Monday, 1 June 2015

घर का सुख और ज्योतिष विश्लेषण

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घर का सुख देखने के लिए मुख्यत: चतुर्थ स्थान को देखा जाता है। फिर गुरु, शुक्रऔर चंद्र के बलाबल का विचार प्रमुखता से किया जाता है। जब-जब मूल राशि स्वामी या चंद्रमा से गुरु, शुक्र या चतुर्थ स्थान के स्वामी का शुभ योग होता है, तब घर खरीदने, नवनिर्माण या मूल्यवान घरेलू वस्तुएँ खरीदने का योग बनता है। व्यक्ति के जीवन पुरुषार्थ, पराक्रम एवं अस्तित्व की पहचान उसका निजी मकान है। महंगाई और आबादी के अनुरूप हर व्यक्ति को मकान मिले यह संभव नहीं है। आधी से ज्यादा दुनिया किराये के मकानों मेंं रहती है। कुछ किरायेदार, जबरदस्ती मकान मालिक बने बैठे हैं। कुछ लोगों को मकान हर दृष्टि से फलदायी है। कोई टूटे-फूटे मकानों मेंं रहता है तो कोई आलिशान बंगले का स्वामी है। सुख-दुख जीवन के अनेक पहलुओं पर मकान एक परमावश्यकता बन गई है।
जन्मपत्री मेंं भूमि का कारक ग्रह मंगल है। जन्मपत्री का चौथा भाव भूमि व मकान से संबंधित है। चतुर्थेश उच्च का, मूलत्रिकोण, स्वग्रही, उच्चाभिलाषी, मित्रक्षेत्री शुभ ग्रहों से युत हो या शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो अवश्य ही मकान सुख मिलेगा।
साथ ही मंगल की स्थिति का सुदृढ़ होना भी आवश्यक है। मकान सुख के लिये मंगल और चतुर्थ भाव का ही अध्ययन पर्याप्त नहीं है। भवन सुख के लिये लग्न व लग्नेश का बल होना भी अनिवार्य है। इसके साथ ही दशमेंश, नवमेंश और लाभेश का सहयोग होना भी जरूरी है।
1. स्वअर्जित भवन सुख (परिवर्तन से):
निष्पत्ति- लग्नेश चतुर्थ स्थान मेंं हो चतुर्थेश लग्न मेंं हो तो यह योग बनता है।
परिणाम- इस योग मेंं जन्म लेने वाला जातक पराक्रम व पुरुषार्थ से स्वयं का मकान बनाता है।
2. उत्तम ग्रह योग:
निष्पत्ति- चतुर्थेश किसी शुभ ग्रह के साथ युति करे, केंद्र-त्रिकोण (1,4,7,9,10) मेंं हो तो यह योग बनता है।
परिणाम- ऐसे व्यक्ति को अपनी मेहनत से कमाये रुपये का मकान प्राप्त होता है। मकान से सभी प्रकार की सुख सुविधायें होती है।
3. अकस्मात घर प्राप्ति योग:
निष्पत्ति- चतुर्थेश और लग्नेश दोनों चतुर्थ भाव मेंं हो तो यह योग बनता है।
परिणाम- अचानक घर की प्राप्ति होती है। यह घर दूसरों का बनाया होता है।
4. एक से अधिक मकानों का योग:
निष्पत्ति- चतुर्थ स्थान पर चतुर्थेश दोनों चर राशियों मेंं (1,4,7,10) हो। चतुर्थ भाव के स्वामी पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो एक से अधिक मकान प्राप्ति के योग बनते हैं।
परिणाम- ऐसे व्यक्ति के अलग-अलग जगहों पर मकान होते हैं। वह मकान बदलता रहता है।
5 वाहन, मकान व नौकर सुख योग (परिवर्तन से):
निष्पत्ति- नवमेंश, दूसरे भाव मेंं और द्वितीयेश नवम भाव मेंं परस्पर स्थान परिवर्तन करें तो यह योग बनता है।
परिणाम- इस योग मेंं जन्मेंं जातक का भाग्योदय 12वें वर्ष मेंं होता है। 32वें वर्ष के बाद जातक को वाहन, मकान और नौकर-चाकर का सुख मिलता है।
6. बड़े बंगले का योग:
निष्पत्ति- चतुर्थ भाव मेंं यदि चंद्र और शुक्र हो अथवा चतुर्थ भाव मेंं कोई उच्च राशिगत ग्रह हो तो यह योग बनता है।
परिणाम- ऐसा जातक बड़े बंगले व महलों का स्वामी होता है। घर के बाहर बगीचा जलाशय एवं सुंदर कलात्मक ढंग से भवन बना होता है।
7. बिना प्रयत्न प्राप्ति योग:
निष्पत्ति- लग्नेश व सप्तमेंश लग्न मेंं हो तथा चतुर्थ भाव पर गुरु, शुक्र या चंद्रमा का प्रभाव हो।
परिणाम- ऐसा जातक बड़े बंगले व महलों का स्वामी होता है। घर के बाहर बगीचा, जलाशय एवं सुंदर कलात्मक ढंग से भवन बना होता है।
8. बिना प्रयत्न ग्रह प्राप्ति का दूसरा योग:
निष्पत्ति- चतुर्थ भाव का स्वामी उच्च, मूल त्रिकोण या स्वग्रही हो तथा नवमेंश केंद्र मेंं हो तो ये योग बनता है।
परिणाम- ऐसे जातक को बिना प्रयत्न के घर मिल जाता है।
9. ग्रहनाश योग:
निष्पत्ति- चतुर्थेश के नवमांश का स्वामी 12वें चला गया हो तो, यह दोष बनता है।
परिणाम- ऐसे जातक को अपनी स्वयं की संपत्ति व घर से वंचित होना पड़ता है।
10. उत्तम कोठी योग:
निष्पत्ति- चतुर्थेश और दशमेंश एक साथ केंद्र त्रिकोण मेंं हो तो उत्तम व श्रेष्ठ घर प्राप्त होता है।
परिणाम- कोठी, बड़ा मकान व संपत्ति प्राप्ति होती है।
घर सुख संबंधी मुख्य ज्योतिषीय सिद्धांत:
1. चतुर्थ स्थान मेंं शुभ ग्रह हों तो घर का सुख उत्तम रहता है।
2. चंद्रमा से चतुर्थ मेंं शुभ ग्रह होने पर घर संबंधी शुभ फल मिलते हैं।
3. चतुर्थ स्थान पर गुरु-शुक्र की दृष्टि उच्च कोटि का गृह सुख देती है।
4. चतुर्थ स्थान का स्वामी 6, 8, 12 स्थान मेंं हो तो गृह निर्माण मेंं बाधाएँ आती हैं। उसी तरह 6, 8, 12 भावों मेंं स्वामी चतुर्थ स्थान मेंं हो तो गृह सुख बाधित हो जाता है।
5. चतुर्थ स्थान का मंगल घर मेंं आग से दुर्घटना का संकेत देता है। अशांति रहती है।
6. चतुर्थ मेंं शनि हो, शनि की राशि हो या दृष्टि हो तो घर मेंं सीलन, बीमारी व अशांति रहती है।
7. चतुर्थ स्थान का केतु घर मेंं उदासीनता देता है।
8. चतुर्थ स्थान का राहु मानसिक अशांति, पीड़ा, चोरी आदि का डर देता है।
9. चतुर्थ स्थान का अधिपति यदि राहु से अशुभ योग करे तो घर खरीदते समय या बेचते समय धोखा होने के संकेत मिलते हैं।
10. चतुर्थ स्थान का पापग्रहों से योग घर मेंं दुर्घटना, विस्फोट आदि के योग बनाता है।
11. चतुर्थ स्थान का अधिपति 1, 4, 9 या 10 मेंं होने पर गृह-सौख्य उच्च कोटि का मिलता है।
उपरोक्त संकेतों के आधार पर कुंडली का विवेचन कर घर खरीदने या निर्माण करने की शुरुआत की जाए तो लाभ हो सकता है। इसी तरह पति, पत्नी या घर के जिस सदस्य की कुंडली मेंं गृह-सौख्य के शुभ योग हों, उसके नाम से घर खरीदकर भी कई परेशानियों से बचा जा सकता है।
गुरु का योग घर बनाने वाले कारकों से होता है तो रहने के लिये घर बनता है । शनि का योग जब घर बनाने वाले कारकों से होता है तो कार्य करने के लिये घर बनने का योग होता है जिसे व्यवसायिक स्थान भी कहा जाता है। बुध किराये के लिये बनाये जाने वाले घरों के लिये अपनी सूची बनाता है तो मंगल कारखाने और डाक्टरी स्थान आदि बनाने के लिये अपनी अपनी तरह से बल देता है। लेकिन घर बनाने के लिये मुख्य कारक शुक्र का अपना बल देना भी मुख्य है।
वर्षफल के हिसाब से शुक्र जब राहु, केतु के सम्बन्ध से अछूता हो और शुभ ग्रहों के साथ बैठा हो तो मकान ही मकान बनवायेगा लेकिन जब केवल राहु, केतु के साथ हो तो मकान बनने से बर्बाद होगा और हानि देगा। पुष्य नक्षत्र से शुरू कर इसी नक्षत्र मेंं पूर्ण किया मकान अति उत्तम होता है तथा पूर्ण होने पर मकान की प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
