Saturday, 18 April 2015

दूधाधारी मठ एवं मंदिर:


दूधाधारी मठ एवं मंदिर:
सन 1610 मेंं रायपुर मेंं बूढ़ा तालाब के तट पर एक छोटे से मंदिर के रूप मेंं दूधाधारी मठ की स्थापना की गई थी. इसे इसके वर्तमान स्थान पर राजस्थान के रामानुज दास द्वारा पुन: निर्मित कराया गया. इस मठ के प्रथम महंत रामानुज के भतीजे, बलभद्र थे. यह मठ रामानंद समुदाय से सम्बद्ध है. मठ के दो भाग हैं, एक मेंं भगवान बालाजी स्थापित हैं और दूसरा भाग राम पंचायतन को समर्पित है. प्रदेश के विभिन्न भागों की कलाकृतियाँ यहाँ देखी जा सकती हैं. पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार मठ के भवन का वास्तु-शास्त्र उड़ीसा शैली से प्रभावित है तथा यहाँ का अलंकरण मराठा शैली के समान है. दूधाधारी मठ शहर का सबसे प्राचीन मंदिर है। मंदिर का निर्माण 17वीं शताब्दी मेंं कलचुरी राजा जैत सिंह के समय हुआ था। वैष्णव संप्रदाय से संबंधित इस मंदिर मेंं रामायण कालीन दृश्यों का शिल्पांकन बहुत आकर्षक तरीके से किया गया है। मंदिर मेंं मराठा कालीन पेंटिंग आज भी मौजूद हैं। इसके नाम को लेकर किंवदंतियां प्रचलित है। राजस्थान के झींथरा नामक स्थल के संत गरीबदास ने यहां अपना डेरा जमाया था। उनकी परंपरा मेंं संत बलभद्रदास हुए, जो भोजन मेंं अनाज के स्थान पर केवल दूध लेते थे। उन्हें दूधाधारी महाराज संबोधित करते थे। बाद मेंं इसी आधार पर मठ का नाम भी दूधाधारी प्रचलित हो गया। विद्वानों का कहना है कि मंदिर के निर्माण मेंं सिरपुर से लाई गई पुरा सामग्री का प्रयोग किया गया है। भगवान रामचंद्र का मंदिर के अलावा यहां मारुति मंदिर भी दर्शनीय है।

Pt.P.S Tripathi
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