Monday, 1 June 2015

मधुमेह की बीमारी और ज्योतिष विश्लेषण



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मधुमेह या चीनी की बीमारी एक खतरनाक रोग है। बीमारी में हमारे शरीर में अग्नाशय द्वारा इंसुलिन का स्त्राव कम हो जाने के कारण होती है। रक्त में ग्लूकोज स्तर बढ़ जाता है, साथ ही इन मरीजों में रक्त कोलेस्ट्रॉल, वसा के अवयव भी असामान्य हो जाते हैं। धमनियों में बदलाव होते हैं। इन मरीजों में आँखों, गुर्दों, स्नायु, मस्तिष्क, हृदय के क्षतिग्रस्त होने से इनके गंभीर, जटिल, घातक रोग का खतरा बढ़ जाता है।
मधुमेह होने पर शरीर में भोजन को ऊर्जा में परिवर्तित करने की सामान्य प्रक्रिया तथा होने वाले अन्य परिवर्तनों का विवरण इस प्रकार से है। किया गया भोजन पेट में जाकर एक प्रकार के ईंधन में बदलता है जिसे ग्लूकोज कहते हैं। यह एक प्रकार की शर्करा होती है। ग्लूकोज रक्त धारा में मिलता है और शरीर की लाखों कोशिकाओं में पहुंचता है। अग्नाशय वह अंग है जो रसायन उत्पन्न करता है और इस रसायन को इंसुलिन कहते हैं। इसुलिन भी रक्त धारा में मिलता है और कोशिकाओं तक जाता है। ग्लूकोज से मिलकर ही यह कोशिकाओं तक जा सकता है। शरीर को ऊ र्जा देने लिए कोशिकाएं ग्लूकोज को उपापचित (जलाती) करती है। ये प्रक्रिया सामान्य शरीर में होती हैं।
मधुमेह होने पर शरीर को भोजन से ऊर्जा प्राप्त करने में कठिनाई होती है। पेट फिर भी भोजन को ग्लूकोज में बदलता रहता है। ग्लूकोज रक्त धारा में जाता है। किंतु अधिकांश ग्लूकोज कोशिकाओं में नहीं जा पाते जिसके कारण इस प्रकार हैं
* इंसुलिन की मात्रा कम हो सकती है।
* इंसुलिन की मात्रा अपर्याप्त हो सकती है किन्तु इससे रिसेप्टरों को खोला नहीं जा सकता है।
* पूरे ग्लूकोज को ग्रहण कर सकने के लिए रिसेप्टरों की संख्या कम हो सकती है।
अधिकांश ग्लूकोज रक्त धारा में ही बना रहता है। यही हायपर ग्लाईसीमिया (उच्च रक्त ग्लूकोज या उच्च रक्त शर्करा) कहलाती है। कोशिकाओं में पर्याप्त ग्लूकोज न होने के कारण कोशिकाएं उतनी ऊर्जा नहीं बना पाती जिससे शरीर सुचारू रूप से चल सके ।
मधुमेह के सामान्य लक्षण:
मधुमेह होने के कई लक्षण रोगी को स्वयं अनुभव होते हैं। इनमें बार-बार पेशाब आते रहना (रात के समय भी), त्वचा में खुजली होना, धुंधला दिखना, थकान और कमजोरी महसूस करना, पैरों का सुन्न होना, प्यास अधिक लगना, कटने/घाव भरने में समय लगना, हमेशा भूख महसूस करना, वजन कम-ज्यादा होना और त्वचा में संक्रमण होना आदि प्रमुख हैं।
उपरोक्त लक्षणों के साथ-साथ यदि त्वचा का रंग, कांति या मोटाई में परिवर्तन दिखे, कोई चोट या फफोले ठीक होने में सामान्य से अधिक समय लगे, कीटाणु संक्र मण या प्रारंभिक चिह्न जैसे कि लालीपन, सूजन, फोड़ा या छूने से त्वचा गरम हो, योनि या गुदा मार्ग, बगलों या स्तनों के नीचे तथा अंगुलियों के बीच खुजलाहट हो, जिससे फफूंदी संक्रमण क ी संभावना का संकेत मिलता है या कोई न भरने वाला घाव हो तो रोगी को चाहिये कि चिकित्सक से शीघ्र संपर्क करें।
मधुमेह रोग के प्रमुख लक्षण ये हैं-
1. रोगी का मुँह खुश्क रहना तथा अत्यधिक प्यास लगना।
2. भूख अधिक लगना।
3. अधिक भोजन करने पर भी दुर्बल होते जाना।
4. बिना कारण रोगी का भार कम होना, शरीर में थकावट साथ-साथ मानसिक चिन्तन एवं एकाग्रता में कमी होना।
5. मूत्र बार-बार एवं अधिक मात्रा में होना तथा मूत्र त्यागने के स्थान पर मूत्र की मिठास के कारण चीटियाँ लगना।
6. शरीर में व्रण अथवा फोड़ा होने पर उसका घाव जल्दी न भरना।
7. शरीर पर फोड़े-फुँसियाँ बार-बार निकलना।
8. शरीर में निरन्तर खुजली रहना एवं दूरस्थ अंगों का सुन्न पडऩा।
9. नेत्र की ज्योति बिना किसी कारण के कम होना।
10. पुरुषत्वशक्ति में क्षीणता होना।
11. स्त्रियों में मासिक स्राव में विकृति अथवा उसका बन्द होना।
कारण:
हमारे भोजन में कार्बोहाइड्रेट एक प्रमुख तत्व है, यही कैलोरी व ऊर्जा का स्रोत है। वास्तव में शरीर के 60 से 70 प्रतिशत कैलोरी इन्हीं से प्राप्त होती है। र्बोहाइड्रेट पाचन तंत्र में पहुंचते ही ग्लूकोज के छोटे-छोटे कणों में बदल कर रक्त प्रवाह में मिल जाते हैं इसलिए भोजन लेने के आधे घंटे भीतर ही रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है तथा दो घंटे में अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है।
दूसरी ओर शरीर तथा मस्तिष्क की सभी कोशिकाएं इस ग्लूक ोज का उपयोग करने लगती हैं। ग्लूकोज छोटी रक्त नलिकाओं द्वारा प्रत्येक कोशिका में प्रवेश करता है, वहां इससे ऊर्जा प्राप्त की जाती है। यह प्रक्रिया दो से तीन घंटे के भीतर रक्त में ग्लूकोज की स्तर को घटा देती है। अगले भोजन के बाद यह स्तर पुन: बढने लगता है। सामान्य स्वस्थ व्यक्ति में भोजन से पूर्व रक्त में ग्लूकोज का स्तर 70 से 100 मि.ग्रा./डे.ली. रहता है। भोजन के पश्चात यह स्तर 120-140 मि.ग्रा./डे.ली. हो जाता है तथा धीरे-धीरे कम होता चला जाता है।