शुभ लग्न मेंं शुरू किये मकान के लिए निम्न सावधानियां जरूरी हैं:
कोने: जमीन के टुकड़ों को एक गिन उस के कोने देखें। चार कोने वाला (90 डिग्री) का मकान सर्वोत्त्म है, आठ कोनो वाला मातमी या बीमारी देने वाला, अठारह कोनों वाला हो तो सोना, चांदी देने वाला होता है। तीन या तेरह कोनों वाला हो तो भाई बन्धुओं को मौतें, आग, फांसी देने वाला होता है। पांच कोनों वाला हो तो सन्तान का दुख व बरबादी, मध्य से बाहर या मछली की पेट की तरह उठा हुआ मकान हो तो खानदान घटेगा यानी दादा तीन, बाप दो, स्वयं अकेला और नि:सन्तान होता है।
दीवारें: कोने देखने के बाद, मकान बनाने के पहले दीवारों का क्षेत्रफल और नींव छोड़कर हरेक हिस्सा या कमरे का अंदरूनी क्षेत्रफल अलग-अलग देखा जाए तो जातक (मालिक मकान) के अपने हाथों का क्षेत्रफल भी देखा जाए। उस का हाथ चाहे 18,19 या 17 इंच का हो पैमाना उस के हाथ की लम्बाई का हो।
मुख्य द्वार: 1 पूर्व मेंं उत्तम, नेक व्यक्ति आए जाए, सुख हो। 2 पश्चिम मेंं दूसरे दर्जे का उत्तम। 3 उत्तर मेंं नेक, लम्बे सफर, पूजा पाठ नेक कार्य के लिए आने जाने का रास्ता जो परलोक सुधारे। 4 दक्षिण मेंं हानिकारक, मौत की जगह।
निम्न सावधानियां रखें नया मकान बनवाते समय:
हमारे ग्रंथ पुराणों आदि मेंं वास्तु एवं ज्योतिष से संबंधित गूढ़ रहस्यों तथा उसके सदुपयोग सम्बंधी ज्ञान का अथाह समुद्र व्याप्त है जिसके सिद्धान्तों पर चलकर मनुष्य अपने जीवन को सुखी, समृद्ध, शक्तिशाली और निरोगी बना सकता है।
सुखी परिवार अभियान मेंं वास्तु एक स्वतंत्र इकाई के रूप मेंं गठित की गयी है और उस पर श्रेष्ठ वातावरण और परिणाम के लिए वास्तु के अनुसार जीवनशैली और ग्रह का निर्माण अति आवश्यक है। इस विद्या मेंं विविधताओं के बावजूद वास्तु सम्यक उस भवन को बना सकते हैं, जिसमेंं कि कोई व्यक्ति पहले से निवास करता चला आ रहा है। वास्तु ज्ञान वस्तुत: भूमि व दिशाओं का ज्ञान है।
कब प्रारंभ करें मकान बनवाना ?
शुक्ल पक्ष मेंं करें गृह निर्माण: वास्तुशास्त्र मेंं प्राचीन मनीषियों ने सूर्य के विविध राशियों पर भ्रमण के आधार पर उस माह मेंं घर निर्माण प्रारंभ करने के फलों की विवेचना की है।
1. मेष राशि मेंं सूर्य होने पर घर बनाना प्रारंभ करना अति लाभदायक होता है।
2. वृषभ राशि मेंं सूर्य संपत्ति बढऩा, आर्थिक लाभ
3. मिथुन राशि मेंं सूर्य गृह स्वामी को कष्ट
4. कर्क राशि मेंं सूर्य धन-धान्य मेंं वृद्धि
5. सिंह राशि का सूर्य यश, सेवकों का सुख
6. कन्या राशि का सूर्य रोग, बीमारी आना
7. तुला राशि का सूर्य सौख्य, सुखदायक
8. वृश्चिक राशि का सूर्य धन लाभ
9. धनु राशि का सूर्य हानि, विनाश
10. मकर राशि का सूर्य धन, संपत्ति वृद्धि
11. कुंभ राशि का सूर्य रत्न, धातु लाभ
12. मीन राशि का सूर्य चौतरफा नुकसान
घर बनाने का प्रारंभ हमेशा शुक्ल पक्ष मेंं करना चाहिए। फाल्गुन, वैशाख, माघ, श्रवण और कार्तिक माहों मेंं शुरू किया गया गृह निर्माण उत्तम फल देता है।
वर्जित: मंगलवार व रविवार, प्रतिपदा, चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या तिथियाँ, ज्येष्ठा, रेवती, मूल नक्षत्र, वज्र, व्याघात, शूल, व्यतिपात, गंड, विषकुंभ, परिध, अतिगंड, योग - इनमेंं घर का निर्माण या कोई जीर्णोद्धार भूलकर भी नहीं करना चाहिए अन्यथा घर फलदायक नहीं होता।
अति शुभ योग: शनिवार, स्वाति नक्षत्र, सिंह लग्न, शुक्ल पक्ष, सप्तमी तिथि, शुभ योग और श्रावण मास ये सभी यदि एक ही दिन उपलब्ध हो सके, तो ऐसा घर दैवी आनंद व सुखों की अनुभूति कराने वाला होता है।
घर किस नगर, मोहल्ले मेंं बनवाना शुभ है। इस हेतु तीन विधियों से विचार करने का मत हमारे प्राचीन वास्तुशास्त्रियों ने दिये हैं-
नक्षत्र विधि: सर्वप्रथम अपने जन्म नक्षत्र का ज्ञान करें जो कि जन्मकुंडली से जाना जा सकता है और यदि जन्मकुंडली न हो तो जो प्रचलित नाम हो उसके प्रथम अक्षर से ज्ञात कर लें। इसी प्रकार जिस नगर, ग्राम, मोहल्ले मेंं घर बनवाना हो उसका भी नक्षत्र नाम के प्रथम अक्षर के अनुसार जान लें। अब ग्राम, नगर, मोहल्ले की नक्षत्र संख्या से अपने जन्म नक्षत्र की संख्या तक गिनें और फल इस प्रकार जानें यदि- संख्या फल 1 से 5 लाभदायक, 6से 8धन हानि, 9 से 13 समृद्धि धन लाभ, यश, 14 से 19 पत्नीकष्ट, हानि, विवाह सुख का अभाव 20 अंग भंग 21 से 24 सुखदायक, संपति से बढ़ोश्ररी 25 कष्टकारक तथा भयकारक 26कष्टकारी, शोककारी 27 ग्राम, नगर, मोहल्ले वालों से बैर इसमेंं अभिजित को संज्ञान मेंं लिया गया है। उदाहरण- माना कि आपका नाम मनमोहन सिंह तथा आप दिल्ली मेंं घर बनवाना चाहते हैं तो उपरोक्त विधि से विचार करने पर दिल्ली का नक्षत्र है पूर्वाभाद्रपद जिसकी नक्षत्र संख्या 25 है तथा नाम नक्षत्र मघा की नक्षत्र संख्या 10 है नगर नक्षत्र से नाम नक्षत्र तक गणना करने पर 13 अंक आ रहा है विवरण अनुसार यह अंक आपके लिए समृद्धि, धन लाभ एवं लाभ कारक है। अर्थात शुभ है।
वर्ग विचार विधि: इस विधि मेंं अपना तथा ग्राम, नगर, मोहल्ले का नाम लेने का विधान है। इस विधि मेंं यह विचारा जाता है कि अपना नाम एवं ग्राम, नगर, मोहल्ले का नाम किस वर्ग मेंं है। किस अक्षर का किस अक्षर तक क्या वर्ग है उसका विवरण इस प्रकार है- अक्षर वर्ग अ से अं तक अ वर्ग में जिसका स्वामी गरुण। क से ड. तक क वर्ग में जिसका स्वामी बिल्ली। च से ञ तक च वर्ग जिसका स्वामी सिंह। ट से ण तक ट वर्ग जिसका स्वामी श्वान। त से न तक त वर्ग का स्वामी सांप। प से म तक प वर्ग का स्वामी चूहा। य से व तक य वर्ग जिसका स्वामी हिरन। श से ह तक श वर्ग का स्वामी बकरी। अपने नाम की वर्ग संख्या को दो से गुणा कर उसमेंं नगर, ग्राम, मोहल्ले आदि वर्ग संख्या जोड़ दें फिर इसमेंं आठ का भाग दें।
अब नगर, ग्राम, मोहल्ले की वर्ग संख्या को दूना करके उसमेंं अपने वर्ग की संख्या जोड़ दें। अब यदि ग्राम, नगर, मोहल्ले की संख्या कम और नाम अधिक है तो यह ग्राम, नगर, मोहल्ला आपके 4, 8, 12 होने पर स्वास्थ्य की दृष्टि से शुभ नहीं है। घर किस ग्राम/नगर/मोहल्ले मेंं बनवाना है निश्चित हो जाने के बाद प्रश्न यह उठता है कि घर स्थान के किस भाग मेंं बनवाया जाये। राशि के अनुसार वृष, मकर, सिंह, मिथुन राशि के जातकों को बीच मेंं, वृश्चिक राशि वालों को पूर्व मेंं, मीन वाले को पश्चिम मेंं, तुला वालों को वायव्य मेंं, उत्तर दिशा मेंं मेष वालों को तथा कुंभ वालों को ईशान दिशा मेंं घर बनवाना चाहिए।


