Saturday, 18 April 2015

दोषों के उपाय :

 दोषों के उपाय :
अमावस्या का जन्म :
ऋषि पाराशर जी का मानना है कि अमावस्या के जन्म से घर मेंं दरिद्रता आती है अत: अमावस्या के दिन संतान का जन्म होने पर शांति अवश्य करानी चाहिए। इस उपाय के अंतर्गत विधिपूर्वक कलश स्थापना करके उसमेंं पंच पल्लव, जड, छाल और पंचामृत डालकर अभिमंत्रित करके अग्निकोण मेंं स्थापना कर दें फिर सूर्य की सोने की, चंद्रमा की चांदी की मूर्ति बनवाकर स्थापना करें और षोडशोपचार या पंचोपचार से पूजन करें फिर इन ग्रहों की समिधा से हवन करें, माता-पिता का भी अभिषेक करें और सोने, चांदी या गाय की दक्षिणा दें और इसके बाद ब्राह्मण भोजन कराएं। इससे गर्त के ग्रह चंद्रमा एवं सूर्य की शांति होती है और जातक का कल्याण होता है।
कृष्ण चतुर्थी व्रत के उपाय :
चतुर्थी को छ: भागों मेंं बांटा है। प्रथम भाग मेंं जन्म होने पर शुभ होता है, द्वितीय भाग मेंं जन्म हो तो पिता का नाश, तृतीय भाग मेंं जन्म हो तो माता की मृत्यु, चतुर्थ भाग मेंं जन्म हो तो मामा का नाश, पंचम भाग मेंं जन्म हो तो कुल का नाश, छठे भाग मेंं जन्म हो तो धन का नाश या जन्म लेने वाले स्वयं का नाश होता है।
उपाय : इस दोष का निवारण भगवान शिवजी की पूजा से होता है। यथाशक्ति शिव की स्वर्ण प्रतिमा बनाकर महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। इस जप का विधान थोड़ा सा तकनीकी और कठिन होता है। हवन मेंं सभी ग्रहों की आहुतियां उनके निमित्त समिधा से दी जाती हैं, बाद मेंं स्थापित कलश के जल से माता-पिता का अभिषेक कराया जाता है।
भद्रा इत्यादि मेंं जन्म का दोष :
भद्रा, क्षय तिथि, व्यतिपात, परिघ, वज्र आदि योगों मेंं जन्म तथा यमघंट इत्यादि मेंं जो जातक जन्म लेता है, उसे अशुभ माना गया है।
उपाय : यह दुर्योग जिस दिन हुआ हो, वह दुर्योग जिस दिन आए उसी दिन इसकी शांति करानी आवश्यक है। इस दुर्योग के दिन विष्णु, शंकर इत्यादि की पूजा व अभिषेक शिवजी मंदिर मेंं धूप, घी, दीपदान तथा पीपल वृक्ष की पूजा करके विष्णु भगवान के मंत्र का 108बार हवन कराना चाहिए। पीपल को आयुर्दायक माना गया है। इसके पश्चात् ब्राह्मण भोज कराएं तो व्यक्ति दोष मुक्त हो जाता है।
माता-पिता के नक्षत्र मेंं जन्म :
यदि माता-पिता या सगे भाई-बहिन के नक्षत्र मेंं किसी का भी जन्म हो तो उनमेंं से किसी को भी मरणतुल्य कष्ट अवश्य होगा।
उपाय : किसी शुभ लग्न मेंं अग्निकोण से ईशान कोण की तरफ जन्म नक्षत्र की सुंदर प्रतिमा बनाकर कलश पर स्थापित करें फिर लाल वस्त्र से ढककर उपरोक्त नक्षत्रों के मंत्र से पूजा-अर्चना करें फिर उसी मंत्र से 108बार घी और समिधा से आहुति दें तथा कलश के जल से पिता, पुत्र और सहोदर का अभिषेक करें। ब्राह्मण भोजन कराएं और दक्षिणा दें इससे उस नक्षत्र की शांति होती है।