मधुमेह में इंसुलिन की कमी के कारण कोशिकाएं ग्लूकोज का उपयोग नहीं कर पातीं क्योंकि इंसुलिन के अभाव में ग्लूकोज कोशिकाओं में प्रवेश ही नहीं कर पाता। इंसुलिन एक द्वाररक्षक की तरह ग्लूकोज कशिकाओं में प्रवेश करवाता है ताकि ऊर्जा उत्पन्न हो सके। यदि ऐसा न हो सके तो शरीर की कोशिकाओं के साथ-साथ अन्य अंगों को भी रक्त में ग्लूकोज के बढ़ते स्तर के कारण हानि होती है। यदि स्थिति उस प्यासे की तरह है जो अपने पास पानी होने पर भी उसे चारों ओर ढूंढ़ रहा है।
इन द्वार रक्षकों (इंसुलिन) की संख्या में कमी के कारण रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ कर 140 मि.ग्रा./डे.ली. से भी अधिक हो जाए तो व्यक्ति मधुमेह का रोगी माना जाता है। असावधान रोगियों में यह स्तर बढ़ कर 500 मि.ग्रा./ड़े.ली. तक भी जा सकता है।
मधुमेह रोग जटिलताओं में भरा है। सालों साल यदि रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ा रहे तो प्रत्येक अंग की छोटी रक्त नलिकाएं नष्ट हो जाती हैं जिसे माइक्रो एंजियोपैथी कहा जाता है। तंत्रिकातंत्र की खराबी (न्यूरोपैथी), गुर्दों की खराबी (नेफरोपैथी) व नेत्रों की खराबी (रेटीनोपैथी) कहलाती है। इसके अलावा हृदय रोगों का आक्रमण होते भी देर नहीं लगती।
मधुमेह के प्रकार:
डायबिटीज मेलाइट्स को निम्नलिखित वर्गों में बांटा जा सकता है-
1. आई.डी.डी.एम. इंसुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज मेलाइट्स (इंसुलिन, आश्रित मधुमेह) टाइप-।
2. एन.आई.डी.डी.एम. नॉन इंसुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज मेलाइट्स (इंसुलिन अनाश्रित मधुमेह) टाइप-॥
3. एम.आर.डी.एम. मालन्यूट्रिशन रिलेटिड डायबिटीज मेलाइट्स (कुपोषण जनित मधुमेह)
4. आई.जी.टी.(इंपेयर्ड ग्लूकोज टोलरेंस)
5. जैस्टेशनल डायबिटीज
6. सैकेंडरी डायबिटीज
टाइप-। (इंसुलिन आश्रित मधुमेह)
टाइप-। मधुमेह में अग्नाशय इंसुलिन नामक हार्मोन नहीं बना पाता जिससे ग्लूकोज शरीर की कोशिकाओं को ऊर्जा नहीं दे पाता। इस टाइप में रोगी को रक्त में ग्लूकोज का स्तर सामान्य रखने के लिए नियमित रूप से इंसुलिन के इंजेक्शन लेने पड़ते हैं। इसे 'ज्यूविनाइल ऑनसैट डायबिटीज के नाम से भी जाना जाता है। यह रोग प्राय: किशोरावस्था में पाया जाता है। इस रोग में ऑटोइम्यूनिटी के कारण रोगी का वजन कम हो जाता है।
टाइप-।। (इंसुलिन अनाश्रित मधुमेह)
लगभग 90 मधुमेह रोगी टाइप-2 डायबिटीज के ही रोगी हैं। इस रोग में अग्नाशय इंसुलिन बनाता तो है परंतु इंसुलिन कम मात्रा में बनती है, अपना असर खो देती है या फिर अग्नाशय से ठीक समय पर छूट नहीं पाती जिससे रक्त में ग्लूकोज का स्तर अनियंत्रित हो जाता है।
इस प्रकार के मधुमेह में जेनेटिक कारण भी महत्वपूर्ण हैं। कई परिवारों में यह रोग पीढ़ी दर पीढ़ी पाया जाता है। यह वयस्कों तथा मोटापे से ग्रस्त व्यक्तियों में धीरे-धीरे अपनी जड़े जमा लेता है। अधिक तर रोगी अपना वजन घटा कर, नियमित आहार पर ध्यान दे कर तथा औषधि ले क र इस रोग पर काबू पा लेते हैं।
मधुमेह रोगियों में हृदय-रोग अपेक्षाकृत कम आयु में हो सकते हैं। दूसरा अटैक होने का खतरा सदैव बना रहता है।
प्रबंधन:
मधुमेह होने के कारण पैदा होने वाली जटिलताओं की रोक थाम के लिए नियमित आहार, व्यायाम, व्यक्तिगत स्वास्थ्य, सफाई और संभावित इनसुलिन इंजेक्शन अथवा खाने वाली दवाइयों (डॉक्टर के सुझाव के अनुसार) का सेवन आदि कुछ तरीके हैं।
1. चिन्ता, तनाव, व्यग्रता से मुक्त रहें।
2. तीन माह में एक बार रक्त शर्करा की जाँच करावें।
3. भोजन कम करें, भोजन में रेशे युक्त द्रव्य, तरकारी, जौ, चने, गेहूँ, बाजरे की रोटी, हरी सब्जी एवं दही क ा प्रचुरमात्रा में सेवन करें। चना और गेहूँ मिलाकर उसके आटे की रोटी खाना बेहतर है। चना तथा गेहूँ का अनुपात 1 /10 हो।
4. हल्का व्यायाम करें, शारीरिक परिश्रम करें अथवा प्रात 4-5 कि मी. घूमें।
5. मधुमेह पीडि़त मनुष्य नियमित एवं संयमित जीवन के लिये विशेष ध्यान रखें।
6. शर्करीय पदार्थों का सेवन बहुत सीमित करें।
7. स्थूल तथा अधिक भार वाले व्यक्ति अपना वजन कम करें।
8. दवाओं का सेवन चिकित्सक की परामर्श से ही करें।
मेथी दाने से डायबिटीज नियंत्रित हो जाती है। रात को 1 चम्मच मेथीदाना 1 गिलास गुनगुने पानी में भिगो दें। सुबह उठकर बिना ब्रस किये मेथीदाना चबा-चबा कर खा लें और पानी को घूँट-घूँट कर पी लें। 2-3 के महीने अन्दर डायबिटीज पूरी तरह नियंत्रित हो जाता है। मधुमेह के रोगियों को 'सूर्य नमस्कार करने से बहुत लाभ होता है।