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जानिये आज के सवाल जवाब 1 01/06/2015 प्रख्यात Pt.P.S tripathi (पं.पी एस त्रिपाठी) से



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आपकी कुंडली में सरकारी नौकरी के योग

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सरकारी नौकरी प्राप्ति के योग या बाधा दूर करने के उपाय:-
सभी की चाह होती है कि उच्च पद तथा सम्मान अपने जीवन में प्राप्त करें। साथ ही यह चाह भी कि जीवन में स्थिरता बनी रहे। इस का एक तरीका सरकारी नौकरी प्राप्त करना भी है। किंतु कई बार देखा जाता है कोई व्यक्ति बहुत प्रयास के बाद भी सफल नहीं हो पाता है वहीं किसी को एक बार में अच्छी सफलता प्राप्त हो जाती है। इसका कारण अथक मेहनत के साथ जन्मपत्री में ग्रह योग भी होते हैं। यदि ग्रह योग राजकीय पद पर कार्य करने का है तो थोड़े से प्रयास से भी अच्छा पद प्राप्त हो सकता है किंतु इसके लिए व्यक्ति की ग्रह दषाओं के साथ दषा एवं अंतरदषा भी प्रभाव डालती है। प्रत्येक जातक अपने ग्रह स्थिति हेतु कुंडली में सूर्य, गुरू, मंगल, चंद्रमा तथा राहु की स्थिति का विष्लेषण तथा प्रयास के दौरान ग्रह दषाओं के साथ दषा तथा अंतरदषा का मूल्यांकन कर अपनी सफलता का आकलन कर सकता है। यदि किसी जातक की ग्रह स्थिति अनुकूल हो तो दषा के प्रतिकूल होने पर आवष्यक उपाय द्वारा भी सफलता प्राप्ति का रास्ता खोल सकता है। प्रतियोगिता परीक्षा में निष्चित सफलता प्राप्ति तथा मन की एकाग्रता में वृद्धि हेतु पूर्व दिषा में मुख कर नित्य अष्म स्तोत्र का पाठ का पाठ करना चाहिए।
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कालसर्प योग अवरोध और दुर्भाग्य का कारण

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विभिन्न शास्त्रों में कालसर्प योग के बारे में विभिन्न धारणाएँ प्रस्तुत हैं, जिसमें सभी में एक मत है कि राहु एवं केतु के बीच यदि सभी ग्रह फंसे हुए हों तो कालसर्प योग निर्मित होता है। सर्प योनी के बारे में अनेक वर्णन मिलते है हमारे धर्म शास्त्रों में, गीता में स्वयं भगवान् श्री कृष्ण ने कहा है की पृथ्वी पर केवल विषय-वासना के कारण जीव की उत्पत्ति होती है. जीव रुपी मनुष्य जैसा कर्म करता है उसी के अनुरूप फल मिलता है. विषय-वासना के कारण ही काम-क्रोध, मद-लोभ और अहंकार का जन्म होता है इन विकारों को भोगने के कारण ही जीव को सर्प योनी प्राप्त होती है. कर्मों के फलस्वरूप आने वाली पीढिय़ों पर पडऩे वाले अशुभ प्रभाव को काल सर्प दोष कहा जाता है।
कुंडली में जब सारे ग्रह राहू और केतु के बीच में आ जाते है तब कालसर्प योग बनता है। यदि राहु आगे या केतु पीछे या सूर्यादि सातों ग्रह, राहु एवं केतु के एक ओर फंसे हुए हों तो कालसर्प योग बनता है। कालसर्प योग को दुर्भाग्य और अवरोध को उत्पन्न करने वाला माना जाना अनुचित नहीं है। यदि किसी जन्मांग में कालसर्प योग की संरचना हो रही हो तो व्यक्ति को अनेक प्रकार के अवरोध, विसंगतियों और दुर्भाग्य से जीवनपर्यंत संघर्ष करना पड़ता है। ज्योतिष में इस योग को अशुभ माना गया है लेकिन कभी कभी यह योग शुभ फल भी देता है, ज्योतिष में राहू को काल तथा केतु को सर्प माना गया है। राहू को सर्प का मुख तथा केतु को सर्प का पूंछ कहा गया है वैदिक ज्योतिष में राहू और केतु को छाया ग्रह संज्ञा दी गई है, राहू का जन्म भरणी नक्षत्र में तथा केतु का जन्म अश्लेषा में हुआ है जिसके देवता काल एवं सूर्य है. राहू को शनि का रूप और केतु को मंगल ग्रह का रूप कहा गया है, राहु मिथुन राशि में उच्च तथा धनु राशि में नीच होता है, राहु के नक्षत्र आद्र्रा स्वाति और शतभिषा है, राहु प्रथम द्वितीय चतुर्थ पंचम सप्तम अष्टम नवम द्वादस भावों में किसी भी राशि का विशेषकर नीच का बैठा हो, तो निश्चित ही आर्थिक मानसिक भौतिक पीडायें अपनी महादशा अन्तरदशा में देता है मनुष्य को अपने पूर्व दुष्कर्मो के फलस्वरूप यह दोष लगता है जैसे सर्प को मारना या मरवाना, भ्रुण हत्या करना या करवाने वाले को, अकाल मृत्यु (किसी बीमारी या दुर्घटना में होने करण) उसके जन्म जन्मान्तर के पापकर्म के अनुसार ही यह दोष पीढ़ी दर पीढ़ी चला आता है, मनुष्य को इसका आभास भी होता है —जैसे जन्म के समय सूर्य ग्रहण, चंद्रग्रहण जैसे दोषों के होने से जो प्रभाव जातक पर होता है, वही प्रभाव काल सर्प योग होने पर होता है यह योग जातक को अनेक प्रकार की परेशानियों में ला खड़ा करता है, जातक के लक्षण/ फल/प्रभाव परिलक्षित/दृष्टव्य होते हैं - अकल्पित, असामयिक घटना दुर्घटना का होना, जन-धन की हानि होना। परिवार में अकारण लड़ाई-झगड़ा बना रहना। पति तथा पत्नी वंश वृद्धि हेतु सक्षम न हों। आमदनी के स्रोत ठीक-ठाक होने तथा शिक्षित एवम् सुंदर होने के बावजूद विवाह का न हो पाना। बारंबार गर्भ की हानि (गर्भपात) होना। बच्चों की बीमारी लगातार बना रहना, नियत समय के पूर्व बच्चों का होना, बच्चों का जन्म होने के तीन वर्ष की अवधि के अंदर ही काल के गाल में समा जाना। धन का अपव्यय होना। जातक व अन्य परिवार जनों को अकारण क्रोध का बढ़ जाना, चिड़चिड़ापन होना। परीक्षा में पूरी तैयारी करने के बावजूद भी असफल रहना, या परीक्षा-हाल में याद किए गए प्रश्नों के उत्तर भूल जाना, दिमाग शून्यवत हो जाना, शिक्षा पूर्ण न कर पाना। ऐसा प्रतीत होना कि सफलता व उन्नति के मार्ग अवरूद्ध हो गए हैं। जातक व उसके परिवार जनों का कुछ न कुछ अंतराल पर रोग ग्रस्त रहना, सोते समय बुरे स्वप्न देख कर चौक जाना या सपने में सर्प दिखाई देना या स्वप्न में परिवार के मरे हुए लोग आते हैं. किसी एक कार्य में मन का न लगना, शारीरिक, आर्थिक व मानसिक रूप से परेशान तो होता ही है, इन्सान नाना प्रकार के विघ्नों से घिरा होता है प्राय: इसी योग वाले जातको के साथ समाज में अपमान, परिजनों से विरोध, मुकदमेबाजी आदि कालसर्प योग से पीडि़त होने के लक्षण हैं.
काल सर्प योग के 12 प्रकार के होते है -
(1) अनंत काल सर्प योग,
(2)कुलिक काल सर्प योग,
(3) वासुकी काल सर्प योग,
(4) शंखपाल काल सर्प योग,
(5)पदम् काल सर्प योग,
(6) महापद्म काल सर्प योग,
(7) तक्षक काल सर्प योग,
(8) कर्कोटक काल सर्प योग,
(9) शंख्चूर्ण काल सर्प योग,
(10) पातक काल सर्प योग,
(11) विषाक्त काल सर्प योग,
(12) शेषनाग काल सर्प योग,