संक्रांति जन्म दोष :
ग्रहों की संक्रांतियों के नाम घोरा, ध्वांक्षी, महोदरी, मन्दा, मन्दाकिनी, मिश्रा और राक्षसी इत्यादि हैं। सूर्य की संक्रांति मेंं जन्म लेने वाला दरिद्र हो जाता है इसलिए शांति करानी आवश्यक है।
उपाय : संक्रांति मेंं जन्म का अगर दोष हो तो नवग्रह का यज्ञ करना चाहिए। विधि-विधान के साथ अधिदेव और प्रत्यधिदेव देवता के साथ जिस ग्रह की संक्रांति हो उसकी प्रतिमा को स्थापित कर लें फिर ग्रहों की पूजा करके व हवन करके महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। तिल से हवन कर लेने के बाद माता-पिता का अभिषेक करें और यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराके, दान-दक्षिणा दें इससे संक्रांति जन्म दोष दूर होता है।
ग्रहण काल मेंं जन्म का दोष :
जिसका जन्म ग्रहणकाल मेंं होता है उसे व्याधि, कष्ट, दरिद्रता और मृत्यु का भय होता है। ग्रहण नक्षत्र के स्वामी तथा सूर्यग्रहण मेंं सूर्य की तथा चंद्रग्रहण मेंं चंद्रमा की मूर्ति बनाएं। सूर्य की प्रतिमा सोने की, चंद्रमा की प्रतिमा चांदी तथा राहु की प्रतिमा सीसे की बनाएं। इन ग्रहों के प्रिय विषयों का दान करना चाहिए फिर ग्रह के लिए निमित्त समिधा से हवन करें परंतु नक्षत्र स्वामी के लिए पीपल की समिधा का इस्तेमाल करें। कलश के जल से जातक का अभिषेक करें और ब्राह्मण को भोजन कराएं व दान-दक्षिणा दें। इससे ग्रहणकाल मेंं जन्म दोष दूर होता है।
प्रसव विकार दोष :
यदि निर्धारित समय से कुछ महीने पहले या कुछ महीने बाद प्रसव हो तो इस विकार से ग्राम या राष्ट्र राष्ट्र का अनिष्ट होता है। अंगहीन या बिना मस्तिष्क का या अधिक मस्तिष्क वाला जातक जन्म ले या अन्य जानवरों की आकृति वाला जातक जन्म ले तो यह विकार गाँव के लिए आपत्ति लाने वाला होता है। कुल मेंं भी पीड़ा आती है। पाराशर ऐसे प्रसव के लिए अत्यंत कठोर है और ना केवल ऐसी स्त्री बल्कि ऐसे जानवर को भी त्याग देने के लिए कहते हैं। इसके अतिरिक्त 15वें या 16वें वर्ष का गर्भ प्रसव भी अशुभ माना गया है और विनाश कारक होता है। इस विकार की भी शांति का प्रस्ताव किया गया है।
उपाय : ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र का पूजन, ग्रह यज्ञ, हवन, अभिषेक और ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए। इस प्रकार से शांति कराने से अनिष्ट से रक्षा होती है।
त्रीखल जन्म विकार :
तीन पुत्र के बाद कन्या का जन्म हो या तीन कन्या के बाद पुत्र का जन्म हो तो पितृ कुल या मातृ कुल मेंं अनिष्ट होता है।
उपाय : जन्म का अशौच बीतने के बाद किसी शुभ दिन किसी धान की ढेरी पर चार कलश की स्थापना करके ब्रह्मा, विष्णु, शंकर और इंद्र की पूजा करनी चाहिए। रूद्र सूक्त और शांति सूक्त का पाठ करना चाहिए फिर हवन करना चाहिए। इससे अनिष्ट शांत होता है।
गण्डान्त विकार :