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थायरायड रोग और उसके ज्योतिष लक्षण

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थायरायड ग्रंथि गर्दन के सामने की ओर,श्वास नली के ऊपर एवं स्वर यन्त्र के दोनों तरफ दो भागों में बनी होती है। इसका आकार तितली की तरह होता है। यह थाइराक्सिन नामक हार्मोन बनाती है। जिससे शरीर के ऊर्जा क्षय, प्रोटीन उत्पादन एवं अन्य हार्मोन के प्रति होने वाली संवेदनशीलता नियंत्रित होती है।
थायरायड मानव शरीर मे पायी जाने वाली सबसे बड़ी एंडोक्राइन ग्लैंड में से एक है। थायरायड ग्रंथि गर्दन के सामने की ओर,श्वास नली के ऊपर एवं स्वर यन्त्र के दोनों तरफ दो भागों में बनी होती है। इसका आकार तितली की तरह होता है। यह थाइराक्सिन नामक हार्मोन बनाती है। जिससे शरीर के ऊर्जा क्षय, प्रोटीन उत्पादन एवं अन्य हार्मोन के प्रति होने वाली संवेदनशीलता नियंत्रित होती है। आइये जानते हैं कि आखिर थायरायड के कार्य क्या होते हैं और इस बीमारी के लक्षण क्या हैं? थायरायड ग्रंथि के कार्य, शरीर से दूषित पदार्थों को बाहर निकालने में सहायता करती है। बच्चों के विकास में इन ग्रंथियों का विशेष योगदान होता है। यह शरीर में कैल्शियम एवं फास्फोरस को पचाने में मदद करता है। इसके द्वारा शरीर के टम्प्रेचर को नियंत्रण किया जाता है। कोलेस्ट्रॉडल लेवल का नियंत्रित करना, प्रजनन और स्तनपान, मांसपेशियों के विकास को बढ़ावा देता है ।
हायपोथायराडिज्म- थायरायड ग्रंथि से अगर थाईराक्सिन कम बनने लगे तो उसे 'हायपोथायराडिज्मÓ कहते हैं। इस से निम्न रोग के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं -
* शारीरिक व मानसिक विकास धीमा हो जाता है।
* इसकी कमी से बच्चों में क्रेटिनिज्म नामक रोग हो जाता है।
* 12 से 14 साल के बच्चे की शारीरिक वृद्धि रुक जाती है।
* शरीर का वजन बढऩे लगता है एवं शरीर में सूजन भी आ जाती है।
* सोचने, बोलने की क्रिया धीमी हो जाती है।
* शरीर का ताप कम हो जाता है, बाल झडऩे लगते हैं तथा गंजापन होने लगता है।
हाइपरथायरायडिज्म- इसमें थायराक्सिन हार्मोन अधिक बनने लगता है। ये असमान्य अवस्थाएं किसी भी आयु वाले व्यक्ति में हो सकती है तथापि पुरुषों की तुलना में पांच से आठ गुणा अधिक महिलाओं में यह बीमारी होती है। इससे निम्न रोग लक्षण उत्पन्न होते हैं।
* शरीर में आयोडीन की कमी हो जाती है।
* घेंघा रोग उत्पन्न हो जाता है।
* शरीर का ताप सामान्य से अधिक हो जाता है।
* अनिद्रा, उत्तेजना तथा घबराहट जैसे लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं।
* शरीर का वजन कम होने लगता है।
* कई लोगों की हाथ,पैर की अंगुलियों में कम्पन उत्पन्न हो जाता है।
* मधुमेह रोग होने की प्रबल सम्भावना बन जाती है।
थायरायड की जांच- थायरायड बीमारी को जांचने के लिये कुछ परीक्षण किये जाते हैं जैसे, टी3, टी4, एफटीआई, तथा टीएसएच। इन परीक्षणों से थायरायड ग्रंथि की स्थिति का पता चलता है। कुछ डॉक्टरों का मानना है कि आयोडीन की कमी के लक्षण दिखने पर ही जांच के लिए आना चाहिए, जबकि कई दूसरे मानते हैं कि कई बार लक्षण पहचान में ही नहीं आते। इन डॉक्टरों की राय है कि तीस साल से अधिक की उम्र में गर्भ धारण करने वाली हर महिला को थाइरॉयड की जांच करानी चाहिए।
ज्योतिष शास्त्र अनुसार थाईराईड का कारण- लग्रेश या द्वीतियेश का छटवा, आठवा या 12वां स्थान पर बैठा हो तो थायराईड रोग का कारण बनता है। साथ ही यदि लग्नेश या द्वीतियेश अपने स्थान से छटवें, आठवे या 12वें हों अथवा क्रूर ग्रहों से आक्रंत हों, तो भी थायराईड की बीमारी लग सकती है। थायराईड की बीमारी की मुक्ती के लिए ज्योतिषीय उपाय हेतु लग्रेश या द्वीतियेश की शांति कराना, संबंधित ग्रहों का दान करना, मंत्र जाप करना, धनिया का सेवन करना।