काल सर्प योग शुभ फल भी प्रदान करता है:
कुंडल महत्वपूर्ण योग, शुक्र, शनि, मंगल, चंद्रमा या उन लोगों के साथ इस ग्रह पर एक उच्च जगह पर किसी भी कालसर्प योग को कमजोर करने के उसके स्थान के अनुबंध कालसर्प गुरु या योग केंद्र में उच्च के उल्लंघन में है। उच्च बुध और सूर्य कमजोर कालसर्प योग योग है budhaditya है। एक उच्च जगह या स्थापित करने मंगल ग्रह में चंद्रमा योग केंद्र की भलाई से बनता है कालसर्प योग को भंग कर दिया है। 25 साल की उम्र के हर जातक रहने और केतु के कब्जे में हैं। (18 राहु केतु था mahadasa mahadasa की +7 साल = दो 25 साल की राशि)। ज्योतिष के मुख्य स्रोतों में से एक है कि 3, 6, 11 और पाप ग्रहों की उपस्थिति में मिश्रण उपयोगी आशीर्वाद दिया जाता है। आम तौर पर 3, 6, 11, सातवीं दर में राहु शुभ माना जाता है।

कालसर्प योग की शांति के वैदिक उपाय:
अगर आप की कुंडली में पितृदोष या काल सर्प दोष है तो आप किसी विद्वान पंडित से इसका उपाय जरुर कराएं। कालसर्प की शांति विधि-विधान से होता है। नदी का पवित्र स्थान हो, इस विधि का संपूर्ण ज्ञान हो इसके आलावा शिव संबंधी तीर्थं हो समय में अमावश्या या पंचमी के दिन काल सर्प दोष की शांति करनी चाहिए. कालसर्प की शमन विधान हेतु किसी विद्धान आचार्य द्वारा कालसर्प से होने वाली हानि का क्षेत्र जानकर उस से संबंधित विधान विधिपूर्वक किया जाना जिसमें विषेषकर रूद्राभिषेक, नागबलि-नारायण बलि आदि का विधान एवं राहु से संबंधित दान एवं मंत्रों के उपचार द्वारा दोष को निर्मूल किया जा सकता है।
कालसर्प योग का प्राभव:
जेसे किसी व्यक्ति को साप काट ले तो वह व्यक्ति शांति से नही बेठ सकता वेसे ही कालसर्प योग से पीड़ित व्यक्ति जीवन पर्यन्त शारीरिक, मानसिक, आर्थिक परेशानी का सामना करना पडता है। विवाह विलम्ब से होता है एवं विवाह के पश्च्यात संतान से संबंधी कष्ट जेसे उसे संतान होती ही नहीं या होती है तो रोग ग्रस्त होती है। उसकी रोजी-रोटी का जुगाड़ भी बड़ी मुश्किल से हो पाता है। अगर जुगाड़ होजाये तो लम्बे समय तक टिकती नही है। बार-बार व्यवसाय या नौकरी मे बदलाव आते रेहते है। धनाढय घर में पैदा होने के बावजूद किसी न किसी वजह से उसे अप्रत्याशित रूप से आर्थिक क्षति होती रहती है। तरह तरह की परेशानी से घिरे रहते हैं। एक समस्या खतम होते ही दूसरी पाव पसारे खडी होजाती है। योग से व्यक्ति को चैन नही मिलता उसके कार्य बनते ही नही और बन भी तो जाये आधे मे रुक जाते है। 99त्न हो चुका कर्य भी आखरी पलो मे अकस्मात ही रुक जाता है।

Pt.PS त्रिपाठी
लैंडलाइन कोई 0771-4050500




मध्यमा उंगली से जाने व्यक्तित्व



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हस्त रेखा में मध्यमा उंगली
जानिए अपने व्यक्तित्व के बारे में ................
इस उंगली को शनि की उंगली भी कहा जाता है तथा यह व्यक्ति की सचाई, ईमानदारी एवं अनुशासन को दर्शाती है। यदि यह उंगली सामान्य लंबाई की होती है यानि अन्य उंगलियों से लंबी परंतु बहुत अधिक लंबी नहीं तो व्यक्ति जिम्मेदार एवं गंभीर व्यक्तित्व का धनी होता है एवं महत्वाकांक्षी होता है। यदि यह उंगली सामान्य से अधिक लंबी हो तो वह व्यक्ति अकेले में रहना पसंद करता है। तथा वह व्यक्ति किसी गलत कार्य मे भी फंस सकता है। जिस व्यक्ति कि मध्यमा उंगली छोटी होती है वह व्यक्ति लापरवाह एवं आलसी होता है।
यदि शनि की उंगली का प्रथम खंड लंबा हो तो व्यक्ति का झुकाव धार्मिक ग्रंथ और रहस्यवादी कला के अध्ययन की ओर होता है। यदि मध्यमा का द्वितीय खंड लंबा हो तो व्यक्ति का व्यवसाय संपत्ति संबंधी, रसायन, जीवाश्म ईंधन या लोहा मशीनरी से संबंधित होता है, जब तीसरा खंड लंबा हो तो दर्शाता है कि व्यक्ति चालाक, स्वार्थी और दुराचार में युक्त रहता है।
शनि पर्वत मध्यमा उंगली से नीचे होता है। शनि पर्वत दार्शनिक विचारों को दर्शाता है। शनि पर्वत पूर्ण विकसित होने पर व्यक्ति ज्ञानी, गंभीर एवं विचार शील होता है। वह सोच-विचार कर कुछ कार्य आरंभ करता है एवं उसकी इंद्रियां उसके नियंत्रण में रहतीं हैं।

