद रखें:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।– गीता
लग्नानुसार कुंडली से विदेश यात्रा के प्रमुख योग
जन्मकुंडली के द्वादश भावों में से प्रमुखतया, अष्टम भाव, नवम, सप्तम, बारहवां भाव विदेश यात्रा से संबंधित है। तृतीय भाव से भी लघु यात्राओं की जानकारी ली जाती है। अष्टम भाव समुद्री यात्रा का प्रतीक है। सप्तम तथा नवम भाव लंबी विदेश यात्राएं, विदेशों में व्यापार, व्यवसाय एवं प्रवास के द्योतक हैं। इसके अतिरिक्त लग्न तथा लग्नेश की शुभाशुभ स्थिति भी विदेश यात्रा संबंधी योगों को प्रभावित करती है। मेष लग्न 1- मेष लग्न हो तथा लग्नेश तथा सप्तमेश जन्म कुंडली के किसी भी भाव में एक साथ हों या उनमें परस्पर दृष्टि संबंध हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। 2- मेष लग्न में शनि अष्टम भाव में स्थित हो तथा द्वादशेश बलवान हो तो जातक कई बार विदेश यात्राएं करता है। 3- मेष लग्न हो व लग्नेश तथा भाग्येश अपने-अपने स्थानों में हों या उनमें स्थान परिवर्तन योग बन रहा हो तो विदेश यात्रा होती है। 4- मेष लग्न हो तथा छठे, अष्टम या द्वादश स्थान में कहीं भी शनि हो या शनि की दृष्टि इन भावों पर हो तो विदेश यात्रा का योग होता है। 5- मेष लग्न में अष्टम भाव में बैठा शनि जातक को स्थान से दूर ले जाता है तथा बार-बार विदेश यात्राएं करवाता है। उदाहरण कुंडलियों में सैफ अली खान व अभिषेक बच्चन की कुंडलियों में यही स्थिति है। वृष लग्न 1- वृष लग्न में सूर्य तथा चंद्रमा द्वादश भाव में हो तो जातक विदेश यात्रा करता है तथा विदेश में ही काम-धंधा करता है। 2- वृष लग्न हो तथा शुक्र केंद्र में हो और नवमेश नवम भाव में हो तो विदेश यात्रा का योग होता है। 3- वृष लग्न हो तथा शनि अष्टम भाव में स्थित हो तो जातक बार-बार विदेश जाता है और विदेश यात्राएं होती रहती हैं। 4- वृष लग्न हो व लग्नेश तथा नवम भाव का स्वामी, मेष, कर्क, तुला या मकर राशि में हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। 5- वृष लग्न में भाग्य स्थान या तृतीय स्थान में मंगल राहु के साथ स्थित हो तो जातक सैनिक के रूप में विदेश यात्राएं करता है। उदाहरण कुंडली में लता मंगेशकर की यही स्थिति है- 6- वृष लग्न में राहु लग्न, दशम या द्वादश में हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। लता मंगेशकर की कुंडली में राहु द्वादश भाव में स्थित है। गायन के सिलसिले में इन्होंने कई विदेश यात्राएं की हैं। मिथुन लग्न 1- मिथुन लग्न हो, मंगल व लग्नेश दसवें भाव में स्थित हो, चंद्रमा व लग्नेश शनि द्वारा दृष्ट न हांे तो ऐसे योग वाला जातक विदेश यात्रा करता है। 2- मिथुन लग्न हो और लग्नेश तथा नवमेश का स्थान परिवर्तन योग हो तो विदेश यात्रा योग बनता है। 3- मिथुन लग्न हो, शनि वक्री होकर लग्न में बैठा हो तो कई बार विदेश यात्राएं होती हैं। 4- मिथुन लग्न हो तथा लग्नेश व द्वादशेश में परस्पर स्थान परिवर्तन हो व अष्टम व नवम भाव बलवान हो तो विदेश यात्रा होती है। यदि लग्न में राहु अथवा केतु अनुकूल स्थिति में हों और नवम भाव तथा द्वादश स्थान पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। कर्क लग्न 1- कर्क लग्न हो और लग्नेश व चतुर्थेश बारहवें भाव में स्थित हो तो जातक विदेश यात्रा करता है। 2- कर्क लग्न में चंद्रमा नवम भाव में हो और नवमेश लग्न में स्थित हो तो विदेश यात्रा होती है। 3- यदि लग्नेश, भाग्येश और द्वादशेश कर्क, वृश्चिक व मीन राशियों में स्थित हो, तो विदेश यात्रा का योग होता है। 