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केतु का प्रभाव: जीवन में निरंतर उन्नति का प्रेरणाश्रोत


निरंतर चलायमान रहने अर्थात् किसी जातक को अपने जीवन में निरंतर उन्नति करने हेतु प्रेरित करने तथा बदलाव हेतु तैयार तथा प्रयासरत रहने हेतु जो ग्रह सबसे ज्यादा प्रभाव डालता है, उसमें एक महत्वपूर्ण ग्रह है केतु। ज्योतिष शास्त्र में राहु की ही भांति केतु भी एक छायाग्रह है तथा यह अग्नितत्व का प्रतिनिधित्व करता है। इसका स्वभाग मंगल ग्रह की तरह प्रबल और क्रूर माना जाता है। केतु ग्रह विषेषकर आध्यात्म, पराषक्ति, अनुसंधान, मानवीय इतिहास तथा इससे जुड़े सामाजिक संस्थाएॅ, अनाथाश्रम, धार्मिक शास्त्र आदि से संबंधित क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है। केतु ग्रह की उत्तम स्थिति या ग्रह दषाएॅ या अंतरदषाओं में जातक को उन्नति या बदलाव हेतु प्रेरित करता है। केतु की दषा में परिवर्तन हेतु प्रयास होता है। पराक्रम तथा साहस दिखाई देता है। राहु जहाॅ आलस्य तथा कल्पनाओं का संसार बनाता है वहीं पर केतु के प्रभाव से लगातार प्रयास तथा साहस से परिवर्तन या बेहतर स्थिति का प्रयास करने की मन-स्थिति बनती है। केतु की अनुकूल स्थिति जहाॅ जातक के जीवन में उन्नति तथा साकारात्मक प्रयास हेतु प्रेरित करता है वहीं पर यदि केतु प्रतिकूल स्थिति या नीच अथवा विपरीत प्रभाव में हो तो जातक के जीवन में गंभीर रोग, दुर्घटना के कारण हानि,सर्जरी, आक्रमण से नुकसान, मानसिक रोग, आध्यात्मिक हानि का कारण बनता है। केतु के शुभ प्रभाव में वृद्धि तथा अषुभ प्रभाव को कम करने हेतु केतु की शांति करानी चाहिए जिसमें विषेषकर गणपति भगवान की उपासना, पूजा, केतु के मंत्रों का जाप, दान तथा बटुक भैरव मंत्रों का जाप करना चाहिए जिससे केतु का शुभ प्रभाव दिखाई देगा तथा जीवन में निरंतर उन्नति बनेगी।

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केमद्रुम योग:भयानक दुखदायी योग ?????