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मूलांक 4 की कुछ खास विशेषताएं


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मूलांक 4 का स्वामी ग्रह राहु है। कुछ अंकशास्त्री इसे यूरेनस या नकारात्मक सूर्य का अंक भी मानते हैं ये साहसी व्यवहार कुशल और चकित कर देने वाले कामों को करने में भी निपुण होते हैं।मूलांक ४ वाले महान क्रांतिकारी, वैज्ञानिक या राजनीतिज्ञ हो सकते है .लेकिन इस अंक वालों को घमंडी, उपद्रवी, अहंकारी और हठी के रूप में भी देखा गया है।
मूलांक ४ एक पेचीदा अंक है इससे सम्बंधित लोग सीधी बात नहीं करते वे लीक से हटकर चलते है टेटे-मेटे रास्तो से गुजरना इनकी फितरत होती है |अंक ४ वाले व्यक्ति प्रत्येक वस्तु या स्थिति को एक अलग दृष्टिकोण से देखते है और इसलिए उनका स्वभाव अपने आप में अन्य व्यक्तियों से अलग एवं विशिष्ट होता है वे समाज एवं सरकार के परम्परागत नियमों के विरुद्ध चलते है तथा उनमे सुधार का दृष्टिकोण अपनाकर समाज को एक नयी दिशा देना चाहते है
मूलांक ४ वाले घर बाहर समाज और राजनीति हर प्रकार की जानकारी रखते हैं। ये मनमौजी होते है यदि इन पर कुसंगति का प्रभाव पड़ जाता है तो धीरे-धीरे दूर होता है। आमतौर पर ये समय के पाबंद होते हैं। इन्हें कई बार संघर्ष करते हुए भी देखा जाता है।
यदि विवाह या प्रेम संबंधों की बात की जाय तो ये बडे से लेकर छोटे और अमीर से लेकर गरीब लोगों से घुल मिल जाते हैं। स्त्रियों की ओर इनका विशेष झुकाव होता है लेकिन इनके प्रेम संबंध अधिक समय तक नहीं चलते।
हम मूलांक ४ के कुछ लोगों को देखते है ---
किशोर कुमार
:४ ८ 1929
लीक से हटकर चले है किशोर कुमार ,जिनका मूलांक ४ है .इनके जीवन के उतर चढाव से तो सभी वाकिफ है
प्रेमचंद
31 ७ 1880
३१ = ३+१ =४
साहित्य को नयी दिशा देने वाले मुंशी प्रेमचंद को कौन नहीं जनता .
इस प्रकार मूलांक ४ के जातक कुशाग्र बुद्धि वाले, साहसी होते हैं। ऐसे व्यक्ति को जीवन में अनेक परिवर्तनों का सामना करना पड़ता है। जैसे तेज स्पीड से आती गाड़ी को अचानक ब्रेक लग जाए ऐसा उनका भाग्य होगा। लेकिन यह भी निश्चित है कि इस अंक वाले अधिकांश लोग कुलदीपक होते हैं। आपका जीवन संघर्षशील होता है। इनमें अभिमान भी होता है। ये लोग दिल के कोमल होते हैं किन्तु बाहर से कठोर दिखाई पड़ते हैं।

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जानिये आज का राशिफल 01/06/2015 प्रख्यात Pt.P.S tripathi (पं.पी एस त्रिपाठी) से



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आत्मविश्वास की कमी ज्योतिषीय कारण

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आत्मविश्वास वस्तुत: एक मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्ति है। आत्मविश्वास से ही विचारों की स्वाधीनता प्राप्त होती है और इसके कारण ही महान कार्यों में सरलता और सफलता मिलती है। इसी के द्वारा आत्मरक्षा होती है। जो व्यक्ति आत्मविश्वास से ओत-प्रोत है, उसे अपने भविष्य के प्रति किसी प्रकार की चिन्ता नहींं सताती। दूसरे व्यक्ति जिन सन्देहों और शंकाओं से दबे रहते हैं, वह उनसे सदैव मुक्त रहता है। यह प्राणी की आंतरिक भावना है। इसके बिना जीवन में सफल होना अनिश्चित है। आत्मविश्वास वह अद्भुत शक्ति है जिसके बल पर एक अकेला मनुष्य हजारों विपत्तियों एवं शत्रुओं का सामना कर लेता है। निर्धन व्यक्तियों की सबसे बड़ी पूंजी और सबसे बड़ा मित्र आत्मविश्वास ही है। इस संसार में जितने भी महान कार्य हुए हैं या हो रहे हैं, उन सबका मूल तत्व आत्मविश्वास ही है। संसार में जितने भी सफल व्यक्ति हुए हैं, यदि हम उनका जीवन इतिहास पढ़ें तो पाएंगे कि इन सभी में एक समानता थी और वह समानता थी- आत्मविश्वास की।
जब किसी व्यक्ति को यह अनुभव होने लगता है कि वह उन्नति कर रहा है, ऊंचा उठ रहा है, तब उसमें स्वत: आत्मविश्वास से पूर्ण बातें करने की शक्ति आ जाती है। उसे शंका पर विजय प्राप्त हो जाती है। जिस व्यक्ति के मुखमण्डल पर विजय का प्रकाश जगमगा रहा हो, सारा संसार उसका आदर करता है और उसकी विजय, विश्वास में परिणीत हो जाती है। जिस व्यक्ति में आत्मविश्वास होता है, वह स्वत: दिव्य दिखाई पडऩे लगता है, जिसके कारण हम उसकी ओर खिंच जाते हैं और उसकी शक्ति पर विश्वास करने लगते हैं। कहते हैं उस व्यक्ति के लिए मौके की और सफलता की कोई कमी नहींं है जिसमें आत्मविश्वास होता है। परफेक्ट पर्सनलिटी वही होता है जिसमें कॉन्फीडेन्स होता है। आत्मविश्वास वह चॉबी है जो जिस व्यक्ति के हाथ में होती है उसके लिए हर ताले को खोलने की कला सिखा देता है। कोई व्यक्ति कितना भी बुद्धिमान हो, कितना भी सुन्दर हो लेकिन अगर उसमें आत्मविश्वास नहींं है तो वह चाहकर भी वह सफलता प्राप्त नहींं कर पाता है।
