Saturday 10 December 2016

इन्द्र योग

"चन्द्र नाडी' में इन्द्र योग यदि लग्न का स्वामी मिथुन नवांष् में एकादश भाव में चतुथेंश से युक्त हो, तो "इन्द्र रोग है बनता है । इस योग का फलादेश इस प्रकार है-यदि तुला लग्न और इन्द्र र्याग हो, तो जातक को गोगविलास को सामग्री प्रचुर मावा में प्राप्त होती है । वह राज्य की और से बहुत मान प्राप्त करता है । सदा न्याय और धैर्य के मार्ग यर अमर रहता है । वह दस हजार से भी अधिक आय का मालिक होता है । इस तरह हम देखते हैं कि फ़लादेश युक्तियुक्त है । इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है । भोग-बिलास की सामग्री सुख-ररामग्री ही होती है । अत इसका सम्बन्ध सुख भाव अर्थात् चतुर्थ भाव से अनिवार्य है । यहा सुरब्रेश  लाभ स्थान में दो मित्र (शुभ) ग्रहों के साथ स्थित होकर घोषित कर रहा है कि वह मुख-प्रति का प्रतीक है । वैसे भी तुला लग्न के लिए शनि प्रबल राजयोग कारक होगा; क्योंकि वह केन्द्र ( चतुर्थ ) और त्रिकोण (पंचम) - दोनों भावों का स्वामी होता है । शनि आदि पाप ग्रहों का सबसे अधिक लाभकारी बन जाना कोई साधारण बात नहीं है । इसीलिए तो तुला लग्न की कुण्डलियों को अन्य लहरों की कुण्डलियों की अपेक्षा अधिक मूल्यवान माना गया है । इस संबध में है चंद्र नाडी' में  तुला लग्न में जन्य लेने वाला जातक जन्य से ही बीमारों के घर में होता है । उसे जीवन में अत्यधिक धन की पाति होती है । वह अच्छे वस्वी, आभूषणों तथा सोने के बर्तनों का प्रयोग करने बाला होता है । यहीं कारण है कि शनि हर प्रकार के सुख दे रहा है । शनि की दृष्टि अपनी राशि कुंभ यर होने से पंचम भाव की पुष्टि हो रहीं है, जो एक बहुत शुभ भाव है । नवम से नवम होने के कारण नवम की ही भांति वह भाग्य और शुभ किस्मत का द्योतक है । यह तो रहीं बात शनि को शुभता की, जो सुखदायक तथा राज्यदायक है । राज्य की और से मान-प्रासि का उल्लेख भी फलादेश में है । यह नवमाधिपति की प्रमुख उपचय (एकादश स्थान में) स्थिति से स्पष्ट है । बुध नवम भाव का फल कर रहा है, क्योंकि इसकी द्वितीय राशि अर्थात् कन्या द्वादश भाव में है । इस प्रकार यदि द्वितीय तथा द्वादश भाव के स्वामी दो राशियों के मालिक हो, तो वे उस स्थान का फल कोंगे, जिसमें उनकी अन्य राशि स्थित होती है । दूसरी बात, बुध जैसे ग्रहों के साथ होता है, वैसा ही फल करता है । यहाँ इसको शनि तथा शुक्र का योग भी अनुकूल मिला, क्योंकि दोनों ग्रह (शनि और शुक्र) योगकारक हैं । अत: बुध भी योगकारक बन गया है । इस प्रकार शनि, शुक्र और बुध को पाते ( 1 1 वे भाव में स्थित ) से बहुसंख्या, राजयोगों की प्राप्ति होती है, जो महान ऐश्वर्यप्रद है । इसके अलावा नवम तथा पंचम भाव प्रदिष्ट है राज्य कृपा है का द्योतक भी है । इस योग के फलादेश में यह भी कहा गया है कि जातक धर्मरत होगा । यह योग भी अपनी उत्कृष्टता के साथ विद्यमान है, क्योंकि बुध नवमेश ( धर्म) है । साथ ही शनि नवम से नवम भाव का स्वामी होने से धर्म का प्रतीक है । दोनों की युति लग्नेश (स्व) से और वह भी प्राप्ति स्थान में होना- धर्म की सहज प्राप्ति का परिचायक है । अन्त में घनाइय होने का फल कहा क्या है ।यहा निज का सुख (चतुर्थ भाव) हैं भाग्य (नवम भाव) तथा राज्य (लग्न ) … सभी की प्रासि (एकादश भाव) हो रहीं है । शुक्र, शनि एल बुध का यह शुभ योग जहाँ लग्न से उपचय (प्रासि स्थान) में है, वहीं चन्द्र लग्न से वाम केन्द्र में तथा सूर्य लग्न से धन स्थान में अर्थात्तीनों तनों में शुभ स्थान में है । इसलिए अधिक शुभताप्रद है ज्योतिष शास्यों के अनुसार, किसी ग्रह की निज भाव पर दृष्टि उस भाव को परिपुष्ट करती है । यह परिपुष्ट भाव से संबद्ध घन आदि वस्तुओं पर तो लागू होती है, परंतु उस भाव संबंधी प्राणियों पर नहीं । इसीलिए जाम स्थान में कुंभ राशि में स्थित सूर्य बड़े भाइयों का नाश करता है।


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