केमद्रुम योग!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली में बनने वाले विभिन्न प्रकार के अशुभ योगों में से केमद्रुम योग को बहुत अशुभ माना जाता है। केमद्रुम योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार किसी कुंडली में यदि किसी कुंडली में चन्द्रमा के अगले और पिछले दोनों ही घरों में कोई ग्रह न हो तो ऐसी कुंडली में केमद्रुम योग बन जाता है जिसके कारण जातक को निर्धनता अथवा अति निर्धनता, विभिन्न प्रकार के रोगों, मुसीबतों, व्यवसायिक तथा वैवाहिक जीवन में भीषण कठिनाईयों आदि का सामना करना पड़ता है। अनेक वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि केमद्रुम योग से पीड़ित जातक बहुत दयनीय जीवन व्यतीत करते हैं तथा इनमें से अनेक जातक अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कठिनाईयों तथा असफलतओं का सामना करते हैं तथा इन जातकों के जीवन का कोई एक क्षेत्र तो इस अशुभ योग के प्रभाव के कारण बिल्कुल ही नष्ट हो जाता है जैसे कि इस दोष से पीड़ित कुछ जातकों का जीवन भर विवाह नहीं हो पाता, कुछ जातकों को जीवन भर व्यवसाय ही नहीं मिल पाता तथा कुछ जातक जीवन भर निर्धन ही रहते हैं। कुछ ज्योतिषी यह मानते हैं कि केमद्रुम योग के प्रबल अशुभ प्रभाव में आने वाले कुछ जातकों को लंबे समय के लिए कारावास अथवा जेल में रहना पड़ सकता है तथा इस योग के प्रबल अशुभ प्रभाव में आने वाले कुछ अन्य जातकों को देष निकाला जैसे दण्ड भी दिये जा सकते हैं। केमद्रुम योग से पीड़ित जातकों का सामाजिक स्तर सदा सामान्य से नीचे अथवा बहुत नीचे रहता है तथा इन्हें जीवन भर समाज में सम्मान तथा प्रतिष्ठा नहीं मिल पाती।
केमद्रुम योग के निर्माण संबंधित नियम का अध्ययन करने से यह पता चलता है कि केमद्रुम योग बहुत सी कुंडलियों में बन जाता है तथा इसी के अनुसार संसार के बहुत से जातक केमद्रुम योग द्वारा दिये जाने वाले अशुभ फलों तथा मुसीबतों से पीड़ित होने चाहिएं। केमद्रुम योग द्वारा प्रदान किए जाने वाले अशुभ फल बहुत चरम हैं तथा इसी कारण इस योग का निर्माण बहुत कम कुंडलियों में ही होना चाहिए क्योंकि संसार के बहुत से जातक इस प्रकार के चरम अशुभ फलों से पीड़ित नहीं पाये जाते। इस लिए इस अशुभ योग के किसी कुंडली में बनने के लिए कुछ अन्य नियम भी आवश्यक हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं किसी कुंडली में केमद्रुम योग के निर्माण के लिए कुंडली में चन्द्रमा के साथ कोई ग्रह स्थित नहीं होना चाहिए तथा कुंडली के केन्द्र के घरों अर्थात 1, 4, 7 तथा 10वें घर में भी राहु अथवा केतु के अतिरिक्त कोई अन्य ग्रह नहीं होना चाहिए तथा चन्द्रमा का कुंडली में राहु अथवा केतु के अतिरिक्त किसी भी अन्य ग्रह के साथ दृष्टि के माध्यम से भी संबंध नहीं होना चाहिए। हालांकि उपर बताए गए अतिरिक्त नियम अपने आप में ही केमद्रुम योग को दुर्लभ बनाने के लिए पर्याप्त हैं किन्तु मेरे शोध तथा अनुभव के अनुसार इन नियमों के अतिरिक्त भी कुछ तथ्यों पर विचार करना चाहिए। इन तथ्यों के बारे में जानने से पहले आइए हम केमद्रुम योग के निर्माण के पीछे छिपे तर्क को जानने का प्रयास करें।
वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली में चन्द्रमा को सबसे अधिक महत्वपूर्ण ग्रह माना जाता है जिसका निश्चय इन तथ्यों से किया जा सकता है कि आज भी बहुत से वैदिक ज्योतिषी चन्द्रमा की स्थिति वाले घर को ही कुंडली में लग्न मानते हैं, चन्द्र राशि को ही जातक की जन्म राशि कहा जाता है, चन्द्र नक्षत्र को ही जातक का जन्म नक्षत्र कहा जाता है, विंशोत्तरी जैसी महादशाओं की गणना भी चन्द्रमा के आधार पर ही की जाती है तथा विवाह कार्यों के लिए कुंडली मिलान में प्रयोग होने वाली गुण मिलान की प्रक्रिया भी केवल चन्दमा की स्थिति के आधार पर ही की जाती है जिससे यह सपष्ट हो जाता है कि वैदिक ज्योतिष के अनुसार चन्द्रमा ही प्रत्येक कुंडली में सबसे महत्वपूर्ण ग्रह हैं। किसी कुंडली में जब चन्द्रमा जैसा सबसे अधिक महत्वपूर्ण ग्रह किसी भी प्रकार के प्रभाव से रहित होकर अकेला पड़ जाता है तथा कुंडली के सबसे अधिक महत्वपूर्ण माने जाने वाले केन्द्र के घरों में भी कोई ग्रह स्थित न होने के कारण अकेलेपन की स्थिति ही बनती हो तो इसका अर्थ यह निकलता है कि ऐसी कुंडली में किसी भी प्रकार के महत्वपूर्ण तथा शुभ फलदायी परिणामों को जन्म देने की क्षमता बहुत कम है जिसके चलते जातक अपने जीवन में कुछ भी विशेष नहीं कर पाता। इस प्रकार कुंडली के सबसे महत्वपूर्ण ग्रह तथा कुंडली के सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र के घरों के प्रभावहीन होने से कुंडली में केमद्रुम योग बन जाता है जिसके प्रभाव में आने वाला जातक कुछ विशेष उपलब्धियां प्राप्त नहीं कर पाता।

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प्रेम विवाह का ज्योतिष विश्लेषण