आत्मविश्वास की कमी से हममें असुरक्षा और हीनता का भाव आ जाता है। अगर हमारा आत्मविश्वास कम हो तो हमारा रवैया नकारात्मक् रहता है और हम तनाव से ग्रस्त रहते हैं। नतीजतन हमारी एकाग्रता भी कम हो जाती है और हम निर्णय लेते समय भ्रमित और गतिहीन से हो जाते हैं। इससे हमारा व्यक्तित्व पूरी तरह से खिल नहींं पाता। ऐसे में सफलता तो कोसों दूर रहती है।
कैसे बढ़ाएं आत्मविश्वास:
हमें सर्वप्रथम् खुद को अपनी ही नजरों में उठना पड़ेगा। इसलिए हमें देखना पड़ेगा की हम कभी अपने को किसी से कम न समझें और न ही किसी और के साथ अपना मुल्याँकन करें या करने दें। यह जान लें कि हम सब अपनी-अपनी जगह पर सही व पूर्ण हैं। और जब-जब हम अपनी तुलना किसी और से करते हैं तब-तब हम अपने साथ एक बहुत बड़ा अपराध करते हैं।
आत्मविश्वास को बढ़ाने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम होगा जब हम खुद को मायूस कर देने वाले व्यक्तियों व नकारात्मक् परिस्थितियों से कोसों दूर रखें क्योंकि यह हमारे आत्मविश्वास को एकदम क्षीण कर देती हैं। इनसब के विपरीत हमें अपना उत्साह बढ़ाने के लिए खुद को सकारात्मक वैचारिक-संदेश देते रहना चाहिए कि मैं श्रेष्ठ हूँ, पूर्ण हूँ, सम्पूर्ण हूँ। मुझमें कोई कमी नहींं है। मैं कोई भी कार्य करने में सक्षम् हूँ। मैं सही हूँ।
यह भी याद रखें कि हमारे हाथ में केवल कर्म करना होता है, और कर्मठता से प्रयास करने वाले ही को प्रभु सफलता देता है। अगर हम किसी कार्य को करते हुये विफल भी होते हैं तो इसमें किसी प्रकार का दुख या रंज करने की जरूरत नहींं होनी चाहिए, क्योंकि हमने तो उक्त कार्य में अपनी १०० फीसदी क्षमता का पूर्ण उपयोग किया है। इस तरह के सोच से आपमें अवसाद और निराशा नहीं रहेगी बल्कि एक प्रकार की नई स्फूर्ति और तेज आयेगा कि हम तो ईश्वर के दिये हुये कार्य को मन लगाकर कर रहे हैं, बाकि तो सब उसके हाथ है।
ज्योतिषीय शास्त्र के अनुसार किसी भी व्यक्ति का आत्मविश्वास तभी कम होता है जब उसकी जन्मकुंडली में सूर्य या चन्द्र कमजोर स्थिति में होते है। यदि सूर्य कमजोर होता है तो ऐसा व्यक्ति चाहकर भी आगे नहींं बढ़ पाता है। क्योंकि ज्योतिष में सूर्य को आत्मा का कारक ग्रह माना गया है। उसी तरह कुंडली में चन्द्रमा की स्थिति भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मन का कारक ग्रह होता है। अगर कुंडली में सूर्य, पाप ग्रहों से पिडि़त हो या कुंडली में खराब घर यानी छठे, आंठवें या बारहवें भाव में हो तो अशुभ फल देता है। इससे व्यक्ति का आत्मविश्वास कम होने का योग बनता है। चंद्रमा अगर कुंडली में नीच राशि, वृश्चिक के साथ अपने शत्रु ग्रह की राशि में हो या कुंडली के अशुभ घर में हो तो व्यक्ति का मन कमजोर तो हो ही जाता है साथ ही वह डरपोक होता है और उसमें आत्मविश्वास की कमी हो जाती है।
अगर चंद्रमा के साथ ही गुरू और बुद्धि का स्वामी बुध, अच्छी स्थिति में हो तो वो व्यक्ति बहुत ही बुद्धिमान होता है। मतलब जन्मकुंडली में सूर्य और चन्द्र अच्छी स्थिति में हो तो उसका व्यक्तित्व, आत्मविश्वास से भरा होता है। वैसे तो इंसान अपना आत्मविश्वास खुद बढ़ाता है लेकिन ज्योतिष के अनुसार किसी भी व्यक्ति का आत्मविश्वास तभी कम होता है जब उसकी जन्मकुंडली में सूर्य या चन्द्र कमजोर स्थिति में होते है। अत: किसी भी जातक की कुंडली में इन ग्रहों के कमजोर होने, नीच के होने या शत्रु स्थान या ग्रहों से पीडि़त होने की स्थिति में इन ग्रहों के उपाय कर तथा उचित कर्मकाण्ड से ग्रहों को मजबूत कर के भी आत्मविश्वास को बढ़ाया जा सकता है।
आत्मविश्वास को बढ़ाने के ये उपाय करें-
* तृतीयेश के मंत्रों का जाप करना, उस ग्रह के पदार्थ का दान करना चाहिए।
* लग्रेश को बली करने के लिए लग्र के रत्न को धारण करना, लग्रेश ग्रह का व्रत, मंत्रजाप तथा दान करना चाहिए।
* आत्मविश्वास का कारक ग्रह सूर्य है, अत: प्रत्येक व्यक्ति को सूर्य को मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए सूर्य का मंत्र ''ú घृणि सूर्याय नम: का सूर्योदय के समय जाप करना चाहिए।
* चंद्रमा को बलवान करने के लिए चंद्रमा के मंत्र का जाप सफेद पदार्थ जैसे चावल, दूध, शक्कर आदि का दान करना चाहिए।
* कालपुरुष की कुंडली में तीसरा स्थान बुध को प्रदान किया गया है, अत: बुध के मंत्रों का जाप, गणेश जी की उपासना, हरी चीजों का दान, गणेश जी को भोग लगाकर प्रसाद वितरण करना चाहिए।