पूर्णातिथि (5,10,15) के अंत की घड़ी, नंदा तिथि (1,6,11) के आदि मेंं दो घड़ी कुल मिलाकर चार तिथि को गण्डान्त कहा गया है। इसी प्रकार रेवती और अश्विनी की संधि पर, आश्लेषा और मघा की संधि पर और ज्येष्ठा और मूल की संधि पर चार घड़ी मिलाकर नक्षत्र गण्डान्त कहलाता है। इसी तरह से लग्न गण्डान्त होता है। मीन की आखिरी आधी घटी और मेष की प्रारंभिक आधी घटी, कर्क की आखिरी आधी घटी और सिंह की प्रारंभिक आधी घटी, वृश्चिक की आखिरी आधी घटी तथा धनु की प्रारंभिक आधी घटी लग्न गण्डान्त कहलाती है। इन गण्डान्तों मेंं ज्येष्ठा के अंत मेंं पांच घटी और मूल के आरंभ मेंं आठ घटी महाअशुभ माना गया है।
उपाय : गण्डान्त शांति के बाद ही पिता बालक का मुंह देखें। तिथि गण्डान्त मेंं बैल का दान, नक्षत्र गण्डान्त मेंं बछड़े वाली गाय का दान और लग्न गण्डान्त मेंं सोने का दान करना चाहिए। गण्डान्त के पूर्व भाग मेंं जन्म हो तो पिता के साथ बच्चो का अभिषेक करना चाहिए और यदि दूसरे भाग मेंं जन्म हो तो माता के साथ बालक का अभिषेक करना चाहिए। इन उपायों के अंतर्गत तिथि स्वामी, नक्षत्र स्वामी या लग्न स्वामी का स्वरूप बनाकर, कलश पर पूजा करें और फिर हवन करें व अभिषेक इत्यादि करें।
लगभग सभी गण्डान्तों मेंं गोदान को एक बहुत सशक्त उपाय माना गया है। ज्येष्ठा गण्ड शांति मेंं इन्द्र सूक्त और महामृत्युंजय का पाठ किया जाता है। मूल, ज्येष्ठा, आश्लेषा और मघा को अति कठिन मानते हुए तीन गायों का दान बताया गया है। रेवती और अश्विनी मेंं दो गायों का दान और अन्य गण्ड नक्षत्रों के दोष या किसी अन्य दुष्ट दोष मेंं एक गाय का दान बताया गया है।
ज्येष्ठा नक्षत्र की कन्या अपने पति के बड़े भाई का विनाश करती है और विशाखा के चौथे चरण मेंं उत्पन्न कन्या अपने देवर का नाश करती है। अत: इनके विवाह के समय तो अवश्य ही गोदान कराना चाहिए। आश्लेेषा के अंतिम तीन चरणों मेंं जन्म लेने वाली कन्या या पुत्र अपनी सास के लिए अनिष्टकारक होते हैं तथा मूल के प्रथम तीन चरणों मेंं जन्म लेने वाले जातक अपने ससुर को नष्ट करने वाले होते हैं अत: इनकी शांति अवश्य करानी चाहिए। अगर पति से बड़ा भाई ना हो तो यह दोष नहीं लगता है।
पाराशर अतिरिक्त लगभग सभी होरा ग्रंथ शास्त्रकारों ने ग्रहों की शाति को विशेष महत्व दिया है। फलदीपिका के रचनाकार मंत्रेश्वर जी ने एक स्थान पर लिखा है कि -
दशापहाराष्टक वर्गगोचरे, ग्रहेषु नृणां विषमस्थितेष्वपि।
जपेच्चा तत्प्रीतिकरै: सुकर्मभि:, करोति शान्तिं व्रतदानवन्दनै:।।
जब कोई ग्रह अशुभ गोचर करे या अनिष्ट ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा हो तो उस ग्रह को प्रसन्न करने के लिए व्रत, दान, वन्दना, जप, शांति आदि द्वारा उसके अशुभ फल का निवारण करना चाहिए।



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