4- यदि लग्नेश नवम भाव में स्थित हो और चतुर्थेश छठे, आठवें या द्वादश भाव में हो तो विदेश यात्राएं होती हैं। 5- यदि लग्नेश बारहवें स्थान में हो या द्वादशेश लग्न में हो तो काफी संघर्ष के बाद विदेश यात्रा होती है। 6- कर्क लग्न में लग्नेश व द्वादशेश की किसी भी भाव में युति हो तो विदेश यात्राएं होती हैं। सिंह लग्न 1- सिंह लग्न में गुरु, चंद्र 3, 6, 8 या 12वें भाव में हो तो विदेश यात्रा के योग हैं। 2- लग्नेश जहां बैठा हो उससे द्वादश भाव में स्थित ग्रह अपनी उच्च राशि में स्थित हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। 3- सिंह लग्न में द्वादश भाव में कर्क का चंद्रमा स्थित हो तो विदेश यात्रा होती है। 4- सिंह लग्न हो तथा मंगल और चंद्रमा की युति द्वादश भाव में हो तो विदेश यात्रा होती है। 5- यदि सिंह लग्न में लग्न स्थान में सूर्य बैठा हो व नवम व द्वादश भाव शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। कन्या लग्न 1- यदि कन्या लग्न में सूर्य स्थित हो व नवम व द्वादश भाव शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो विदेश यात्रा योग बनता है। 2- यदि सूर्य अष्टम स्थान में स्थित हो तो जातक दूसरे देशों की यात्राएं करता है। 3- यदि लग्नेश, भाग्येश और द्वादशेश का परस्पर संबंध बने तो जातक को जीवन में विदेश यात्रा के कई अवसर मिलते हैं। 4- कन्या लग्न में बुध और शुक्र का स्थान परिवर्तन विदेश यात्रा का योग बनाता है। 5- द्वितीय भाव में शनि अपनी उच्च राशि में स्थित हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। तुला लग्न 1- तुला लग्न में नवमेश बुध उच्च का होकर बारहवें भाव में स्वराशि में स्थित हो, राहु से प्रभावित हो तो राहु की दशा अंतर्दशा में विदेश यात्रा होती है। 2- यदि चतुर्थेश व नवमेश का परस्पर संबंध हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। 3- यदि नवमेश या दशमेश का परस्पर संबंध या युति या परस्पर दृष्टि संबंध हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। 4- चतुर्थ स्थान में मंगल व दशम स्थान में गुरु उच्च का होकर स्थित हो। 5- यदि लग्न में शुक्र व सप्तम में चंद्रमा हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है।
कुंडली में धन योग
भारतीय सनातन ज्योतिष में प्राकृतिक कुण्डली की अवधारणा वास्तविक ग्रहों, पिण्डों पर नहीं वरन् उनके द्वारा चराचर जगत पर डाले जाने वाले विभिन्न प्रभावों के मानव जीवन पर आकलन के लिए कल्पित की गई है। ज्योतिष शास्त्र में धन की दृष्टि से शुभ तथा अशुभ भावों एवं ग्रहों के मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को विस्तार से बताया गया है।
जन्म कुंडली के बारह भावों को मुखय रूप से दो भागों में विभक्त किया गया है- एक शुभ भाव, दूसरा अशुभ भाव। शुभ भावों में लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम, दशम एवं एकादश का समावेश है जबकि अशुभ भावों में तृतीय, षष्ठ, अष्टम एवं द्वादश को सम्मिलित किया गया है। यह वर्गीकरण केवल आर्थिक दृष्टिकोण से है अपितु सुख, भाग्य आदि को भी दर्शाता है।
अतः लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, नवम आदि भावों के स्वामी जब केंद्र अथवा त्रिकोण आदि शुभ स्थानों में स्थित होकर शुभ युक्त अथवा शुभ दृष्ट होंगे। तो जातक को धन, सुख, भाग्य आदि की प्राप्ति होगी अथवा इसका समर्थन होगा और इसके विपरीत जब तृतीय, षष्ठ, अष्ठम आदि भावों के स्वामी केंद्रादि में बलवान होंगे तो अभाव, दरिद्रता, रोग आदि की प्राप्ति अथवा वृद्धि होगी। इस प्रकार जब द्वितीय चतुर्थ, पंचम, नवम आदि भावों के स्वामी निर्बल होंगे। तो धन आदि का नाश होगा। यद्यपि एकादशेश को महर्षि पाराशर ने पापी माना है परंतु जहां तक लाभ (आय) आदि की प्राप्ति का प्रश्न हो, यह धन दायक ही सिद्ध होगा।