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सिद्धियां



साधनायें असंख्य हैं और सिद्धि को साधने का मार्ग साधना है। आइये साधना की सरल व्याख्या करें।
साधनाओं की तलाश में हिन्दू धर्म की गहराई नापने वाले हर व्यक्ति को पता है हजारों हज़ार तरह की साधना संस्कृति और परंपरा के वर्णन सर्वत्र विद्यमान हैं।
साधना ही वह कला है जो सिद्धियों के रूप में फल प्रदान कराती है। सिद्धि मनुष्य की आकांक्षा हमेशा रही है।
हर जानकर व्यक्ति सिद्धि की लालसा से अनेकों तरह के साधनाओं को आजमाने की कोशिश करता है।
सांसारिक या आध्यात्मिक फल प्राप्ति के ध्येय से मनुष्य साधना सिद्धि की दुनिया में गोटे लगता है।
मूलत: साधना के चार प्रकार माने जा सकते हैं- तंत्र साधना, मंत्र साधना, यंत्र साधना और योग साधना। तीनों ही तरह की साधना के कई उप प्रकार हैं। आओ जानते हैं साधना के तरीके और उनसे प्राप्त होने वाला लाभ...
तांत्रिक साधना दो प्रकार की होती है- एक वाम मार्गी तथा दूसरी दक्षिण मार्गी। वाम मार्गी साधना बेहद कठिन है। वाम मार्गी तंत्र साधना में 6 प्रकार के कर्म बताए गए हैं जिन्हें षट् कर्म कहते हैं।
शांति, वक्ष्य, स्तम्भनानि, विद्वेषणोच्चाटने तथा।
गोरणों तनिसति षट कर्माणि मणोषणः॥
अर्थात शांति कर्म, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन, मारण ये छ: तांत्रिक षट् कर्म।
इसके अलावा नौ प्रयोगों का वर्णन मिलता है:-
मारण मोहनं स्तम्भनं विद्वेषोच्चाटनं वशम्‌।
आकर्षण यक्षिणी चारसासनं कर त्रिया तथा॥
मारण, मोहनं, स्तम्भनं, विद्वेषण, उच्चाटन, वशीकरण, आकर्षण, यक्षिणी साधना, रसायन क्रिया तंत्र के ये 9 प्रयोग हैं।
रोग कृत्वा गृहादीनां निराण शन्तिर किता।
विश्वं जानानां सर्वेषां निधयेत्व मुदीरिताम्‌॥
पूधृत्तरोध सर्वेषां स्तम्भं समुदाय हृतम्‌।
स्निग्धाना द्वेष जननं मित्र, विद्वेषण मतत॥
प्राणिनाम प्राणं हरपां मरण समुदाहृमत्‌।
जिससे रोग, कुकृत्य और ग्रह आदि की शांति होती है, उसको शांति कर्म कहा जाता है और जिस कर्म से सब प्राणियों को वश में किया जाए, उसको वशीकरण प्रयोग कहते हैं तथा जिससे प्राणियों की प्रवृत्ति रोक दी जाए, उसको स्तम्भन कहते हैं तथा दो प्राणियों की परस्पर प्रीति को छुड़ा देने वाला नाम विद्वेषण है और जिस कर्म से किसी प्राणी को देश आदि से पृथक कर दिया जाए, उसको उच्चाटन प्रयोग कहते हैं तथा जिस कर्म से प्राण हरण किया जाए, उसको मारण कर्म कहते हैं।
मंत्र साधना भी कई प्रकार की होती है। मं‍त्र से किसी देवी या देवता को साधा जाता है और मंत्र से किसी भूत या पिशाच को भी साधा जाता है। मंत्र का अर्थ है मन को एक तंत्र में लाना। मन जब मंत्र के अधीन हो जाता है तब वह सिद्ध होने लगता है। ‘मंत्र साधना’ भौतिक बाधाओं का आध्यात्मिक उपचार है।
मुख्यत: 3 प्रकार के मंत्र होते हैं- 1. वैदिक मंत्र, 2. तांत्रिक मंत्र और 3. शाबर मंत्र।
मंत्र जप के भेद- 1. वाचिक जप, 2. मानस जप और 3. उपाशु जप।
वाचिक जप में ऊंचे स्वर में स्पष्ट शब्दों में मंत्र का उच्चारण किया जाता है। मानस जप का अर्थ मन ही मन जप करना। उपांशु जप का अर्थ जिसमें जप करने वाले की जीभ या ओष्ठ हिलते हुए दिखाई देते हैं लेकिन आवाज नहीं सुनाई देती। बिलकुल धीमी गति में जप करना ही उपांशु जप है।
मंत्र नियम : मंत्र-साधना में विशेष ध्यान देने वाली बात है- मंत्र का सही उच्चारण। दूसरी बात जिस मंत्र का जप अथवा अनुष्ठान करना है, उसका अर्घ्य पहले से लेना चाहिए। मंत्र सिद्धि के लिए आवश्यक है कि मंत्र को गुप्त रखा जाए। प्रतिदिन के जप से ही सिद्धि होती है।
किसी विशिष्ट सिद्धि के लिए सूर्य अथवा चंद्रग्रहण के समय किसी भी नदी में खड़े होकर जप करना चाहिए। इसमें किया गया जप शीघ्र लाभदायक होता है। जप का दशांश हवन करना चाहिए और ब्राह्मणों या गरीबों को भोजन कराना चाहिए।
यंत्र साधना सबसे सरल है। बस यंत्र लाकर और उसे सिद्ध करके घर में रखें लोग तो अपने आप कार्य सफल होते जाएंगे। यंत्र साधना को कवच साधना भी कहते हैं।
यं‍त्र को दो प्रकार से बनाया जाता है- अंक द्वारा और मंत्र द्वारा। यंत्र साधना में अधिकांशत: अंकों से संबंधित यंत्र अधिक प्रचलित हैं। श्रीयंत्र, घंटाकर्ण यंत्र आदि अनेक यंत्र ऐसे भी हैं जिनकी रचना में मंत्रों का भी प्रयोग होता है और ये बनाने में अति क्लिष्ट होते हैं।
इस साधना के अंतर्गत कागज अथवा भोजपत्र या धातु पत्र पर विशिष्ट स्याही से या किसी अन्यान्य साधनों के द्वारा आकृति, चित्र या संख्याएं बनाई जाती हैं। इस आकृति की पूजा की जाती है अथवा एक निश्चित संख्या तक उसे बार-बार बनाया जाता है। इन्हें बनाने के लिए विशिष्ट विधि, मुहूर्त और अतिरिक्त दक्षता की आवश्यकता होती है।
यंत्र या कवच भी सभी तरह की मनोकामना पूर्ति के लिए बनाए जाते हैं जैसे वशीकरण, सम्मोहन या आकर्षण, धन अर्जन, सफलता, शत्रु निवारण, भूत बाधा निवारण, होनी-अनहोनी से बचाव आदि के लिए यंत्र या कवच बनाए जाते हैं।
दिशा- प्रत्येक यंत्र की दिशाएं निर्धारित होती हैं। धन प्राप्ति से संबंधित यंत्र या कवच पश्चिम दिशा की ओर मुंह करके रखे जाते हैं तो सुख-शांति से संबंधित यंत्र या कवच पूर्व दिशा की ओर मुंह करके रख जाते हैं। वशीकरण, सम्मोहन या आकर्षण के यंत्र या कवच उत्तर दिशा की ओर मुंह करके, तो शत्रु बाधा निवारण या क्रूर कर्म से संबंधित यंत्र या कवच दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके रखे जाते हैं। इन्हें बनाते या लिखते वक्त भी दिशाओं का ध्यान रखा जाता है।
सभी साधनाओं में श्रेष्ठ मानी गई है योग साधना। यह शुद्ध, सात्विक और प्रायोगिक है। इसके परिणाम भी तुरंत और स्थायी महत्व के होते हैं। योग कहता है कि चित्त वृत्तियों का निरोध होने से ही सिद्धि या समाधि प्राप्त की जा सकती है- 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः'।
मन, मस्तिष्क और चित्त के प्रति जाग्रत रहकर योग साधना से भाव, इच्छा, कर्म और विचार का अतिक्रमण किया जाता है। इसके लिए यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार ये 5 योग को प्राथमिक रूप से किया जाता है। उक्त 5 में अभ्यस्त होने के बाद धारणा और ध्यान स्वत: ही घटित होने लगते हैं।
योग साधना द्वार अष्ट सिद्धियों की प्राप्ति की जाती है। सिद्धियों के प्राप्त करने के बाद व्यक्ति अपनी सभी तरह की मनोकामना पूर्ण कर सकता है.....