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जब किसी लड़का और लड़की के बीच प्रेम होता है तो वे साथ-साथ जीवन बिताने की ख्वाहिश रखते हैं और विवाह करना चाहते हैं। कोई प्रेमी अपनी मंजिल पाने में सफल होता है यानी उनकी शादी उसी से होती है जिसे वे चाहते हैं और कुछ इसमे नाकामयाब होते हैं। इनमें कुछ अपनी नाकाम मोहब्बत के नाम पर अपने जीवन को भी बर्वाद कर डालते हैं। ज्योतिषशास्त्री इसके लिए ग्रह योग को जिम्मेवार मानते हैं। देखते हैं ग्रह योग कुण्डली में क्या कहते हैं।
प्रेम एक दिव्य, अलौकिक एवं वंदनीय तथा प्रफुल्लता देने वाली स्थिति है। प्रेम मनुष्य में करुणा, दुलार, स्नेह की अनुभूति देता है। फिर चाहे वह भक्त का भगवान से हो, माता का पुत्र से हो या प्रेमी और प्रेमिका का हो, सभी का अपना महत्व है। ज्योतिषाचार्यों के मतानुसार ग्रहों की युति ही प्रेम को विवाह की परिणिति तक ले जाने में मददगार होती है। ज्योतिष के अनुसार माना जाता है कि मनुष्य का वर्तमान जीवन, चरित्र और स्वभाव पूर्व जन्मों के अर्जित कर्मों का फल होता है। इसलिए उन्ही स्त्री पुरषों का प्रेम विवाह होगा और सफल होगा जिनके गुण और स्वभाव एक दूसरे से मिलते होंगे।
कैसे होता है प्रेम विवाह? किन ग्रहों के प्रभाव से गृहत्याग करने पर मजबूर करता है और अपना सब कुछ छोड़कर प्रेम विवाह कराता है। प्रेम विवाह करने वाले लड़के व लड़कियों को एक-दूसरे को समझने के अधिक अवसर प्राप्त होते है, जिसके फलस्वरुप दोनों एक-दूसरे की रुचि, स्वभाव व पसन्द-नापसन्द को अधिक कुशलता से समझ पाते हंै। प्रेम विवाह करने वाले वर-वधू भावनाओं व स्नेह की प्रगाढ़ डोर से बंधे होते है। ऐसे में जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी दोनों का साथ बना रहता है। पर कभी-कभी प्रेम विवाह करने वाले वर-वधू के विवाह के बाद की स्थिति इसके विपरीत होती है। इस स्थिति में दोनों का प्रेम विवाह करने का निर्णय शीघ्रता व बिना सोचे समझे हुए प्रतीत होता है। ग्रहों के कारण व्यक्ति प्रेम करता है और इन्हीं ग्रहों के प्रभाव से दिल टूटते और एक-दूसरे से छूटते भी हैं। ज्योतिष शास्त्रों में प्रेम विवाह के योगों के बारे में स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता है, परन्तु जीवन साथी के बारे में अपने से उच्च या निम्न प्रभावों का विस्तृत विवरण जरूर मिलता है।
1) जब किसी व्यक्ति कि कुण्डली में शनि अथवा चन्द्र पंचम भाव के स्वामी के साथ, पंचम भाव में ही स्थित हों तब अथवा सप्तम भाव के स्वामी के साथ सप्तम भाव में ही हों तब भी प्रेम विवाह के योग बनते है।
2) इसके अलावा जब शुक्र लग्न से पंचम अथवा नवम अथवा चन्द्र लग्न से पंचम भाव में स्थित हों, तब प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है।
3) प्रेम विवाह के योगों में जब पंचम भाव में मंगल हो तथा पंचमेश व एकादशेश का राशि परिवर्तन अथवा दोनों कुण्डली के किसी भी एक भाव में एक साथ स्थित हों उस स्थिति में प्रेम विवाह होने के योग बनते है।
4) अगर किसी व्यक्ति की कुण्डली में पंचम व सप्तम भाव के स्वामी अथवा सप्तम व नवम भाव के स्वामी एक-दूसरे के साथ स्थित हों उस स्थिति में प्रेम विवाह कि संभावनाएं बनती है।
5) जब सप्तम भाव में शनि व केतु की स्थिति हो तो व्यक्ति का प्रेम विवाह हो सकता है।
6) कुण्डली में लग्न व पंचम भाव के स्वामी एक साथ स्थित हों या फिर लग्न व नवम भाव के स्वामी एक साथ बैठे हों, अथवा एक-दूसरे को देख रहे हों इस स्थिति में व्यक्ति के प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है।
7) जब किसी व्यक्ति की कुण्डली में चन्द्र व सप्तम भाव के स्वामी एक-दूसरे से दृष्टि संबन्ध बना रहे हों तब भी प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है।
8) जब सप्तम भाव का स्वामी सप्तम भाव में ही स्थित हों तब विवाह का भाव बली होता है तथा व्यक्ति प्रेम विवाह कर सकता है।
9) पंचम व सप्तम भाव के स्वामियों का आपस में युति, स्थिति अथवा दृष्टि संबन्ध हो या दोनों में राशि परिवर्तन हो रहा हों तब भी प्रेम विवाह के योग बनते है।
10) जब सप्तमेश की दृिष्ट, युति, स्थिति शुक्र के साथ द्वादश भाव में हों तो, प्रेम विवाह होता है।
11) द्वादश भाव में लग्नेश, सप्तमेश कि युति हों व भाग्येश इन से दृष्टि संबन्ध बना रहा हो, तो प्रेम विवाह की संभावनाएं बनती है।
12) जब जन्म कुण्डली में शनि किसी अशुभ भाव का स्वामी होकर वह मंगल, सप्तम भाव व सप्तमेश से संबन्ध बनाते है तो प्रेम विवाह हो सकता है। पंचम भाव का स्वामी पंचमेश शुक्र अगर सप्तम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह की प्रबल संभावना बनती है। शुक्र अगर अपने घर में मौजूद हो तब भी प्रेम विवाह का योग बनता है।
१३) शुक्र अगर लग्न स्थान में स्थित है और चन्द्र कुण्डली में शुक्र पंचम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह संभव होता है।
अगर कुण्डली में प्रेम विवाह योग नहीं है और नवमांश कुण्डली में सप्तमेश और नवमेश की युति होती है तो प्रेम विवाह की संभावना बनती है। शुक्र ग्रह लग्न में मौजूद हो और साथ में लग्नेश हो तो प्रेम विवाह निश्चित समझना चाहिए। शनि और केतु पाप ग्रह कहे जाते हैं लेकिन सप्तम भाव में इनकी युति प्रेमियों के लिए शुभ संकेत होता है। राहु अगर लग्न में स्थित है तो नवमांश कुण्डली या जन्म कुण्डली में से किसी में भी सप्तमेश तथा पंचमेश का किसी प्रकार दृष्टि या युति सम्बन्ध होने पर प्रेम विवाह होता है। लग्न भाव में लग्नेश हो साथ में चन्द्रमा की युति हो अथवा सप्तम भाव में सप्तमेश के साथ चन्द्रमा की युति हो तब भी प्रेम विवाह का योग बनता है। सप्तम भाव का स्वामी अगर अपने घर में है तब स्वगृही सप्तमेश प्रेम विवाह करवाता है। एकादश भाव पापी ग्रहों के प्रभाव में होता है तब प्रेमियों का मिलन नहीं होता है और पापी ग्रहों के अशुभ प्रभाव से मुक्त है तो व्यक्ति अपने प्रेमी के साथ सात फेरे लेता है। प्रेम विवाह के लिए सप्तमेश व एकादशेश में परिवर्तन योग के साथ मंगल नवम या त्रिकोण में हो या फिर द्वादशेश तथा पंचमेश के मध्य राशि परिवर्तन हो तब भी शुभ और अनुकूल परिणाम मिलता है।
विवाह में संबंध-विच्छेद को रोकने के ज्योतषीय उपाय:
प्रेम विवाह करने के बाद प्रेम होने की स्थिति में भी जब छोटे-छोटे विवाद बनते हैं और विवाद के कारण कभी-कभी छोटे-छोटे विवाद तलाक का कारण भी बनते हैं। तलाक के कारण क्या-क्या हैं? ऐसा क्यों होता है? क्यों कुछ दंपत्ति अपना दांपत्य जीवन का निर्वाह ठीक ढंग से कर नहीं पाते? ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इसका कारण जन्म पत्रिका का सप्तम स्थान होता है। कुण्डली के इस स्थान में यदि सूर्य, गुरु, राहु, मंगल, शनि जैसे ग्रह हो या इस स्थान पर इनकी दृष्टि हो तो जातक का वैवाहिक जीवन परेशानियों से भरा होता है। सप्तम स्थान पर सूर्य का होना निश्चित ही तलाक का कारण है। गुरु के सप्तम होने पर विवाह तीस वर्ष की आयु के पश्चात करना उत्तम होता है। इसके पहले विवाह करने पर विवाह विच्छेद होता है या तलाक का भय बना रहता है। मंगल तथा शनि सप्तम होने पर पति-पत्नी के मध्य अवांछित विवाद होते हैं। राहु सप्तम होने पर जीवन साथी व्यभिचारी होता है। इस कारण उनके मध्य विवाद उत्पन्न होते हैं, जिनसे तलाक होने की संभावना बढ़ जाती है। अचानक उनमें कटुता व तनाव उत्पन्न हो जाता है। जो पति-पत्नी कल तक एक दूसरे के लिए पूर्ण प्रेम और सम्मान रखते थे, आज उनमें झगड़ा हो गया है। स्थिति तलाक की आ जाती है। ऐसी स्थिति में प्रेम विवाह करने के पूर्व लड़का और लड़की को विवाद के पूर्व क्रमश: अर्क और कुंभ विवाह करानी चाहिए। मंगल का व्रत करने से भी शादी में बाधा को दूर किया जा सकता है।