जन्मकुंडली/चंद्र कुंडली में धन लाभ आदि हेतु लग्न द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, नवम एवं एकादश भावों की प्रधानता है।
विशेष धन योग-
जन्म व चंद्र कुंडली में यदि द्वितीय भाव का स्वामी एकादश भाव में और एकादशेश धन भाव में स्थित हो अथवा द्वितीयेश एवं एकादशेश एकत्र हों और भाग्येश (नवमेश) द्वारा दृष्ट हो तो जातक धनवान होगा।
शुक्र यदि द्वितीय भाव में तुला/वृष राशि में स्थित हो और एकादशेश अथवा धनेश द्वारा दृष्ट हो तो जातक धनवान होता है। शुक्र की द्वितीय भाव में स्थिति को बहुत महत्व दिया गया है। एक फारसी ज्योतिषी ने कहा कि-
''चश्मखोरा मालखाने, यदा मुस्तरी कर्कटे कमाने तदा ज्योतिषि क्या पढ़ेगा, क्या देखेगा, वो बालक बादशाह होगा''
''मालखाने चश्म खोरा, हरम खाने मुस्छरी जमीं खाने जमीं फर्जन, हिल हिलावे में मैधानी।
कहने का तात्पर्य यह है कि चश्मखोरा (शुक्र) द्वितीय (मालखाने) भाव में हो और बृहस्पति सप्तम भाव, चतुर्थेश चतुर्थ भाव में स्थित हो तो जातक राजा के समान सम्मान पाने वाला होता है।
पंचमेश एकादश भाव में एवं एकादशेश पंचम भाव में स्थित हो और नवमेश द्वारा दृष्ट हो तो जातक अत्यधिक धनवान एवं संपत्तिवान होता है।
यदि नवमेश शुक्र हो और लाभेश, धनेश बृहस्पति द्वारा दृष्ट हो तो जातक धनी होता है।
चंद्रमा एवं मंगल की केंद्र/त्रिकोण में युति हो तो लक्ष्मी योग होता है। लाभेश, नवमेश तथा द्वितीयेश (धनेश) इनमें से कोई एक भी ग्रह लग्न अथवा केंद्र में स्थित हो और बृहस्पति द्वितीय, पंचम अथवा एकादश भाव का स्वामी होकर उसी प्रकार केंद्र में हो तो जातक धनी एवं स्थायी साम्राजय का स्वामी होता है।
लग्न से नवमेश तथा दशमेश युति, दृष्टि अथवा व्यत्यय द्वारा परस्पर संबंधित हों और बलवान होकर एक दूसरे से केंद्र में हों तो जातक उत्तम दर्जे का धनी होता है।
जब हम भाग्येश पर विचार करते हैं तो ऐसे सर्वोत्तम शुभ ग्रह पर विचार करते हैं जो भाग्य का प्रतिनिधि होने से राज्य धन आदि की खान है। अतः ऐसे भाग्याधिपति का संबंध द्वितीयेश जो स्वयं धन भाव का स्वामी है एवं लग्नेश जो लाभ दिलवाता ही है, ऐसे ग्रह से होने से यदि प्रचुर मात्रा में धन/लाभ मिले तो अतिश्योक्ति नहीं। इस प्रकार पंचमेश भी भाग्येश की भांति फलदायक है क्योंकि उत्तर कालामृत के प्रसिद्ध भावात्-भावम के सिद्धांत के अनुसार पंचम भाव, नवम भाव से नवम होने के कारण भाग्येश का भी प्रतिनिधित्व करता है।
नवमेश तथा दशमेश ग्रह परस्पर युति दृष्टि अथवा व्यत्यय द्वारा संबंधित हों ओर बलवान होकर एक दूसरे से केंद्र में (1-4-7-10) स्थित हों और ये ग्रह यदि शुक्र और बृहस्पति हों तो जातक उत्तम दर्जे का धनी एवं राज्यधिकरी होता है। ऐसे योग में साधारण परिवार में जन्म लेकर भी जातक अत्यधिक संपति का मालिक होता है।
जन्म कुंडली के बारह भावों को मुखय रूप से दो भागों में विभक्त किया गया है- एक शुभ भाव, दूसरा अशुभ भाव। शुभ भावों में लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम, दशम एवं एकादश का समावेश है जबकि अशुभ भावों में तृतीय, षष्ठ, अष्टम एवं द्वादश को सम्मिलित किया गया है। यह वर्गीकरण केवल आर्थिक दृष्टिकोण से है अपितु सुख, भाग्य आदि को भी दर्शाता है।