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शनि और मंगल का अद्भुत योग


कुछ ही दिनों बाद वर्ष 2014 समाप्त हो जाएगा और 2015 शुरू हो जाएगा। 2014 के अंतिम दिनों में शनि और मंगल का अद्भुत योग बना हुआ है। शनि इस समय वृश्चिक राशि में है और मंगल मकर राशि में। मंगल मकर राशि में उच्च का रहता है। वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल है और मकर राशि का स्वामी शनि है। शनि और मंगल, दोनों एक-दूसरे की राशि में स्थित हैं। जब दो ग्रह एक-दूसरे की राशि में स्थित होते हैं तो यह योग महत्वपूर्ण होता है। शनि और मंगल, दोनों ही बड़े ग्रह हैं। शनि न्यायाधीश है और मंगल ग्रहों का सेनापति है। इस कारण इनकी यह स्थिति सभी 12 राशियों पर सीधा असर डाल रही है। मंगल 3 जनवरी 2015 तक मकर राशि में रहेगा। अत: 3 जनवरी तक यह स्थिति बनी रहेगी। मंगल के साथ ही गुरु भी उच्च राशि कर्क में स्थित है। इससे पूर्व मंगल-गुरु का यह संयोग सन 2003 अप्रैल-मई में हुआ था। इन दोनों मित्र ग्रहों का एक साथ उच्च का होना एवं आमने-सामने होना सभी राशि के लोगों के लिए विशेष असरकारक रहता है। यहां जानिए आपकी राशि पर इस स्थिति का कैसा असर हो रहा है...
मेष- मंगल इस राशि का स्वामी है एवं वह दशम होकर उच्च का हो गया है। यह योग विशेषकर जमीन से लाभ दिलाने वाला होगा। वाहन सुख मिलेगा एवं किसी बड़े कार्य में सफलता दिलावएगा। शनि अष्टम है एवं शनि की ढय्या भी चल रही है। अत: संभलकर कार्य करें। किसी भी प्रकार के विवादों से दूर रहें। जोखिम पूर्ण कार्यों से बचने का प्रयास करें। निवेश के लिए अत्यधिक सावधान रहें। किसी को उधार नहीं दें एवं सरकारी बैंक में ही बचत को रखें। क्या करें-समय-समय पर हनुमानजी एवं गणेशजी की पूजा करें।
वृषभ- मंगल नवम रहेगा एवं राशि के लिए सामान्य रहेगा। राशि से शत्रु को होने से लाभ-हानि बराबर रहेगी। रिश्तेदारों में विवाद अवश्य हो सकता है। इस समय जमीन सौदे टालने का प्रयास करें। इस राशि से सप्तम शनि बुरा प्रभाव डालने वाला नहीं रहेगा। परिस्थितियां सामान्य रहेंगी। शनि कृपा से धन लाभ के साथ ही किसी बड़ी मुसीबत से भी छुटकारा मिल सकता है। क्या करें-बुजुर्गों को कोई उपहार प्रदान करें।
मिथुन- इस राशि से अष्टम मंगल होने से जमीन, कर्ज, दुकान, मकान के मामलों में कठिनाइयां आ सकती हैं। न्यायालयीन मामलों में भी पक्ष कमजोर हो सकता है। विवादों को टालने का प्रयास करें। आपके लिए षष्ठम शनि रहेगा। इस राशि का स्वामी बुध है और बुध-शनि मित्र हैं। इस कारण शनि आने वाला समय में सम्मान दिलवाएगा। नौकरी के लिए अच्छे प्रस्ताव प्राप्त हो सकते हैं। धन प्राप्ति के नए स्रोत प्राप्त हो सकते हैं। परिवार में वर्चस्व बढ़ेगा। क्या करें- बुधवार गणेशजी को दूर्वा अर्पित करें।
कर्क- राशि पर उच्च के मंगल की सप्तम पूर्ण दृष्टि से प्रभाव बढ़ेगा एवं सभी कार्यों में सफलता प्राप्त होगी। कोर्ट-कचहरी एवं अन्य विवादित मामलों में सफलता प्राप्त होगी। नए कार्यों में सफलता प्राप्त होगी। इस राशि से शनि का ढय्या खत्म हो चुका है। अब आप पूरी राहत प्राप्त करेंगे। मानसिक शांति प्राप्त होगी। तबीयत में सुधार के साथ आलस्य की समाप्ति होगी। बाधित कार्यों में गति आने लगेगी। आय के रास्तों में आ रही बाधाएं समाप्त होंगी। आने वाला समय श्रेष्ठ होगा। क्या करें- हर शनिवार गरीब बच्चों को मिठाई खिलाएं।
सिंह- षष्ठम मंगल एवं राशि स्वामी का मित्र होने से स्वास्थ्य में लाभ कराएगा तथा अटके कार्यों में गति प्रदान करेगा। नवीन योजनाएं भी बनेंगी। विवादों का अंत होगा एवं प्रसन्नता दायक समाचार प्राप्त होंगे। चतुर्थ शनि यानी शनि का ढय्या शुरू हो गया है। अत: क्रोध पर नियंत्रण रखें। जोश में आकर कोई कार्य नहीं करें। हठ का त्याग करें। अन्यथा नुकसानदायक हो सकता है। क्या करें- हनुमानजी को सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करें।
कन्या- पंचम मंगल शुभ सूचनाएं दिलावाएगा एवं सफलता दिलाने वाला होगा। जमीन से फायदा होगा एवं कारोबार आदि में तरक्की होगी। अविवाहित लोगों के लिए वैवाहिक योग भी बनाएगा। प्रेम में भी सफलता मिलेगी। शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव समाप्त हो गया है। अत: खुशी के मौके प्राप्त होंगे। ऐसा लगेगा कोई बोझ उतर गया है एवं स्वयं को स्फूर्तिवान महसूस करेंगे। घर-परिवार में सुख आएगा। स्वयं के आय स्रोतों में लाभ प्राप्त होगा। अटके कार्यों में गति आएगी तथा नए वाहन, मकान की प्राप्ति होगी। क्या करें- गाय को हरी घास खिलाएं और इच्छानुसार गौशाला में धन का दान करें।
तुला- चतुर्थ मंगल थोड़ी परेशानी प्रदान कर सकता है। योजनाएं विफल हो सकती हैं एवं कर्जदार भी परेशान करेंगे। विवादित मामलों में भी पीछे हटना पड़ सकता है। न्यायालयीन मामलों में सावधानी रखें। यह राशि पिछले कई दिनों से शनि से भी प्रताड़ित चल रही थी। अब साढ़ेसाती का अंतिम ढय्या रहेगा। उतरती हुई साढ़ेसाती कुछ समय बाद पिछली परेशानियों का अंत करेगी। क्या करें- किसी का अनादर न करें। शनिवार को तेल का दान करें।
वृश्चिक- तृतीय राशि स्वामी मंगल एवं राशि पर गुरु की दृष्टि से फिलहाल कोई परेशानी आने की संभावनाएं नहीं है। योजनाओं में सफल होंगे। लक्ष्य की प्राप्ति होगी। नए व्यवसाय के ऑफर मिल सकते हैं। शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव पहले से ही है एवं शनि का इसी राशि में स्थित है। अतः नए कार्य में सावधानी रखें। परेशानियां आने की संभावनाएं नहीं हैं, लेकिन कभी विवाद हो तो उसे टालें। वाणी का प्रयोग संभलकर करें। यदि निवेश करना हो तो विशेषज्ञों से परामर्श अवश्य करें। सोच-समझकर ही आगे बढ़ें। क्या करें- माह में एक बार किसी भी शनिवार को हनुमानजी की प्रतिमा का श्रृंगार करवाएं।
धनु- द्वितीय मंगल से परेशानियों को अंत होगा एवं बहुत दिनों से अटका कार्य संपन्न होगा। आय का आधार मजबूत होगा एवं पूर्व में छोड़ा गया कोई कार्य पुन: प्राप्त हो सकता है। इस राशि से शनि द्वादश है और साढेसाती का प्रभाव आरंभ हो चुका है। शनि आपकी राशि के स्वामी गुरु का मित्र है। अत: कार्यों के सावधानी पूर्वक करें। लाभ होगा। जब तक कोई ठोस आधार न मिल जाए, जमीन-मकान आदि में धन नहीं लगाएं। निवेश में सावधानी रखें। उद्योग एवं व्यवसाय की देखभाल स्वयं करें। मीठी वाणी का प्रयोग करें। सभी का सम्मान करें। क्या करें- हनुमानजी को हर शनिवार तेल का दीपक लगाएं।
मकर- राशि में मंगल आकर उच्च का हो गया है, साथ ही, उच्च के गुरु की दृष्टि भी रहेगी। सभी ओर से प्रसन्नता एवं शुभ समाचारों की प्राप्ति होगी। सम्मान प्राप्त होगा एवं प्रभाव में वृद्धि होगी। नए कार्य स्थापित होंगे। इस समय शनि एकादश है। इस राशि का स्वामी शनि ही है। साथ ही, गुरु की पूर्ण दृष्टि भी इस राशि पर बनी हुई है। इस कारण आने वाले समय में यह राशि सबसे अधिक प्रभाव में रहेगी। अभी सबसे शक्तिशाली राशियों में से एक राशि मकर ही है। खुशियां प्राप्त होंगी। कोई भी कार्य रोककर न रखें। धन का लाभ भी होगा। क्या करें- किसी का अनादर न करें। गरीबों को दान दें और दुआएं लें। काले तिल का दान करें।
कुंभ- द्वादश मंगल के कारण संभलकर रहने का समय है। शांति एवं धैर्य से समय को व्यतीत करें। विरोधी पक्ष हावी होने का प्रयास करेगा। गुप्त योजनाओं एवं ठंडे दिमाग से ही उनका सामना किया जा सकता है। राशि स्वामी शनि दशम है। शनि के प्रभाव से शांति एवं धैर्य से काम करने पर लाभ ही होगा। ठंडे दिमाग से काम करेंगे तो किसी प्रकार के नुकसान की संभावनाएं नहीं हैं। परिवार से वैचारिक मतभेद समाप्त होगा। माता से स्नेह प्राप्त होगा। संतान अनुकूल रहेगी। न्यायालयीन कार्यों में सफलता मिल सकती है। क्या करें- हर सोमवार शिवलिंग पर कच्चा दूध अर्पित करें और बिल्व पत्र चढ़ाएं।
मीन- एकादश मंगल शुभकारी होगा। नई जमीन, मकान, फ्लेट खरीदने का मन बनेगा एवं सफलता भी मिल सकती है। शासकीय कार्यालयों से कार्यों में मदद मिलेगी। कारोबार में वृद्धि होगी एवं लाभ में भी इजाफा होगा। इस राशि से नवम शनि होने से ढय्या का अंत हो गया है। समय सभी प्रकार से अनुकूल एवं अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करने वाला बना हुआ है। आलस्य समाप्त होगा। सभी कार्य तेज गति से आगे बढ़ेंगे। बेरोजगारों को रोजगार मिलने की संभावनाएं बढेंगी। क्या करें- हनुमानजी के सामने घी का दीपक जलाएं।


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