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कालसर्प दोष का ज्योतिषीय यथार्थ और निवारण क्यों महतवपूर्ण


काल सर्प योग पूजा के लिए छवि परिणाम
ज्योतिषीय आधार पर कालसर्प दो शब्दों से मिलकर बना है ‘‘काल’’ और ‘‘सर्प’’ । काल का अर्थ समय और सर्प का अर्थ सांप अर्थात् समय रूपी सांप। ज्योतिषीय मान्यता है कि जब सभी ग्रह राहु एवं केतु के मध्य आ जाते हैं या एक ओर हो जाते हैं तो कालसर्प येाग बनता है। मान्यता है कि जिस जातक की कुंडली में कालसर्प दोष बनता है, उसके जीवन में काफी उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है। कालसर्प योग में सभी ग्रह अर्धवृत्त के अंदर होता है। ऋग्वेद के अनुसार राहु और केतु ग्रह नहीं है बल्कि असुर हैं। अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्र दोनों आमने सामने होते हैं उस समय राहु अपना काम करता है जिससे सूर्य ग्रहण होता है उसी प्रकार पूर्णिमा के दिन केतु अपना काम करता है और चंद्रग्रहण लगता है। वैदिक परंपरा में विष्णु को सूर्य कहा गया है जो कि दीर्धवृत्त के समान है। राहु केतु दो संपात बिंदु हैं जो इस दीर्घवृत्त को दो भागों में बांटते हैं। इन दो बिंदुओं के बीच ग्रहों की उपस्थिति होने पर कालसर्प बनता है। जो व्यक्ति के पतन का कारण बनता है।
ज्योतिषीय मान्यता है कि राहु और केतु छायाग्रह हैं जो सदैव एक दूसरे से सातवेंभाव पर होते हैं जब सभी ग्रह क्रमवार से इन दोनों ग्रहों के बीच आ जाते हैं तो कालसर्प दोष बनता है। राहु केतु शनि के समान क्रूर ग्रह माने जाते हैं और शनि के समान विचार रखने वाले होते हैं। राहु जिनकी कुंडली में अनुकूल फल देने वाला होता है, उन्हें कालसर्प दोष में महान उपलब्धियां हासिल होती हैं। इस दोष में जातक से परिश्रम करवाता है और उसके अंदर की कमियां को दूर करने की प्रेरणा देता है जिससे व्यक्ति जुझारू, संघर्षषील और साहसी बनता हैं इस योग के प्रभाव में अपनी क्षमताओं का पूरा प्रयोग और निरंतर आगे बढ़ने हेतु सदा परिश्रम करने से कालसर्प दोष योग बन सकता है। कालसर्प योग में स्वराषि एवं उच्च राषि में स्थित गुरू, उच्च राषि का राहु, गजकेषरी योग, चतुर्थ केंद्र विषेष लाभ प्रदान करता है। अकर्मण्य होने तथा उसके परिणामस्वरूप निराष होकर प्रयास छोड़ने से कालसर्प दोष बन जाता है किंतु लगनषील तथा परिश्रमी बनकर प्रयास करने से कालसर्प दोष ना रहकर योग बन जाता है। कालसर्प दोष में परिश्रमी तथा लगनषील बनने के साथ पितृदोष निवारण उपाय तथा राहु शांति कराना भी उचित होता है।