अतः लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, नवम आदि भावों के स्वामी जब केंद्र अथवा त्रिकोण आदि शुभ स्थानों में स्थित होकर शुभ युक्त अथवा शुभ दृष्ट होंगे। तो जातक को धन, सुख, भाग्य आदि की प्राप्ति होगी अथवा इसका समर्थन होगा और इसके विपरीत जब तृतीय, षष्ठ, अष्ठम आदि भावों के स्वामी केंद्रादि में बलवान होंगे तो अभाव, दरिद्रता, रोग आदि की प्राप्ति अथवा वृद्धि होगी। इस प्रकार जब द्वितीय चतुर्थ, पंचम, नवम आदि भावों के स्वामी निर्बल होंगे। तो धन आदि का नाश होगा। यद्यपि एकादशेश को महर्षि पाराशर ने पापी माना है परंतु जहां तक लाभ (आय) आदि की प्राप्ति का प्रश्न हो, यह धन दायक ही सिद्ध होगा।
जन्मकुंडली/चंद्र कुंडली में धन लाभ आदि हेतु लग्न द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, नवम एवं एकादश भावों की प्रधानता है।
विशेष धन योग-
जन्म व चंद्र कुंडली में यदि द्वितीय भाव का स्वामी एकादश भाव में और एकादशेश धन भाव में स्थित हो अथवा द्वितीयेश एवं एकादशेश एकत्र हों और भाग्येश (नवमेश) द्वारा दृष्ट हो तो जातक धनवान होगा।
शुक्र यदि द्वितीय भाव में तुला/वृष राशि में स्थित हो और एकादशेश अथवा धनेश द्वारा दृष्ट हो तो जातक धनवान होता है। शुक्र की द्वितीय भाव में स्थिति को बहुत महत्व दिया गया है। एक फारसी ज्योतिषी ने कहा कि-
''चश्मखोरा मालखाने, यदा मुस्तरी कर्कटे कमाने तदा ज्योतिषि क्या पढ़ेगा, क्या देखेगा, वो बालक बादशाह होगा''
''मालखाने चश्म खोरा, हरम खाने मुस्छरी जमीं खाने जमीं फर्जन, हिल हिलावे में मैधानी।
कहने का तात्पर्य यह है कि चश्मखोरा (शुक्र) द्वितीय (मालखाने) भाव में हो और बृहस्पति सप्तम भाव, चतुर्थेश चतुर्थ भाव में स्थित हो तो जातक राजा के समान सम्मान पाने वाला होता है।
पंचमेश एकादश भाव में एवं एकादशेश पंचम भाव में स्थित हो और नवमेश द्वारा दृष्ट हो तो जातक अत्यधिक धनवान एवं संपत्तिवान होता है।
यदि नवमेश शुक्र हो और लाभेश, धनेश बृहस्पति द्वारा दृष्ट हो तो जातक धनी होता है।
चंद्रमा एवं मंगल की केंद्र/त्रिकोण में युति हो तो लक्ष्मी योग होता है। लाभेश, नवमेश तथा द्वितीयेश (धनेश) इनमें से कोई एक भी ग्रह लग्न अथवा केंद्र में स्थित हो और बृहस्पति द्वितीय, पंचम अथवा एकादश भाव का स्वामी होकर उसी प्रकार केंद्र में हो तो जातक धनी एवं स्थायी साम्राजय का स्वामी होता है।
लग्न से नवमेश तथा दशमेश युति, दृष्टि अथवा व्यत्यय द्वारा परस्पर संबंधित हों और बलवान होकर एक दूसरे से केंद्र में हों तो जातक उत्तम दर्जे का धनी होता है।
जब हम भाग्येश पर विचार करते हैं तो ऐसे सर्वोत्तम शुभ ग्रह पर विचार करते हैं जो भाग्य का प्रतिनिधि होने से राज्य धन आदि की खान है। अतः ऐसे भाग्याधिपति का संबंध द्वितीयेश जो स्वयं धन भाव का स्वामी है एवं लग्नेश जो लाभ दिलवाता ही है, ऐसे ग्रह से होने से यदि प्रचुर मात्रा में धन/लाभ मिले तो अतिश्योक्ति नहीं। इस प्रकार पंचमेश भी भाग्येश की भांति फलदायक है क्योंकि उत्तर कालामृत के प्रसिद्ध भावात्-भावम के सिद्धांत के अनुसार पंचम भाव, नवम भाव से नवम होने के कारण भाग्येश का भी प्रतिनिधित्व करता है।
नवमेश तथा दशमेश ग्रह परस्पर युति दृष्टि अथवा व्यत्यय द्वारा संबंधित हों ओर बलवान होकर एक दूसरे से केंद्र में (1-4-7-10) स्थित हों और ये ग्रह यदि शुक्र और बृहस्पति हों तो जातक उत्तम दर्जे का धनी एवं राज्यधिकरी होता है। ऐसे योग में साधारण परिवार में जन्म लेकर भी जातक अत्यधिक संपति का मालिक होता है।
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