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अरविन्द केजरीवाल और ज्योतिष विश्लेषण

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आम आदमी के अंतर्मन पर बहुत कम समय में अपना असर छोडऩे वाले पार्टी के मुखिया एवं दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की राशि और लग्न दोनों वृषभ है। लग्न का चंद्रमा जहां इनके व्यक्तित्व को आकर्षक बना रहा है वहीं मित्र सूर्य के घर में बैठा बुध इन्हें बेहतर वक्तृत्व शैली भी प्रदान कर रहा है।
बुध के साथ-साथ स्वगृही सूर्य की उपस्थिति बुद्धादित्य नामक राजयोग निर्मित करते हैं तथा लाभ स्थान के राहु ने इनके लिए एक नई जगमगाती कथा लिखी। इसी राहू ने इन्हें पद और प्रतिष्ठा के काबिल बनाया।
पराक्रम भाव में आसीन मंगल जहां इन्हें पराक्रमी और पुरुषार्थी बना रहा है वहीं इन्हें जुनून भी प्रदान कर रहा है। वर्तमान में इनकी बृहस्पति की महादशा में शुक्र का अंतर चल रहा है जो इनके लिए लाभ के बड़े द्वार खोल रहा है।
अब एक नजर उनके जीवन पर डालें तो मंगल में केतु की दशा में उन्होंन १९८९ में आई.आई.टी. किया तथा राहु में शनि के अंतर में १९९२ में वे आई.आर.एस. में आ गए। यहां आकर उन्होंने भ्रष्टाचार देखा। २००० में राहु में शुक्र का अंतर चल रहा था, उस समय उन्होंने छुट्टी ले ली और नागरिक आंदोलन, परिवर्तन की शुरूआत की। और जब फरवरी २००६ में जब गुरू में राहु का प्रत्यंतर चल रहा था तब उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। इस समय अरुणा राय और इनके प्रयास से आर.टी.आई. का कानून संसद में पास कर दिया गया। ६ फरवरी २००७ जब गुरू में शनि का अंतर चल रहा था तो लोग २००६ के लिए लोक-सेवा में सीएनएन-आईबीएन ''इस वर्ष का भारतीय "Indian Of The Year" नामित किया गया। गुरू में शुक्र का अंतर प्रारंभ हुआ जून २०१२ से, यहीं से उन्होंने अन्ना के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल बिल के लिए बड़ा आंदोलन किया जिसे आगे चलकर अगस्त क्रान्ति का नाम दिया गया। परन्तु इस आंदोलन में बड़ी राजनैतिक पार्टियों का सहयोग नहीं मिला और यहीं पर शुक्र की अंतरदशा में ही अपने राजनैतिक कैरियर की शुरूआत की और 'आप पार्टी की स्थापना की और दिल्ली विधान सभा में २८ सीटें जीतकर देश की राजनीति में खलबली मचा दी।
6नवंबर, 2013 से आरंभ शुक्र के अंतर में चंद्रमा के प्रत्यंतर ने अरविंद केजरीवाल के लिए सफलता के द्वार पर नए तोरन बांधे। पर, 16मार्च, 2014 से शनि का प्रत्यंतर शुभता में कुछ अशुभ रंग का समावेश भी समावेश कर रहा है। यह काल साजिशों के नए समीकरण रचता हुआ नजर आ रहा है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी पांच महीने बेहतर नहीं नजर आ रहे।
बृहस्पति में शुक्र की अंतर्दशा जहां अरविंद को नई उड़ान दे रही है वहीं 28फरवरी 2015 से प्रारंभ होने वाली सूर्य की अंतर्दशा उन्हें नए पंख प्रदान करेगी। सूर्य की अंतर्दशा उन्हें जरूर बड़ा पद या हैसियत प्रदान करेगी। बड़े-बड़े दिग्गजों को बेचारा बना देने वाले अरविंद केजरीवाल आगे भी अनेक खास को आम बना देने का कौशल दिखाते रहेंगे।
3 नवंबर 2014 को शनि का वृश्चिक में प्रवेश अगले ढाई वर्षों में कभी भी अरविंद को स्वास्थ्य समस्याएं दे सकता है। इन पर नए-नए आरोप लगेंगे। पर, हर आरोप इन्हें नई ऊंचाई पर ले जाता नजर आएगा।
पुरुषार्थ के मंगल और नए-नए आरोपों की मदद से एक आम आदमी अरविंद केजरीवाल एक महानायक का रूप अख्तियार कर लेगा पर मार्च 2014 से अगस्त 2014 तक का काल कुछ निराशा के बीज बो सकता है।

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